सत्संग, Bapuji, Guru-Bhakti

गुरु गुरु होते हैं…

 

asaram bapuji , ashram bapuji

गुरु गुरु होते है

गुरुओं  की  कृपा  एवं आत्मीयता  तभी  हमारे अंतःकरण को रंगेगी जब हम उनके साथ श्रद्धा-भक्ति से जुड़ जायेंगे, तदाकार हो जायेंगे । नहीं तो एक-एक विकार को मिटाने के लिए हमें बहुत मजदूरी करनी पड़ेगी ।

गुरु से यदि सच्ची प्रीति जुड़ गयी तो फिर दोष न जाने किस कोने में जाकर क्षीण हो जायेंगे अथवा पलायन कर जायेंगे इसका भी पता नहीं चलेगा । ‘ मुझमें दोष हैं ‘  यह याद करके उन्हें निकालना तो ठीक है लेकिन ऐसे निर्दोष गुरुओं का एवं आत्मा का चिंतन इतना गहरा हो कि दोष की याद ही न आये यह उससे भी अनंतगुना अधिक लाभकारक है ।

भगवान की मूर्ति में और तीर्थ में तो श्रद्धा हो जाती है लेकिन सद्गुरु में श्रद्धा होना कठिन है । सद्गुरु में श्रद्धा होना अर्थात् उनमें कभी कोई भी दोष न देखना। लेकिन… उनमें कभी-न-कभी, कोई-न-कोई दोष, कुछ-न-कुछ कमी दिख ही जायेगी और जैसा दोष अपने चित्त में होगा वैसा दिखेगा जरूर । रामकृष्ण परमहंस के प्रति विवेकानंद की दोष दृष्टि सात बार हुई थी । कभी विवेकानंद को रामकृष्ण परमहंस ने कृपा करके सँभाल लिया तो कभी विवेकानंद ने सच्चे हृदय से प्रायश्चित्त करते हुए माफी माँगते हुए निवेदन कर दिया कि : ‘ मुझे आपके लिए ऐसा-ऐसा भाव आता है । ‘

गुरु के बाह्य व्यवहार को न देखकर गुरु के संकेत को समझना चाहिए । अभी आपके पास गुरुतत्त्व का चश्मा ही नहीं है । अपनी जीवत्व की निगाहों से आप गुरु को कितना और कैसे देखोगे ? अगर गुरु को अपनी तुच्छ मति से मापने-तौलने की कोशिश की तो आपकी खोपड़ीरूपी तराजू टुकड़े-टुकड़े हो जायेगी । गुरु आपकी बुद्धि द्वारा तौलने का विषय नहीं हैं, वरन् गुरु तो गुरु हैं ।

गोरखनाथ के चित्त में भी एक बार कुछ ऐसा ही भाव आ गया था । एक बार उनके गुरु मछन्दरनाथ चल दिये स्त्रियों के देश में । वहाँ की रानी के साथ उनकी शादी भी हो गयी और दो बच्चे भी हो गये । तब लोग गोरखनाथ से कहने  लगे : “ बड़ा आया गुरु का  भक्त ! बड़ा आया मछन्दरनाथ की जय बुलवानेवाला! तेरे गुरु तो भ्रष्ट हो गये… “

गोरखनाथ से नहीं सहा गया । गोरखनाथ सोचने लगे कि : ‘ जहाँ मेरे गुरुदेव पहुँचे हैं उस स्त्रियों के देश में मैं कैसे जाऊँ ? क्योंकि वहाँ तो यति, योगी, त्यागी, साधुओं को प्रवेश की आज्ञा ही नहीं है । राज्य का सारा कार्यभार स्त्रियाँ ही सँभालती हैं । ऐसे देश में जाकर गुरुदेव से संपर्क  कैसे करूँ ? ‘

उस  त्रिया राज्य की रानी ने हनुमानजी को प्रसन्न करके मछन्दरनाथ को पाया था ।

गोरखनाथ ने उस राज्य में जाकर गुरुदेव से संपर्क करने का उपाय खोज लिया । उन्होंने वहाँ की नृत्य-गान करनेवाली नर्तकियों से संपर्क किया और कहा : “ मुझे अपने राजदरबार में ले चलो । “

तब नर्तकियों ने कहा : “ हम तुम्हें नहीं ले जा सकते क्योंकि तुम पुरुष हो । “

“ मुझे स्त्रियों के कपड़े पहनाकर ले चलो । मैं ढोलक तो बजाऊँगा लेकिन पैसा एक भी नहीं लूँगा। “

