ईश्वर प्राप्ति

Shraddha ki pariskha (श्रद्धा की परीक्षा ) – Asaramji Bapu


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Shraddha ki pariskha (श्रद्धा की परीक्षा ) – Asaramji Bapu

श्रद्धा वह प्रकाश है जो आत्मा की, सत्य की प्राप्ति के लिए बनाये गए मार्ग को दिखावा रहता है। श्रद्धा की परीक्षा, जब भी मनुष्य एक क्षण के लिए लौकिक चमक-दमक, कामिनी और कंचन के लिये मोहग्रस्त होता है तो माता की तरह ठण्डे जल से मुँह धोकर जगा देने वाली शक्ति यह .. आसाराम बापूजी , श्रद्धा का अर्थ है–”सत्य में धारण करना”। ”श्रत्” अर्थात् सत्य, ”धा” अर्थात् ”धारण करना।” संसार की प्रत्येक वस्तु का विकास सत्य की तरफ है। अगर कहीं असत्य का प्राबल्य भी दीखता है तो सामयिक है, वह अपनी प्रतिक्रिया को उत्पन्न कर रहा होता है। सलिए सफलता तक पहुंचने के लिए बहुत जरूरी है पवित्र लक्ष्य के साथ जुड़ी अखंड श्रद्धा का होना। भारतीय जनमानस श्रद्धा प्रधान रहा है। श्रद्धावान व्यक्ति ही ज्ञान संपन्न और चरित्र संपन्न बनता है। श्रद्धा का अर्थ है सघन इच्छा अथवा … भक्त प्रह्लाद, स्वामी विवेकानंद , घाटवाले बाबा, निर्भयता, भजन , चमत्कार, तत्वज्ञान में हिलाने वाली बातें, ॐ

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Abhyas, Awesome, ईश्वर प्राप्ति, उद्देश्य, कथा अमृत, जीवन, ध्यान की विधियाँ, ध्यानामृत, प्रार्थना, बापू के बच्चे नही रहते कच्चे, भगवान की खोज, यौगिक प्रयोग, विचार विमर्श, विवेक जागृति, संत वाणी, संस्कार सिंचन, सत्संग, सनातन संस्कृति, साधक, Bapuji

गुरूभक्त का लक्ष्य !!


हर गुरूभक्त को पढ़ना चाहिए..

शिष्य का एक ही लक्ष्य होता है, पूर्ण रूप से गुरु मे विलीन हो जाना | अपना संपूर्ण अस्तित्व को समाप्त कर पूर्ण गुरुरूपेण हो जाना | इस सत्य को वही समझ सकते हैं,जिन्होने गुरु भक्ति एवं गुरु तत्व को जीवन मे अपनाया है | शेष वे लोग जो साधना को मात्र चमत्कार दिखाने वाली सिद्धि प्राप्त करने का माध्यम मानते है, यह सत्य उनके समझ नही आएगा |

एक गुरु भक्त को चाहिए कि वे बार-बार गुरु से मिले, चाहे काम हो या ना हो | जिससे कि वे गुरु से दीक्षा ले और सतत साधना करता हुआ अनेक बार दीक्षा ले | दीक्षा/शक्तिपात द्वारा गुरुदेव शिष्य के कर्म काट कर उसके चित्त को स्वच्छ-उज्जवल बनाते है | साधना के पथ पर आगे बढ़ाते हैं |
शिष्य को चाहिए कि वो गुरु मंत्र का रोज जाप करे, नियमित-निरंतर-निर्बाध रूप से गुरु मंत्र का जाप करे | गुरु मंत्र से शिष्य का जीवन तर जाता है | अंतःकरण का परिष्कार होता है, कर्म बंधन शिथिल होते है, चक्रों मे उर्जा आती है, कुण्डलिनी जागरण होता है | गुरु मंत्र का महात्म लिखना इस कागज कलम के बस की बात नही | कई गुरु भाई गुरुमंत्र जप द्वारा साक्षात सद्गुरुदेव के दर्शन करते हैं | किसी ख़ास विधि की जरूरत नही, ज़रूरत है बस श्रद्धा-समर्पण-विश्वास की नियमितता-निरंतरता की |

शिष्य को चाहिए कि वे गुरु-सेवा करे | यदि साक्षात गुरु से मिलना संभव ना हो तो गुरु का कार्य ही गुरु की सच्ची सेवा होती है | शिष्य पूरे तन-मन धन से गुरु का कार्य करे | गुरु कार्य में अपना समय-धन-श्रम-साधन-परिवार को होम कर दे | गुरु के संतोष मात्र से शिष्य के करोड़ो जन्मो के व्रत-अनुष्ठान सफल हो जाते हैं |

