asaram bapuji

मत छेड़ो शेर की दहाड़ो को

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हिन्दुस्तान (भारत) की भारतीय संस्कृति एक ऐसी विशाल संस्कृति है जिसने एक माँ की तरह सदा ही पूरे विश्व को पोषित किया है । ऐसी एक भारत की संस्कृति ही है जिसने समाज को शांति, आनंद और प्रेम, मितव्ययिता, संयम, सदाचार, माता-पिता का आदर व आपसी भाईचारे की भावना को पुष्ट किया है । भारत ही एक ऐसा देश है, भारतीय संस्कृति ही ऐसी संस्कृति है जिसने पूरे विश्व को सदा ही माँ की तरह प्रेम दिया है । भारत में हर धर्म, हर जाति, हर रंग के लोग आकर शांति पाते हैं, वात्सल्य पाते हैं । भारतीयों ने हमेशा विदेशियों को भी अपनों जैसा स्नेह दिया है । क्योंकि भारत ही एक ऐसा देश है जो कह सकता है ‘ वासुदेवः सर्वं ’ और किसी देश, किसी धर्म, किसी संस्कृति, किसी मजहब में मैंने ऐसा नहीं देखा जो इस वासुदेव की भावना से सेवा व समाजोत्थान के कार्य करे । अरे, भारत में गरीब, दुःखी, अनाथ, असहाय लोगों को भी गरीब कहकर उसका अपमान नहीं किया जाता अपितु दरिद्रनारायण कहकर उसका सम्मान किया है । जिस देश ने दरिद्रों में नारायण की भावना रखकर उनकी पूजार्थ उनकी सेवा का बीड़ा उठाया है, क्या उसी संस्कृति के संत, उसी संस्कृति से पोषित लोग किसीको पीड़ा पहुँचा सकते हैं ? अरे, मैं अपनी बात कहूँ तो मेरी माँ ने भी मुझे बचपन से ही एक चींटी पर भी पाँव रखने से मना किया । उनका बचपन से ही यह कहना था कि चीटीं में भी भगवान की चेतना है । एक चींटी को भी नुकसान न पहुँचा सकनेवाली संस्कृति के संत क्या किसीकी इज्जत लूँट सकते है या हत्या का काम करवा सकते हैं ? और संत भी ऐसे जो पग-पग पर समाज के उत्थान व समाज की उन्नति का कार्य कर रहे हैं, जिनके श्वास-श्वास भी समाजोत्थान के कार्य में समर्पित हैं !

आज देश को जरूरत है जुड़ने की, एकजुट होकर हमारे देश व हमारी परदुःखकातरता को समझनेवाली संस्कृति की रक्षा करने की । क्या चाहता है यह विश्व आज ? अशांति, दुःख, आतंकवाद, बम धमाके, अश्लीलता, शोषित समाज, गोलीबारी या फिर से तृतीय विश्वयुद्ध ? अरे भाई ! बम धमाके, गोलीबारी या युद्ध अथवा अश्लीलता से अगर शांति, अमन का साम्राज्य हो जाता या समाज जुड़ सकता तो प्रथम विश्वयुद्ध में ही पूरी पृथ्वी के सभी धर्म व मजहब के लोग एक हो गये होते । आतंकवाद, बम धमाके, गोलीबारी, अश्लीलता समाज को तोड़ने का एक ऐसा घातक प्रयत्न है जो कभी भी अमन, शांति व सुख से ना खुद रह सकता है, न किसीको सुखी देख सकता है । पर एक संस्कृति है जो आज भी सुख से रह सकती है, अमन से जी सकती है, सभ्यता और संयम की शिक्षा से ओतप्रोत हो समाज को भी उन्नत कर सकती है । जिसका प्रारंभ से ध्येय ही रहा है ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।’