नर्तकियों में जो मुख्य नर्तकी थी उसने सोचा कि : ‘ ऐसा बिना पैसेवाला और इतना सुन्दर ढोलक बजानेवाला कहाँ मिलेगा ? चलो, इसे ले चलते हैं । ‘

गोरखनाथ को लेकर वे चल प‹डीं राजदरबार की ओर । राजदरबार में जाकर गोरखनाथ ने सारा मामला समझ लिया और नृत्य-गान के समय ढोलक में से आवाज निकाली :

चेत मछन्दर गोरख आया…

चेत मछन्दर गोरख आया…

अब शिष्य के सामने मछन्दरनाथ नृत्य-गान कैसे देख सकते थे ? अतः उन्होंने  सब  नाच-गान करनेवालों को रवाना कर दिया । सबके जाते ही गोरखनाथ ने अपना असली स्वरूप प्रगट कर दिया :

“ अलख ! आदेश । “

गुरुदेव को प्रणाम किया और कहा : “ गुरुदेव ! आप इस चक्कर में कैसे ? “

गुरुदेव ने कहा : “ चलो, वापस चलते हैं किन्तु इन बच्चों को भी ले चलना होगा । “

गोरखनाथ : “ जो आज्ञा । “

गोरखनाथ की श्रद्धा थी गुरुचरणों में । अतः बच्चों को तो वे ले चले किन्तु मन में सोचा कि : ‘ यह कचरा? विरक्त योगी का कैसे ? ‘

मार्ग में बच्चों को हाजत हुई तब मछन्दरनाथ ने कहा : “ जाओ गोरख ! इन्हें ले जाओ और धो-धाकर ठीक कर दो । “

गोरखनाथ उन्हें ले गये तालाब के पास और तालाब में डुबा-डुबाकर, जैसे कपड़े को धोते हैं वैसे ही उन्हें भी धो डाला । शिला पर पटकने से दोनों के प्राणपखेरू उड़ गये । फिर गोरखनाथ उन्हें काँटों की बाड़ पर सुखाकर आ गये ।

मछन्दरनाथ : “ कहाँ गये दोनों ? “

गोरखनाथ : “ गुरुजी ! आपने ही तो कहा था कि दोनों को धो-धाकर ठीक करके आओ तो मैं उन्हें धोकर, ठीक करके, सुखाकर आया हूँ । “

मछन्दरनाथ : “ अच्छा अच्छा, कोई बात नहीं । चलो आगे । “

आगे चलकर मछन्दरनाथ को हाजत हुई अतः उन्होंने गोरखनाथ को झोला देते हुए कहा : “ गोरख! जरा ध्यान रखना । इसमें फिकर है । “

मछन्दरनाथ  तो  लोटा  लेकर  चलते  बने । गोरखनाथ को हुआ कि : ‘ इसमें कौन-सी फिकर   होगी ? ‘  देखा तो सोने की र्इंट ! गोरखनाथ ने र्इंट उठाकर कुएँ में फेंक दी ।

मछन्दरनाथ आये और पूछा : “ बेटा ! इसमें जो फिकर थी, वह कहाँ गयी ? “

गोरखनाथ : “ गुरुजी ! आपने ही तो साधनाकाल में बताया था कि फिकर फेंक कुएँ में तो मैंने गुरु की फिकर कुएँ में फेंक दी । “

यहाँ तक तो गोरखनाथ सत्शिष्य से दिख रहे हैं लेकिन अब… चलते-चलते कोई गाँव आया तब मछन्दरनाथ ने कहा : “ गोरख ! तू जा जरा आगे । मैं बाद में आता हूँ । “

गोरखनाथ आगे निकल पड़े । गाँव में जाकर देखते हैं कि खूब तैयारियाँ हो रही हैं । कहीं तोरण बाँधे जा रहे हैं तो कहीं रंगोली पूरी जा रही है । कहीं मंडप बाँधे जा रहे हैं तो कहीं ब्राह्मण उत्सव की तैयारी में लगे हैं । पूरे गाँव को उत्सव की तैयारी में लगा हुआ देखकर गोरखनाथ ने पूछा :

“ क्या बात है ? “

तब किसीने कहा : “ अरे ! तुम्हें पता नहीं ? गोरखिया के गुरु मछन्दरनाथ १२ साल से यहाँ गुफा में समाधि में बैठे हैं । समाधि से उठकर वे बाहर आ रहे हैं । “

