Saint and People

सार्इं टेऊँराम

Image

वृक्ष कबहुँ नहीं फल भखै, नदी न पीवे नीर ।

परमारथ के कारने, साधु धरा शरीर ।।

जैसे वृक्ष अपने फलों को स्वयं भी कभी नहीं खाता, सरिता अपने नीर का स्वयं पान कभी नहीं करती वैसे ही संतों का जीवन भी अपने लिए नहीं होता । हालांकि संतों की यश-कीर्ति से जलनेवाले लोग उनकी यश-कीर्ति को धूमिल करने के बहुतेरे प्रयास करते हैं । किन्तु इन सबकी परवाह न करते हुए वे संतजन अपने जीवन को परहित में ही व्यतीत कर देते हैं । उनका जीवन तो बस, मानवमात्र को दुःखों से छुटकारा दिलवाकर उनके भीतर शांति एवं आनंद भरने में ही खर्च होता है ।

सिंध प्रांत में ऐसे ही एक महान संत हो गये- सार्इं टेऊँराम । उनके सान्निध्य को पाकर लोग बहुत खुशहाल रहते थे । निगाहमात्र से ही लोगों में शांति एवं आनंद का संचार कर देने की शक्ति उनमें थी । उनके सत्संग में मात्र वृद्ध स्त्री-पुरुष ही नहीं, कई युवान-युवतियाँ भी आते थे । उनकी बढ़ती प्रसिद्धि एवं उनके प्रति लोगों के प्रेम को देखकर कई तथा-कथित समाजसुधारकों को तकलीफ होने लगी । समाजसुधारक भी दो प्रकार के लोग होते हैं एक तो सज्जन लोग होते हैं और दूसरे वे लोग होते हैं जो दूसरों के यश को देखकर जलते हैं । उनको होता है कि कैसे भी करके अपनी प्रसिद्धि हो जाये । ऐसे ही कुछ मलिन मुरादवालों ने सार्इं टेऊँराम का कुप्रचार शुरू कर दिया । कुप्रचार ने इतना जोर पकड़ा, इतना जोर पकड़ा कि कुछ भोलेभाले सज्जन लोगों ने सार्इं टेऊँराम के पास जाना बंद कर दिया । उस वक्त के सज्जनों की यह बड़ी भारी गलती रही । उन्होंने सोचा कि ‘अपना क्या ? जो करेगा सो भरेगा ।’

अरे ! कुप्रचार करनेवाले क्यों कुप्रचार करते ही रहें ? वे बिचारे करें और फिर भरें उससे पहले ही तुम उन्हें आँखें दिखा दो ताकि वे दुष्कर्म करें भी नहीं और भरें भी नहीं । समाज की बरबादी न हो, समाज गुमराह न हो । खैर… सार्इं टेऊँराम की निंदा एवं कुप्रचार ने आखिरकार इतना जोर पकड़ा कि नगर पालिका में एक प्रस्ताव पास किया गया कि सार्इं टेऊँराम के आश्रम में जो लड़के-लड़कियाँ जायेंगे उनके माता-पिता को पाँच रूपये जुर्माना भरना पड़ेगा । उस वक्त पाँच रूपये की कीमत बहुत थी । ७८ रूपये तोला सोने की कीमत थी तब की यह बात है । सौ रूपये दान करना तो अच्छी बात है लेकिन दंड भरना, यह तो बड़ी लज्जा की बात है । कुछ कमजोर मन के लोग थे उन्होंने तो अपने बेटे-बेटियों को सार्इं टेऊँराम के आश्रम में जाने से रोका । कुछ लड़के-लड़कियाँ तो रुक गये । लेकिन जिनको महापुरुष की कृपा का स्वाद ठीक से समझ में आ गया था वे नहीं रुके । उनकी अंतरात्मा तो मानो कहती हो कि :

