सत्संग, Saint and People

श्रद्धा (DEVOTION)

Image

श्रद्धावान, तत्पर और संयमी पुरुष ज्ञान प्राप्त कर लेता है और ज्ञान प्राप्त करके तत्काल ही परमशांति को प्राप्त हो जाता है ।

जिसके जीवन में श्रद्धा नहीं वह पशु और पक्षी जैसा है । जिसके जीवन में श्रद्धा नहीं उसका विकास भी नहीं है । जिसके अंतःकरण में श्रद्धा नहीं उसके जीवन में रस भी नहीं है । श्रद्धा ऐसा अनुपम सद्गुण है कि जिसके हृदय में वह रहता है उसका चित्त श्रद्धेय के सद्गुणों को पा लेता है ।

श्रद्धा सम्बल-सहारा भी है और बल भी है । निर्बल का बल और आश्रय श्रद्धा ही है । अति अहंकारी व्यक्ति श्रद्धा नहीं कर सकता । निर्बल मनवाला मान्यता और कल्पना के संस्कारों को पकड़ रखता है इसलिए उसकी कल्पना के संस्कारों को पकड़ रखता है इसलिए उसकी श्रद्धा टिकती नहीं है । वह घटती-बढ़ती रहती है । परमात्मा में, परमात्म-प्राप्त महापुरुषों में शास्त्रों में श्रद्धा होनी चााहिए । अपने आप पर भी उतनी श्रद्धा होनी चाहिए । जितनी श्रद्धा डगमग होती है उतना ही व्यक्ति का व्यवहार और परमार्थ दोनों में डगमग रहता है । जीवन में अडिग श्रद्धा की आवश्यकता है । जिसके जीवन में श्रद्धा नहीं वह तो कौए से भी बदतर है । कौए का किसी पर भी विश्वास नहीं होता ।

दो प्रकार के मनुष्य सद्गुरु पर श्रद्धा नहीं कर पाते । एक तो महामुर्ख । वे न सद्गुरु को खोज पाते हैं न उन पर श्रद्धा कर पाते हैं । दूसरे जो घमंडी, अहंकारी हैं वे भी शास्त्र, भगवान और सद्गुरु पर श्रद्धा नहीं कर पाते । वे न स्वर्ग पर श्रद्धा कर पाते हैं, न पुण्य में, न पाप में , न ईष्ट में ही श्रद्धा करते हैं । वसिष्ठजी कहते हैं : “ ऐसे पुरुष मर कर वृक्ष आदि योनियों को पाते हैं । “

अपने पिता पर भी श्रद्धा करनी पड़ती है । माता ने बताया कि  – यह पिता है, यह माता है, यह मासा है । इनको श्रद्धा करके ही मानना पड़ता है । बस के ड्राइवर पर भी श्रद्धा करनी पड़ता है । चाय बनानेवाले होटल के नौकर पर भी श्रद्धा करनी पड़ती है कि चाय में जूठा, बासी या छिपकली गिरा हुआ दूध नहीं डाला होगा । अरे ! दाढ़ी बनानेवाले पर श्री श्रद्धा करनी पड़ती है कि गाल पर ही उस्तरा चलायेगा, गले पर नहीं घुमायेगा । यह व्यवहारिक श्रद्धा है । परमतत्त्व परमात्मा को पाने के लिए पारमार्थिक श्रद्धा करनी पड़ती है । जो दुर्बल मनवाला और मान्यताओं का गुलाम है वह अपनी मान्यताओं के विपरीत देखेगा तो उसकी श्रद्धा टूट जायेगी । मजबूत मनवाला आदमी कभी भी, किसी भी अवस्था में रहे, उसकी श्रद्धा टूटती नहीं अपने उद्देश्य के प्रति दृढ़ श्रद्धा हो । अगर आप जप करना चाहते हैं, ध्यान करना चाहते हैं मगर  सोचते हैं कि अभी नहीं परसों करेंगे, दो महीनों के बाद  करेंगे ऐसा ख्याल रखेंगे तो आपको ध्यान और जप में श्रद्धा नहीं है । आपको जिसके प्रति श्रद्धा होती है उसका चिंतन सहज में होने लगता है ।

जीवन में अगर भगवत्प्राप्त महापुरुष, भगवान या शास्त्र के प्रति श्रद्धा नहीं है तो धन, पुत्र, पत्नी, सब सुविधा होते हुये भी अंतर का संगीत नहीं गूँजता, रस नहीं आता । जिसे अंदर से रस नहीं आता वह सिगरेट, दारू, मांस और अण्डे में श्रद्धा रखते हैं । इसलिए वे धनभागी हैं  भक्त जो हरिनाम में, सद्गुरु में एवं  शास्त्र में श्रद्धा करते हैं ।