“ क्या ? मछन्दरनाथ  तो  एक  ही  हैं और गोरखनाथ भी तो दूसरा नहीं है । “

“ हाँ हाँ, गोरखनाथ एक ही है । वही गोरख, वही सिद्ध, जिसे अपनी सिद्धाई का बड़ा गर्व है । उसीके गुरु यहाँ १२ साल से रहते हैं । “

“ तुमने कभी देखा भी है गुरुदेव को ? “

“ हाँ हाँ, क्यों नहीं ? हर अमावस, पूनम को हम वैदिक  मंत्रों  का  उच्चारण  करते  हैं और  गुरुदेव मछन्दरनाथ हमें दर्शन देते हैं । “

गोरखनाथ को हुआ कि ‘ ये कौन-से मछन्दरनाथ हैं ? देखना पड़ेगा । ‘  गोरखनाथ ने तो बराबर जासूसी की । गुफा वगैरह सब देखा और चक्कर मारा तो देखा कि गुफा में कहीं से भी घुसने की जगह नहीं थी । फिर वे भी किसी जगह से सारा नजारा देखने लगे ।

समय हुआ । शहनाइयाँ,  बिगुल, बाजे और तुरही आदि बजने लगे । धूप-दीप से वातावरण सुगंधित होने लगा । ब्राह्मणों ने वैदिक मंत्रों का उच्चारण करते-करते गुफा का ताला खोला । गुरुदेव मछन्दरनाथ बाहर पधारे ।

आश्चर्य ! गुरुदेव कल तक तो मेरे साथ थे और आज यहाँ !! यह कैसे संभव हुआ !!!

मछन्दरनाथ बोले : “ क्या देखता है गोरख ? गुरु गुरु होते हैं । “

यह एक जीव में से अनेक जीववाद का सिद्धांत है कि एक ऐसी अवस्था भी आती है कि एक शरीर से योगी तप कर रहा हो, दूसरे शरीर से भोग भोग रहा हो और तीसरे शरीर से भजन कर-करवा रहा हो… ऐसा भी कई योगियों के जीवन में संभव होता है जैसे, श्रीकृष्ण ।

अन्तःकरण में यह सारा सामथ्र्य उस आत्मदेव से ही आता है । जैसे आपके अन्तःकरण में सपने की दुनिया बन जाती है वैसे ही आपके अंतःकरण में इतना प्रगा‹ढ सामथ्र्य भी आ सकता है कि आप एक में से अनेक रूप भी बना सकते हैं । फिर भी तत्त्वज्ञान के आगे यह बहुत छोटी बात है ।

तत्त्वज्ञान पाने के लिए ऐसे गुरु चाहिए कि जो आत्मा-परमात्मा के साक्षात्कार के आगे किसी ऋद्धि-सिद्धि को, किसी चमत्कार को ज्यादा महत्त्व न दें । ऐसे गुरुओं से अगर मुलाकात हो जाये तो बेड़ा पार हो जाय ।

मरे हुए को जिन्दा करने की विद्या भी होती है और जिनको आत्मज्ञान हो गया है उनके चित्त में सहज में संकल्प होने पर भी मृतक व्यक्ति जीवित हो सकता है । मृतक को जीवित करनेवाली संजीवनी विद्या जाननेवालों की अपनी स्थिति होती है लेकिन जब किन्हीं ब्रह्मवेत्ता के चित्त में सहज में स्फुरणा हो जाती है तब ब्रह्मवेत्ता नहीं करता है वरन् ब्रह्म स्वभाव में स्पंदन हो जाता है और मृतक जीवित हो जाता है ।

संजीवनी विद्या से जीवनदान अलग बात है और ब्रह्मवेत्ता महापुरुष के संकल्प से जीवनदान अलग बात है । कभी-कभी सिद्धियाँ आत्मवेत्ता महापुरुष में भी दिखती हैं तो कभी-कभी अज्ञानी जीवों में भी सिद्धियाँ होती हैं । अपने-अपने विषय की साधना करके अज्ञानी जीव भी कुछ-कुछ सिद्धियाँ पा लेते हैं । अष्ट सिद्धियाँ प्राप्त किया हुआ व्यक्ति भी ब्रह्मज्ञानी हो यह जरूरी नहीं है ।