हमें रोक सके ये जमाने में दम नहीं । हमसे जमाना है जमाने से हम नहीं ।।

बीड़ी-सिगरेटवाला बीड़ी-सिगरेट नहीं छोड़ता, शराबी शराब नहीं छोड़ता, जुआरी जुआ खेलना नहीं छोड़ता, तो वे समझदार, सत्संगी युवक-युवतियाँ गुरु के द्वार पर जाना कैसे छोड़ देते ? पास करनेवालों ने तो पाँच रूपये का जुर्माना पास कर दिया किन्तु सच्चे भक्तों ने सार्इं टेऊँराम के आश्रम में जाना नहीं छोड़ा । हमारी जिनके प्रति श्रद्धा होती है, उनके लिए हमारे चित्त में सुख की भावना होती है चाहे फिर रामभक्त शबरी हो या कृष्णभक्त मीरा । उनके हृदय में अपने आराध्य के लिए सुख देने की ही भावना थी । सार्इं टेऊँराम के शिष्य भी अपने गुरु की प्रसन्नता के लिए प्रयत्नशील रहते थे । अपने गुरु के प्रति अपने अहोभाव को प्रदर्शित करने के लिए अपनी-अपनी सामथ्र्य के अनुसार पत्र-पुष्पादि अर्पित करते थे । इसे देखकर दुष्टजनों के हृदय में बड़ी ईष्र्या उत्पन्न होती थी । अतः उन्होंने कुप्रचार करने के साथ-साथ पाँच रूपये दंड का प्रस्ताव भी पास करवा लिया । कुछ ढीले-ढाले लोग नहीं आते थे, बाकी के सार्इं टेऊँराम के प्यारों ने तो आश्रम जाना जारी ही रखा । ईश्वर के पथ के पथिक इसी प्रकार वीर होते हैं । उनके जीवन में चाहे हजार विघ्न-बाधाएँ आ जायें किन्तु वे अपने लक्ष्य से च्युत नहीं होते । अनेक अफवाहें एवं निंदाजनक बातें सुनकर भी उनका हृदय गुरुभक्ति से विचलित नहीं होता क्योंकि वे गुरुकृपा के महत्त्व को ठीक से समझते हैं, गुरु के महत्त्व को जानते हैं । अपने सद्गुरु श्री तोतापुरी महाराज में श्री रामकृष्ण परमहंस की अडिग श्रद्धा थी । एक बार किसीने आकर उनसे कहा : ‘‘तोतापुरी महाराज फलानी महिला के घर बैठकर खा रहे हैं । उन्हें आपने गुरु बनाया ?’’

रामकृष्ण : ‘‘अरे ! बकवास मत कर । मेरे गुरुदेव के प्रति एक भी अपशब्द कहा तो ठीक न होगा ।’’ ‘‘किन्तु हम तो आपका भला चाहते हैं । आप तो माँ काली के साथ बात करते थे… इतने महान होकर भी तोतापुरी को गुरु माना ! थोड़ा तो विचार करें । वे तो ऐसे ही हैं । रामकृष्ण बोल पड़े : ‘‘मेरे गुरु कलाल खाने जायें तो भी मेरे गुरु मेरे लिए तो साक्षात् नन्दराय ही हैं ।’’

यह है श्रद्धा । ऐसे लोग तर जाते हैं । बाकी के लोग आधे में ही मर जाते हैं । …तो वे सार्इं टेऊँराम के प्यारे कैसे भी करके पहुँच जाते थे अपने गुरु के द्वार पर । माता-पिता को कहीं बाहर जाना होता तब लड़का-लड़की कहीं भागकर आश्रम न चले जायें यह सोचकर माता-पिता अपने बेटों को खटिया के पाये से बाँध देते और उन्हें बरामदे में रखकर बाहर से ताला लगाकर चले जाते । फिर सत्संग के प्रेमी लड़के क्या करते… खटिया को हिला-डिलाकर तोड़ देते एवं जिस पाये से उनका हाथ बँधा होता उस बँधे पाये के साथ ही सार्इं टेऊँराम के आश्रम पहुँच जाते और सार्इं टेऊँराम से खुलवा लेते । सार्इं टेऊँराम एवं अन्य साधक उनके बंधनों को खोल देते । जब लोगों ने देखा कि ये लोग तो खटिया के पाये समेत आश्रम पहुँच जाते हैं । अब क्या करें ?

उन दुर्बुद्धियों ने फिर एक प्रस्ताव पास कर लिया कि नगर में मरनेवाले पशुओं को लाकर सार्इं टेऊँराम के आश्रम के आसपास डाल दिया जाये । नगरपालिका के लोग मरे हुए ढोरों को वहाँ फेंक जाते । कितना अत्याचार ।