हिन्दुस्तानियों ने सबको अपना माना है, सबसे प्रेम किया है, सबके सुख की भावना की है । क्या वे कभी किसी को दुःख पहुँचा सकते हैं ! नहीं, कभी नहीं, कभी भी नहीं !! तो फिर इसी संस्कृति पर इतना अत्याचार क्यों ? इसी संस्कृति को तोड़ने का प्रयास क्यों ? इसी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करनेवाले संतो पर ही ऐसे झूठ आरोप क्यों ? क्या बिगाड़ा है संतों ने समाज का ? वे तो विश्वमंगल और भाईचारे को ही बढ़ावा देते हैं, समाज को जोड़ते ही हैं, तोड़ते नहीं ।

जरा सोचो :- अरे जिनकी एक आवाज पर सैकड़ो नहीं, हजारों नहीं, लाखों नहीं, करोड़ो-करोड़ो भक्त अपना सिर काटकर रख देने को तैयार हैं, ऐसे संत आज क्यों चुप हैं ? क्यों चुप हैं उनके अनुयायी ? क्या वे कायर हैं ? नहीं, अरे याद रखना, जिस दिन भड़के, उस दिन पूरे देश में ही नहीं, पूरे विश्व में त्राही-त्राही हो सकती है । परंतु यह नहीं सिखाया संत आशारामजी ने अपने भक्तों को । उन्होंने तो सिखाया है : ‘सबका मंगल, सबका भला’ ।

ऐसे झूठे आरोप लगानेवालों को देखकर क्या उनके शिष्यों का दिल नहीं फटता होगा ? अरे ! आग उगलता है – आग !!!

मत छेड़ो शेर की दहाड़ो को,

चीर-फाड़कर रख देंगी ।

मत छेड़ो आग की लपटों को,

जलाकर राख कर देंगी ।।

ललकारो मत ज्वालामुखी की ज्वालाओं के भभकारों को,

क्या जाने ये उगलती,

सैलाब सबको राख कर देंगी ।।

संत तो संत हैं । जिन्होंने कभी किसीका बुरा नहीं चाहा । अरे इतना होने के बाद भी संत आशाराम बापू ने कभी किसीके लिए एक अपशब्द भी नहीं कहा । अरे किसीका नाम लेकर गुमराह करने की कोशिश तो दूर, कभी समाज को इसका एहसास तक नहीं होने दिया । जाकर देखो उनके आश्रमों में, उनके हाल ही में हुए सत्संगों में, उनके सान्निध्य में… अभी भी वही शांति, वही आनंद, वही विश्व-मांगल्य की भावना ! क्या है उनका हृदय ! क्या है उनकी संतताई ! क्या है उनके हृदय की भावना !

कभी बालकों की बलि का आरोप, कभी तांत्रिक गतिविधियों का आरोप,  कभी उनके द्वारा चलाये जा रहे महिला उत्थान आश्रम पर आरोप, कभी तांत्रिक को सुपारी देने का आरोप और अब झूठे चारित्रिक आरोप… । कैसे झूठे, गंदे, बोगस आरोप लग रहे हैं ! अरे पथभ्रष्ट मित्रों ! जरा ये तो सोचो कि तुम अपने ही जाल में खुद फँसे जा रहे हो, संत को बदनाम करने की कोशिश में आप खुद अपने झूठ का पर्दाफाश कर रहे हो । आपके ये झूठे वाक्य, झूठे शब्द ही आपके कहे पहले के सभी झूठों पर पानी फेर देते हैं । बापू के आश्रमों को सी.आई.डी. एवं एफ.एस.एल. टीम की जाँच के बाद डी.आई.जी. श्री जी.एस. मलिक ने मीडिया को जानकारी देते हुए कहा : यहाँ सामान्य वैदिक पूजा का ही सामान है, ऐसा कोई तांत्रिक का कुछ नहीं ।’ इतना होने पर भी कुछ पैसे के लालची मिडियावालों ने सत्य प्रसारित करने के बजाय नित्य झूठ ही प्रसारित किया । अरे जब सी.आई.डी. ने सत्य सामने किया तो इन षड्यंत्रकारियों से फिर भी रहा नहीं गया क्योंकि उन्होंने संस्कृति व संतों को बदनाम करने का ठेका जो उठाया है । पर कहा जाता है कि चोर कितनी भी चतुराई से चोरी करे पर कोई निशान छोड़ ही जाता है । इसी तरह ‘बापू ने तांत्रिक को सुपारी दी’- इस झूठ ने पूर्व में प्रचारित सभी झूठी बातों पर पानी फेर दिया । मान लो, ऐसी झूठी बातों को अगर आप सच कहते हैं तो जरा ये तो देखो कि आशाराम बापू को आपने साफ सिद्ध कर दिया कि बापूजी और आश्रम किसी भी तांत्रिक गतिविधि से अलग हैं क्योंकि अगर आश्रम और बापूजी तांत्रिक होते तो दूसरे तांत्रिक को सुपारी क्यों देते ? इस तरह षड्यंत्रकारी खुद की ही बातों को खुद ही के मुँह से झूठा साबित कर दिया था और जब उनके पिछले सभी झूठ विफल हो गये तब चारित्र्यहीनता आरोप में कितना सत्य होगा यह सभी देशवासी स्वयं ही समझ सकते हैं ।

