Satsang

सत्यनिष्ठा का चमत्कार

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छत्तीसगढ़ की एक घटना है। रायपुर के पासवाले स्थानों में पिंडारा जाति के डकैतों का प्रभाव इतना बढ़ गया था कि वे गाँव-के-गाँव लूट लेते थे। उनका आतंकवादियों की नाईं बड़ा संगठन बन गया था। डाकू अभयसिंह के नेतृत्व में वे डाका डालते थे। उस समय का राजा इन डकैतों से लोहा लेने में अपने को असमर्थ मानने लगा था।

मंत्रियों ने राजा से कहाः “राजा साहब ! हो सकता है रायपुर के पास वाले नगर पर पिंडारा डाकू कभी भी कब्जा कर लें, क्योंकि उनकी संख्या और शक्ति दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। अपने सिपाही और अमलदार उनसे मात खाकर वापस आ रहे हैं।”

राजा ने मंत्रियों के साथ विचार-विमर्श किया और आखिर यह तय हुआ कि वे डाकू किस समय व कहाँ इकट्ठे होते हैं तथा किस समय अचेत और लापरवाह होते हैं, इसका पता लगाया जाय तथा जब वे अचेत हों तब उन पर हमला बोल दिया जाय। यह पता लगाने के लिए राज-पुरस्कार भी घोषित किये गये लेकिन इस दुष्कर कार्य के लिए कोई तैयार न हुआ, सभी सिर झुकाकर बैठे रहे।

उस राज्य में ओंकार का जप करने वाले और गुरुमंत्र का आश्रय लेने वाले एक दुबले-पतले ब्राह्मण रहते थे, जिनका नाम था रूद्रदेव। उन्होंने संकल्प किया कि ‘मैं समाज का शोषण करने वाले इस संगठन का पता लगाऊँगा।’ वे चल पड़े और यात्रा करते करते उन डाकुओं के क्षेत्र में जा पहुँचे। वे थक गये थे, इसलिए एक पीपल के पेड़ के नीचे सो गये। कुछ समय नींद लेकर उठे और थोड़ी देर शांत भाव से बैठे। इतने में डाकू अभयसिंह वहाँ से गुजरा। रूद्रदेव को देखकर वह बोलाः “ऐ ! यहाँ क्यों पड़े हो और कहाँ से आये हो ?”

सामने वाले व्यक्ति का वेश देखकर रूद्रदेव समझ गये कि यह कोई डाकू है। उन्होंने शांतस्वरूप ईश्वर में गोता मारा और सोचने लगे, ‘अब सत्य का ही सहारा लेंगे।’ उन्हें सत्प्रेरणा मिली।

रुद्रदेव ने कहाः “भैया ! मैं पिंडारों के स्थान का रास्ता जानना चाहता हूँ।”

तब अभयसिंह चौकन्ना होते हुए बोलाः “ऐं….! पिंडारों का स्थान ?”

रूद्रदेवः “हाँ।”

अभयसिंहः “मुझे किसी जरूरी काम से जाना है, नहीं तो मैं तुम्हें उनकी बस्ती और साथ में उनका काम भी अभी-अभी दिखा देता। लेकिन तुम पिंडारों की बस्ती के बारे में क्यों जानना चाहते हो ?”

रूद्रदेव बोलेः “मेरे पास सात अशर्फियाँ हैं, आप चाहे तो इन्हें ले लो। चाहो तो ये कपड़े भी उतरवाकर रख लो और मुझे मारना चाहो तो मारो। सच्चाई यह है कि पिंडारों से जनता पीड़ित हो रही है, यह देखकर राजदरबार ने फैसला किया कि उनके स्थानादि के बारे में जानकारी इकट्ठी की जाय लेकिन इस कार्य को करने के लिए कोई भी आगे नहीं आया। जब मुझे राजदरबार में कोई मर्द नहीं दिखा, तब मैंने मर्दों-के-मर्द ईश्वर में गोता मारा। शुभ संकल्प फलित करने वाले उस भगवान ने मुझे प्रेरणा दी और मैंने यह बीड़ा उठाया।”