किन्तु सहनशीलता के मूर्तिमंत रूप सार्इं टेऊँराम गह्ने खोदकर नमक डालकर उन पशुओं को गाड़ देते । इसमें उनके शिष्य उन्हें सहाय करते । सार्इं टेऊँराम अपने आश्रम में ही अनाज उगाते थे । जब कुप्रचारकों ने देखा कि हमारा यह दाँव भी विफल जा रहा है तो उन्होंने एक नया फरमान जारी करवा दिया कि कोई भी दुकानदार सार्इं टेऊँराम के आश्रम की कोई भी वस्तु न खरीदे अन्यथा उस पर जुर्माना किया जायेगा । जब इतने से भी सार्इं टेऊँराम की समता, सहनशीलता में कोई फर्क नहीं आया एवं उनके साधकों की श्रद्धा यथावत् देखी तो उन नराधमों ने, आश्रम जिस कुँए के जल का उपयोग करता था उसमें केरोसीन (मिट्टी का तेल) डाल दिया । क्या नीचता की पराकाष्ठा है । कितना घोर अत्याचार ! लेकिन सार्इं टेऊँराम भी पक्के थे । संत-महापुरुष कच्ची मिट्टी के थोड़े-ही होते हैं ? भगवान की छाती पर खेलने की उनकी ताकत होती है । कई बार भगवान अपने प्राण को त्यागकर भी भक्तों की, संतों की बात रख लेते हैं, जैसे, भीष्म पितामह के संकल्प को पूरा करने के लिए भगवान ने अपने हथियार न उठाने के प्रण को छोड़ दिया था ।

सार्इं टेऊँराम के कुप्रचार से एक ओर जहाँ कमजोर मनवालों की श्रद्धा डगमगाती वहीं उनके प्यारों का प्रेम उनके प्रति दिन-ब-दिन बढ़ता जाता । सार्इं टेऊँराम अपने आश्रम में एक चबूतरे पर बैठकर सत्संग करते थे । उनके पास अन्य साधु-संत भी आते थे । अतः वह चबूतरा छोटा पड़ता था । यह सोचकर उनके भक्तों ने उस चबूतरे को बड़ा बनवा दिया । बड़े चबूतरे को देखकर उनके विरोधी ईष्र्या से जल उठे एवं वहाँ के तहसीलदार को बुला लाये । उसने आकर कहा कि यह चबूतरा अनधिकृत रूप से बनाया गया है जिसके कारण सड़क छोटी हो गयी है एवं लोगों को आने-जाने में परेशानी होती है । अतः इस चबूतरे  को तोड़ देना चाहिए । यह कहकर उसने सार्इं टेऊँराम के विरुद्ध मामला दर्ज कर दिया एवं उन्हें अदालत में उपस्थित होने को कहा । किन्तु निश्चित समय पर सार्इं टेऊँराम अदालत में उपस्थित न हुए । दूसरे दिन जब वे स्नान करके तालाब से लौटे तो देखा कि चबूतरा टूटा हुआ है । संत तो सहन कर भी लेते हैं किन्तु प्रकृति से उनका विरोध सहा नहीं जाता । कुछ समय के पश्चात् उस तहसीलदार का स्थानांतरण दूसरी जगह हो गया । उसकी जगह दूसरा तहसीलदार आया वह बड़ा श्रद्धालु और भक्त था । अतः उसने पुनः  वह चबूतरा बनवा दिया । जिन्होंने सार्इं टेऊँराम को अपमानित करने की कोशिश की, लज्जित और बदनाम करने की कोशिश की, उनकी तो कोई दाल नहीं गली । जिन्होंने सार्इं टेऊँराम को निन्दित करने का प्रयास किया, उनका कुप्रचार करके उनकी कीर्ति को कलंकित करने का प्रयास किया । उनमें से किसीका बेटा मर गया तो किसीको लकवा हो गया, कोई पागल हो गया तो कोई पुत्रसुख से वंचित् हो गया और न जाने कितने अशान्ति की आग में जलते रहे । वे आज न जाने किस नरक में होंगे ? लेकिन सार्इं टेऊँराम के पावन यश की सौरभ आज भी चतुर्दिक प्रसारित होकर अनेक दिलों को पावन कर रही है । ऐसे ही संत श्री आशारामजी बापू का यश आनेवाले समय में ऐसा फैलेगा की पूर्व के सभी संतों-महापुरुषों-अवतारों के यश को पीछे छोड़ देगा | पूज्य संत श्री आशारामजी बापू के भक्तों-साधकों-शिष्यों को जो दिव्य अनुभूतियाँ हुई है उनसे अभी दुनिया बेखबर है, जब वो समाचार मीडिया के द्वारा लोगो के सामने आयेगा, तब लोग दांतों तले उंगलिया दबा देंगे और उनका सिर पूज्य बापूजी के चरणों में आदर से नत-मस्तक हो जायेगा | हरी ॐ

Advertisements
Standard

Your Opinion

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s