शास्त्र, भगवान और सदगुरु में श्रद्धा रखनेवाले श्रद्धा के बल से तर जाते हैं । जबकि दूसरे जो भगवान पर श्रद्धा नहीं रख पाते वे क्लब में, डिस्को में अंधश्रद्धा करते हैं । उनकी श्रद्धा अनेक चीजों में होती है । ठोकरें खाते-खाते जीते हैं जैसे नदी में तिनका बहता है वैसे ही नास्तिक, अश्रद्धालु का मन अनेक चीजों में तर्क-वितर्क, कुतर्क में बहता-बहता संसार के कीचड़ में गिरता है । कभी घोड़ा बनता है, कभी गधा बनता है और न चाहते हुये भी समाज की चाकरी में बलात जुटता रहता है । श्रद्धालु अपने आप कर्म करता है इसलिए वह पावन होता है जबकि श्रद्धारहित व्यक्ति से प्रकृति काम लेती है । जो अपने आप कर्म, सेवा करते हैं उनका अंतःकरण शीघ्र स्वच्छ होकर परमात्मरस से पावन होता है । जो अपने आप ईश्वर, शास्त्र, सत्कर्म और समाज के हित में कर्म नहीं कर पाते उनसे प्रकृति बलात् कर्म लेती है । पशु, वृक्ष और नास्तिकों से बलात् काम लिया जाता है ।

श्रद्धा जिसके अंतःकरण में होती है उसे पावन, रसमय, एकाग्र बनाती है और श्रद्धेय का कृपा-प्रसाद करा देती है ।

ऋग्वेद के श्रद्धा सूक्त में आता है कि :

श्रद्धां प्रातर्हवामहे श्रद्धां माध्यन्दिनं परि ।

‘ हम प्रातःकाल में श्रद्धा का आवाहन करते हैं, हम मध्यान्ह में श्रद्धा का आवाहन करते हैं और हम संध्याकाल में भी श्रद्धा का आवाहन करते हैं । ‘

जैसे, हम भगवान की प्रार्थना करते हैं वैसे ही ऋग्वेद के श्रद्धा सूक्त में श्रद्धा की प्रार्थना करते हैं कि :

‘ हे श्रद्धादेवी ! तुम हममें स्थित हो । ‘

यजुर्वेद में भी आया है :

‘ श्रद्धया सत्यमाप्यते । ‘

श्रद्धा से सत्य को पाओ । सामवेद में आता है कि सत्य से सत्य पर, दान से लोभ पर, श्रद्धा से अश्रद्धा पर और अक्रोध से क्रोध पर हम विजय पायें । हमारी श्रद्धा ऐसी हो कि अश्रद्धा को हम कुचल डालें । जिसके जीवन में श्रद्धा एवं दृढ़ता है वह विपरीत परिस्थिति को भी अपने पैरों तले कुचलकर अपनी मंजिल तक पहुँच जायेगा ।

धन्ना जाट में वह श्रद्धा थी कि पत्थर में से भगवान प्रकट हो गये । शबरी में वह श्रद्धा थी कि जिनके दर्शन के लिए मुनि लालायित रहते थे वे भगवान श्रीराम उसके द्वार पर खुद आये ।

मदालसा में श्रद्धा थी कि मेरी कुख से जो जन्म ले वह अज्ञानी कैसे रहे ? और उसने अपने बच्चों को पालने में ही वेदांत का तत्त्वोपदेश देकर ज्ञानी बना दिया ।

अष्टावक्र ने जनक से कहा कि-

श्रद्धत्स्व तात श्रद्धत्स्व नात्र मोहं कुरुष्व भोः ।

ज्ञानस्वरूपो भगवानात्मा त्वं प्रकृतेः परः ।।

‘ हे सौम्य ! हे प्रिय ! श्रद्धा कर श्रद्धा कर । इसमें (संसार में) मोह मत कर । तू प्रकृति से परे ज्ञानस्वरूप ईश्वर, परमात्मा है । ‘

(अष्टावक्रगीता)

तुम श्रद्धा के बल से कुछ बना सकते हो, कुछ बिगाड़ सकते हो । श्रद्धा के बल से किसी के दिल की बात जान सकते हो । अपने साधन पर श्रद्धा रखकर, कहाँ पर क्या हो रहा है यह भी जान सकते हो । एक जगह बैठकर दूर-दूर तक जो चाहो आदेश दे सकते हो । श्रद्धा में ऐसी शक्ति है कि वह दुःख में सुख बना देती है और सुख में सुखानंद स्वरूप परमात्मा का साक्षात्कार करा देती है ।

काम करते समय पूरी सावधानी, तत्परता बरतो । लापरवाही या और कियी भी कारण से कार्य को बिगड़ने मत दो । कर्म को ही पूजा समझकर उसे सुचारू रूप से करो । ध्यान के द्वारा  योग्यता ब‹ढाओ ।

नर-नारी में बसे हुये उस परमात्मा का प्यारा नाम ‘ नारायण… नारायण… ‘ पूरे प्रेम से लेते चलो और कर्म को कर्मयोग बनाते चलो ।

श्रद्धा अचल कैसे हो ?(Shraddha Achal Kaise Ho ?)
Advertisements
Standard

Your Opinion

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s