“ऐं…..!” अभयसिंह का डाकूपना उछला लेकिन रूद्रदेव ब्राह्मण शांत भाव से, ‘ॐ आनंद…. सबमे तू…’ इस भगवदभाव से अभयसिंह की ओर देखते रहे। नजर से नजर टकरायी। हिंसक आँखें अहिंसक अमृत में भीग गयीं।

अभयसिंह बोलाः “ब्राह्मण देवता ! मार डाला तुमने। मैं तुम्हारा बिनशर्ती शरणागत बन गया। गुरु ! चलो, मैं तुम्हारी थोड़ी सेवा कर लेता हूँ, तुम्हें पिंडारों की बस्ती दिखा देता हूँ और वे जहाँ इकट्ठे होते हैं वह जगह भी दिखा देता हूँ।”

अभयसिंह ने रूद्रदेव ब्राह्मण को अपना सारा क्षेत्र दिखाया तथा उन्हें पिंडारों के बारे में जो जानकारी चाहिए थी वह बता दी। फिर रूद्रदेव ने राजदरबार में जाकर सारे रहस्यों का उदघाटन किया, जिसे सुनकर सभी लोग दंग रह गये।

राजा बोलाः “अब पिंडारों पर चढ़ाई के बारे में सोचा जाये।”

इतने में एक हट्टा-कट्टा निर्भीक व्यक्ति आगे आकर बोलाः “मैं पिंडारों का मुखिया अभयसिंह हूँ। इन ब्राह्मण की सत्यनिष्ठा एवं परहित की दृष्टिवाली करूणामयी आँखों ने मुझे बिनशर्ती शरणागत बना लिया है। मैं शरणागत हूँ, मेरा जो कुछ भी है, अब गुरुदेव का है। अब फौज भेजने की क्या आवश्यकता है ?”

राजा ने रूद्रदेव ब्राह्मण के चरणों में सिर झुकाया और कहाः “महाराज ! आपकी सत्यनिष्ठा के आगे मैं नतमस्तक हूँ। आज से मैं आपका शिष्य हूँ और अभयसिंह मेरा सेनापति होगा।”

पतंजलि महाराज का वचन हैः

सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम्।

‘सत्य में दृढ़ स्थिति हो जाने पर वह क्रिया फल आश्रय बनती है।’ (पातंजल योगदर्शनः 2.36)

रूद्रदेव ब्राह्मण की सत्यनिष्ठा ने डाकुओं से जनता की रक्षा तो की ही, साथ ही अभयसिंह जैसे डाकू एवं पिंडारा जाति का भी कल्याण कर दिया। आज भी पिंडारा जाति के लोगों को कोई कसम खानी पड़े तो वे कहते हैं- ‘रूद्रदेव ब्राह्मण के चरणों की सौगंध अगर मैंने ऐसा किया हो तो…..’ अगर कोई पिंडारा रूद्रदेव को साक्षी रखकर झूठी कसम खाता है तो उस पर कदुरती आपदाएँ आ पड़ती हैं।

रूद्रदेव ब्राह्मण का शरीर तो नहीं रहा लेकिन उनकी सत्यनिष्ठा तो अभी भी छत्तीसगढ़ के उन इलाकों में सुप्रसिद्ध है। इसलिए बुद्धिमानों को तथा जो स्वयं सुखी होना चाहते हैं व दूसरों का भला करना चाहते हैं उनको सत्य की शरण जाना चाहिए। असत्य बोलने वाला तो स्वयं ही विनाश की ओर जा रहा है, फिर वह दूसरों का क्या भला करेगा।

अभयसिंह डाकू के अंदर कौन था जिसने उसकी क्रूरता को शिष्यत्व में बदल दिया, अशुभ संकल्प को शुभ संकल्प में और हिंसक वृत्ति को अहिंसक वृत्ति में बदल दिया ?… सत्यस्वरूप परमात्मा। जो शुभ संकल्प के रास्ते चार कदम चलता है, परमात्मा और शुभ संकल्पवाले परमात्मा के प्यारे उसके साथ हो जाते हैं। आप सत्य की रक्षा करेंगे, सत्कर्म करेंगे, सज्जनों की रक्षा करेंगे तो ईश्वर की सत्ता आपकी रक्षा करेगी।

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