आशाराम बापू के तो अनेक गुरुकुल चलते हैं, जिनमें हजारों की संख्या में बच्चे पढ़ते हैं । हजारों-लाखों समर्पित साधक समाजोत्थान, विश्व-मंगल के लिए उनके आश्रमों में रहते हैं । गरीब, बेरोजगार लोगों के लिए उनके द्वारा चलाये जा रहे नित्य मुफ्त ‘भजन करो, भोजन करो और ३० रुपये भी ले जाओ’, राशन कार्ड द्वारा मुफ्त अनाज व सामान्य जरूरत की वस्तुओं, उनके द्वारा अकाल पीड़ितो, पीड़ितों, बाढ़-पीड़ितों, भूकम्प-पीड़ितों व दरिद्रनारायणों, पिछड़ी जातियों के भील लोगों को निःशुल्क शिक्षा, भोजन, सामान्य जरूरत की वस्तुएँ तथा मकान भी निःशुल्क ही दिये जाते हैं । न जाने कितनों का पालन करते हैं बापू ! ऐसे लाखों-लाखों के पालनहारे, करोड़ो को मार्गदर्शन देकर समाज को उन्नत करनेवाले आशाराम बापू क्या किसीके लिए ऐसा घृणित कर सकते है ? या सोच भी सकते हैं ? अरे बोलनेवालों ! जरा-सी तो सामान्य मति रखो कि कब, क्या और किसके लिए बोलना चाहिए । अब अगर इतने पर भी बापूजी समाज को शांति बनाये रखने के लिए कह रहे हैं तो समाज खुद ही विचार करे कि बापू समाज व विश्व का मंगल चाहते हैं कि नहीं ?

मैं तो एक छोटी-सी सलाह देना चाहूँगा :-

अगर समझ है इतनी भी,

तो जरा आँख उठाकर देख ले ।

उगता सूरज रोज यहाँ,

उल्लू की नजर मिटाकर देख ले ।।

चमगादड़ और निशाचरों के,

लिए प्रभात नहीं होती ।

कौवे और कुत्तों में कोयल सी,

मिठास नहीं होती ।।

आँखें खोलकर पढ़ो जरा,

इतिहास और पुराणों को ।

निंदा करनेवालों की,

कभी जयकार नहीं होती ।।

कभी भूलकर मत छेड़ो तुम,

इन ईश्वर के प्यारों को ।

आतंक मचानेवालों की तो,

राख भी आज नहीं होती ।।

याद रखना कि अगर,

आपने छेड़ा उनके शिष्यों को ।

तो प्रकृति माता में भी,

ज्यादा बर्दाश्त नहीं होती ।

ज्यादा बर्दाश्त नहीं होती ।।

|| हरी ॐ शांति || || हरी ॐ शांति || || हरी ॐ शांति ||

—  नरेश कुमार छाबड़ा

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