रामकृष्ण परमहंस के पास तोतापुरी गुरु के मिलने से पूर्व ही सिद्धाई थी । माँ काली को पुकारने पर माँ का प्रगट होना यह सिद्धाई नहीं तो क्या है ? फिर भी तोतापुरी सद्गुरु की जब कृपा प्राप्त हुई तभी उन्हें आत्मज्ञान हुआ ।

ऐसी  आत्मज्ञानरूपी  परम  कृपा  बरसानेवाले सद्गुरु जब मिल जाते हैं और सत्शिष्य जब उन्हें समझ लेता है तब काम बन जाता है ।  फिर शिष्य के लिए किसी होम-हवन, यज्ञ-यागादि एवं देवी-देवता की उपासना करना शेष नहीं रहता, वरन् उसके लिए तो सद्गुरु ही उपास्य देव हो जाते हैं ।

सुपात्र मिले  तो  कुपात्र को  दान  दिया  न  दिया,

सत्शिष्य मिला तो कुशिष्य को ज्ञान दिया न दिया ।

सूर्य उदय  हुआ  तो  और  दीया  किया  न  किया,

कहे     कवि     गंग     सुन     शाह    अकबर !

पूर्ण गुरु मिले तो और को नमस्कार किया न किया ।।

ब्रह्मज्ञान पूर्ण ज्ञान है । यह आत्मा और ब्रह्म अभिन्न है ऐसा ज्ञान पूर्ण ज्ञान है । तू देह नहीं है और देह तथा जगत का संबंध मिथ्या है जबकि तेरा और ब्रह्म का संबंध शाश्वत है ऐसा अनुभव करानेवाले पूर्ण गुरु कभी-कभी, कहीं-कहीं, बड़ी मुश्किल से मिलते हैं और मिलते भी हैं तो साधारण जीवों की नार्इं खाने-पीने, पहनने-ओ‹ढनेवाले दिखते हैं । अतः उनमें श्रद्धा होना कठिन होता है ।

ईश्वरोगुरुरात्मेति  मूर्तिभेदे  विभागिनः ।

व्योमवत् व्याप्तदेहाय तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।

गुरु भले सामान्य मनुष्य की तरह दो हाथ-पैरवाले दिखें लेकिन अनंत-अनंत ब्रह्माण्डों में व्याप्त होते हैं । आकाश कितना व्यापक होता है किन्तु वह आकाश भी उनके भीतर होता है इतने वे व्यापक होते हैं । इसलिए शिष्य कभी यह न सोचे कि : ‘ गुरु ने जब मंत्रदीक्षा दी थी केवल उसी समय गुरु मेरे पास थे और अब मैं कहीं जाकर सीधा-टे‹ढा करूँगा तो गुरु को पता नहीं चलेगा । ‘  गुरु भले कहें-न-कहें लेकिन अंतरात्मभाव से गुरु वहाँ भी फटकारते हैं कि : ‘ ऐ ! क्या करता है ? ‘

अगर अच्छा काम करते हैं तो अंतर्यामी रूप से गुरु प्रेरणा भी देते हैं कि : ‘ ठीक है… शाबाश है, बेटा! ‘  प्रत्येक शिष्य को इस बात का अनुभव होगा ।

दीक्षा के निमित्त से गुरु-शिष्य के बीच एक सूक्ष्म तार जुड़ जाता है । अगर आपके चार पैसे के यंत्र ‘ कोर्डलेस ‘  का बटन दबाने पर सेटेलाइट से अमेरिका में घंटी बज सकती है तो यह तो मंत्र है । मंत्र से मन सूक्ष्म, मन से मति सूक्ष्म, मति से जीव सूक्ष्म, जीव से प्रकृति सूक्ष्म और प्रकृति से भी परब्रह्म परमात्मा को पाये हुए महापुरुषों का तत्त्व सूक्ष्म होता है और आपका भी तत्त्व सूक्ष्म है तो गुरु को पता क्यों नहीं चलेगा ? चीज जितनी सूक्ष्म होती है उतनी व्यापक होती है । जितनी सूक्ष्म होती है उतनी ही प्रभावशाली होती है । पानी की एक बूँद को गर्म करो तो वाष्प बनने पर उसमें १३०० गुनी ताकत आ जाती है । ऐसे ही अपने मन को साधन-भजन और संयम से सूक्ष्म कर दो तो उसमें भी बड़ी शक्ति आ जाती है । मन को तो साधन-भजन से सूक्ष्म कर भी लिया लेकिन जिसकी सत्ता से साधन-भजन किया वह तो परम सूक्ष्म है । उसका ज्ञान पा लो तो फिर सूक्ष्म करने की भी जरूरत नहीं पड़ती ।