शिष्य को बीज बनना चाहिए | एक बीज मे पूर्ण वृक्ष होने की क्षमता होती हैं, परन्तु वह कुछ प्राप्त नही करना चाहता | एक बीज तो सिर्फ़ गलना जानता है, अपने आप को मिट्टी मे मिला देना और समाप्त कर देना ही बीज का उद्देश्य होता है और वो कर भी देता है | फिर ईश्वर खाद-पानी की दिव्य वर्षा कर उस मिट चुके बीज को वृक्ष होने का वरदान देते है | कल का छोटा सा बीज आज पूर्ण वृक्ष बन जाता है, छाँव देता है, फल देता है, और अपने जैसे अनेक नये बीज पैदा कर देता है| शिष्य को भी बीज रूप मे गलना-ढ़लना चाहिए | काम-क्रोध-मद-लोभ-दंभ-दुर्भाव-अहंकार को समाप्त करते हुए अपने अस्तित्व को गुरु चरणों में न्यौछावर कर दें | जैसे ही हमारा समर्पण पूर्ण होता है, गुरुकृपा की अमृत वर्षा होती है और वो शिष्य को पूर्ण वृक्ष मे बदल देती है | शिष्य को पूर्णता का वरदान मिलता है और वो निखिलमय हो जाता है |

शिष्य को चाहिए कि वो नदी की तरह बहना सीखे | एक नदी तब-तक बहती रहती है जब तक वो समुद्र से मिल नही जाती | रास्ते मे आने वाली हर बाधा को पार करती हुई नदी समुद्र मे मिल कर शांत हो जाती है | शिष्य को भी नदी की भांति सदैव साधना पुरुषार्थ मे लगे रहना चाहिए जब तक वह परमात्मा मे पूर्ण रूप से समाहित नही हो जाता | रास्ते में आने वाली हर बाधा घर-परिवार-रिश्तेदार-आंतरिक दुर्बलता-बाहरी विपत्ति को पार करता हुआ वीर भाव से सतत साधनात्मक पुरुषार्थ करता हुआ जीवन भर चलता रहे | ना रुके ना थके तो वो भी एक ना एक दिन समुद्र मे अवश्य समाहित हो जाएगा |

एक शिष्य को सदैव इन 5 बातों का ध्यान रखना चाहिए :
1) अहंकार की समाप्ति
2) आसक्ति की समाप्ति
3) मोह की समाप्ति
4) अपस्मा-चोरी करने की प्रवृति की समाप्ति
5) गुरु भक्ति मे कभी किसी परिस्थिति में भी न्यूनता ना आने देना…

रोज रात मे सोने से पहले अपना आत्मनिरीक्षण कर देखना चाहिए कि आज मैने अहंकार, आसक्ति, मोह, अपस्मा, भक्ति मे कुछ गड़बड़ तो नही करी | ग़लतियों के लिए गुरुदेव से क्षमा माँगते हुए फिर ना करने का संकल्प लेना चाहियें | इस प्रकार साधक-शिष्य-गुरुमय होता हुआ अपने लक्ष को अवश्य ही पा लेता है |

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ॐ की महिमा !


ॐ , ओउम् तीन अक्षरों से बना है।

“अ उ म्” ।

“अ” का अर्थ है उत्पन्न होना,

“उ” का तात्पर्य है उठना, उड़ना अर्थात् विकास,

“म” का मतलब है मौन हो जाना अर्थात् “ब्रह्मलीन” हो जाना।

ॐ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और पूरी सृष्टि का द्योतक है।

ॐ का उच्चारण शारीरिक लाभ प्रदान करता है।

जानिए “ॐ”  कैसे है स्वास्थ्यवर्द्धक और अपनाएं आरोग्य के लिए ॐ के उच्चारण का मार्ग…

  1. ॐ और थायराॅयडः-
    ॐ का उच्‍चारण करने से गले में कंपन पैदा होती है जो थायरायड ग्रंथि पर सकारात्मक प्रभाव डालता है।

  2. ॐ और घबराहटः-
    अगर आपको घबराहट या अधीरता होती है तो ॐ के उच्चारण से उत्तम कुछ भी नहीं।

  3. ॐ और तनावः-
    यह शरीर के विषैले तत्त्वों को दूर करता है, अर्थात तनाव के कारण पैदा होने वाले द्रव्यों पर नियंत्रण करता है।

  4. ॐ और खून का प्रवाहः-
    यह हृदय और ख़ून के प्रवाह को संतुलित रखता है।

  5. ॐ और पाचनः-
    ॐ के उच्चारण से पाचन शक्ति तेज़ होती है।

  6. ॐ लाए स्फूर्तिः-
    इससे शरीर में फिर से युवावस्था वाली स्फूर्ति का संचार होता है।

  7. ॐ और थकान:-
    थकान से बचाने के लिए इससे उत्तम उपाय कुछ और नहीं।

  8. ॐ और नींदः-
    नींद न आने की समस्या इससे कुछ ही समय में दूर हो जाती है। रात को सोते समय नींद आने तक मन में इसको करने से निश्चिंत नींद आएगी।

  9. ॐ और फेफड़े:-
    कुछ विशेष प्राणायाम के साथ इसे करने से फेफड़ों में मज़बूती आती है।

  10. ॐ और रीढ़ की हड्डी:-
    ॐ के पहले शब्‍द का उच्‍चारण करने से कंपन पैदा होती है। इन कंपन से रीढ़ की हड्डी प्रभावित होती है और इसकी क्षमता बढ़ जाती है।

  11. ॐ दूर करे तनावः-
    ॐ का उच्चारण करने से पूरा शरीर तनाव-रहित हो जाता है।

आशा है आप अब कुछ समय जरुर ॐ का उच्चारण  करेंगे। साथ ही साथ इसे उन लोगों तक भी जरूर पहुंचायेगे जिनकी आपको फिक्र है |
“पहला सुख निरोगी काया” !!