यह बड़ी सूक्ष्म बात है । इस तत्त्वज्ञान की बात को सुनने का मौका देवताओं को भी नहीं मिलता क्योंकि वे भोग-सुख में ही मस्त रहते हैं । उनके पास बुद्धि तो होती है किन्तु वह बुद्धि भोग-सुख में ही खर्च हो जाती है । आत्मज्ञान में रुचि पुण्यवानों को ही होती है । तुलसीदासजी ने भी कहा है :

बिनु पुन्य पुंज मिलही नहीं संता ।

पुण्य नहीं, पुण्यों का पुंज जब एकत्रित होता है तब संत मिलते हैं, संतों के पास जाने की रुचि होती है । किसीने कहा है कि :

“ अगर सात जन्मों के पुण्य हों तभी आत्म-साक्षात्कारी संत के द्वार पर जाने की इच्छा होती है किन्तु जा नहीं पाते, कोई-न-कोई काम आ जाता है । दूसरे सात जन्म के अर्थात् १४ जन्म के पुण्य जोर करते हैं तब उनके द्वार पर तो जा सकते हैं किन्तु वे आयें उसके पहले ही होगा कि ‘ फिर कभी आयेंगे ‘  या  कार्यक्रम पूरा होने पर ही पहुँच पाते हैं। जब तीसरे सात जन्म के अर्थात् २१ जन्म के पुण्य जोर करते हैं तभी उनके सान्निध्य में, उनके चरणों में पहुँच पाते हैं और उनके दैवी कार्यों एवं अनुभवों से जुड़ पाते हैं । “

वर्तमान समय में विदेशी ताकतों द्वारा भारतीय संस्कृति को नष्ट करने का बड़ा गहरा षड्यंत्र चल रहा है । इसके तहत संस्कृति के आधारस्तम्भ संतों-महापुरुषों को झूठे, कपोलकल्पित, घिनौने मामलों में फँसाकर लोगों की आस्था तथा निष्ठा तोड़ने का कार्य किया जा रहा है, जो कि देशद्रोह है । आज मीडिया द्वारा देश के सम्मानीय लोगों, समाजसेवी संस्थाओं के प्रमुखों यहाँ तक कि हमारे आस्था केन्द्र संत-महापुरुषों के कार्टून बनाकर मजाक उड़ाना इत्यादि असंवैधानिक व निम्न स्तर का कार्य हो रहा है । इससे समाज का नैतिक पतन हो रहा है तथा मानवीय मूल्यों का हनन हो रहा है ।

हाल ही में पूज्य संत श्री आशारामजी बापू को षड्यंत्र के तहत झूठे आरोप लगवाकर फँसाया गया और अब मीडिया द्वारा रोज कुछ-न-कुछ बिना किसी प्रमाण के झूठी व बेबुनियाद खबरें दिखाकर समाज व देश की जनता को गुमराह किया जा रहा है तथा इन खबरों के द्वारा न्याय-प्रणाली पर दबाव डालने की साजिश की जा रही है । देश के संत-समाज एवं साधकगण, विभिन्न धार्मिक एवं सामाजिक संगठनों ने निर्दोष पूज्य बापूजी के खिलाफ हो रही साजिश की निंदा की है एवं विभिन्न संत-सम्मेलनों एवं गोष्ठियों द्वारा बापूजी को अपना पूर्ण समर्थन व्यक्त किया है ।

हम लोग देश की जनता, कार्यपालिका, विधायिका – सबका इस ओर ध्यान आकर्षित कर संत श्री आशारामजी बापू पर लगाये गये झूठे, मनगढ़त आरोपों का पूरी तरह खंडन करते हैं और उनके साथ जो घोर अन्याय एवं अत्याचार हो रहा है, उसका प्रतिवाद करते हैं ।

क्या हा सच्चाई

क्या है सच्चाई – 1

क्या है सच्चाई -2

क्या है सच्चाई -2

षडयंत्र की पूरी वास्तविकता जानिए …

SHADYANTRA KI VASTAVIKTA

आप सभी संतो, साधकों, गुरु-भक्तों और देशवासियों की श्रद्धा सच्चे संतो मे टीकी रहे ऐसी सुभ-कामना के साथ आप सभी को हरी ॐ |

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