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ईश्वर प्राप्ति, ऋषि दर्शन, ध्यानामृत

मानव धर्म


pujya asaramji bapu

Pujya Asaramji Bapu

 

मानव’ शब्द का अर्थ है मनु की संतान। ‘मनु’ शब्द का मूल है – मनन। मननात् मनुः। मनु की पत्नी है शतरूपा। मानवजीवन में ज्ञान की पूर्णता एवं श्रद्धा अनेक रूपों में प्रगट होती है। कहीं आँखों से प्रगट होती है, कहीं हाथ जोड़ने से प्रगट होती है, कहीं सिर झुकाने से, कहीं बोलने से और कहीं आदर देने से प्रगट होती है। श्रद्धा ज्ञान की सहचारिणी है। कभी अकेला ज्ञान शुष्क हो जाता है तो श्रद्धा ज्ञान को मधुरता प्रदान करती है, सदभाव प्रदान करती है, भक्ति प्रदान करती है।

जीवन में न शुष्क ज्ञान चाहिए और न ही अज्ञानपूर्ण श्रद्धा। श्रद्धा में चाहिए तत्त्वज्ञान एवं संयम तथा ज्ञान में चाहिए श्रद्धा। मनु एवं शतरूपा के संयोग से बनता है मानव। मानव के जीवन में चाहिए ज्ञान एवं श्रद्धा का समन्वय। केवल श्रद्धा की प्रधानता से वह अंधा न बने और केवल ज्ञान की प्रधानता से वह उद्दण्ड और उच्छृंखल न बने – इस हेतु दोनों का जीवन में होना अनिवार्य है।

शास्त्रों में आया है कि सभी प्राणियों में मानव श्रेष्ठ है किन्तु केवल इतने से ही आप मान लो कि ‘हाँ, हम वास्तव में मानव हैं एवं इतर (अन्य) प्राणियों से श्रेष्ठ हैं’ – यह पर्याप्त नहीं है। इस श्रेष्ठता को सिद्ध करने की जवाबदारी भी मानव के ऊपर है। केवल दस्तावेज के बल पर कोई मनुष्य श्रेष्ठ नहीं हो जाता। उसे तो अपनी जीवन-शैली एवं रहन-सहन से साबित करना पड़ता हैः “मैं मानव हूँ, मानव कहलाने के लिए ये गुण मेरे जीवन में हैं और मानवता से पतित करने वाले इन-इन दुर्गुणों से मैं दूर रहता हूँ।”

यहाँ हम मानवता में जो दोष प्रविष्ट हो जाते हैं, उनकी चर्चा करेंगे। ‘मनुस्मृति’ कहती है कि मानवजीवन में दस दोष का पाप नहीं होने चाहिए – चार वाणी के पाप, तीन मान के पाप एवं तीन शरीर के पाप। अब क्रमानुसार देखें।

वाणी के चार पापः

परुष भाषण अर्थात् कठोर वाणीः कभी-भी कड़वी बात नहीं बोलनी चाहिए। किसी भी बात को मृदुता से, मधुरता से एवं अपने हृदय का प्रेम उसमें मिलाकर फिर कहना चाहिए। कठोर वाणी का सर्वथा त्याग कर देना चाहिए।

गुरु ने शिष्य को किसी घर के मालिक की तलाश करने के लिए भेजा। शिष्य जरा ऐसा ही था – अधूरे लक्षणवाला। उसने घर की महिला से पूछाः

“ए माई ! तेरा आदमी कहाँ है ?”

महिला क्रोधित हो गयी और उसने चेले को भगा दिया। फिर गुरुजी स्वयं गये एवं बोलेः

“माता जी ! आपके श्रीमान् पतिदेव कहाँ है ?”

उस महिला ने आदर के साथ उन्हें बिठाया एवं कहाः “पतिदेव अभी घर आयेंगे।”

दोनों ने एक ही बात पूछी किन्तु पूछने का ढंग अलग था। इस प्रकार कठोर बोलना यह वाणी का एक पाप है। वाणी का यह दोष मानवता से पतित करवाता है।

अनृत अर्थात् अपनी जानकारी से विपरीत बोलनाः हम जो जानते हैं वह न बोलें, मौन रहें तो चल सकता है किन्तु जो बोलें वह सत्य ही होना चाहिए, अपने ज्ञान के अनुसार ही होना चाहिए। अपने ज्ञान का कभी अनादर न करें, तिरस्कार न करें। जब हम किसी के सामने झूठ बोलते हैं तब उसे नहीं ठगते, वरन् अपने ज्ञान को ही ठगते हैं, अपने ज्ञान का ही अपमान करते हैं। इससे ज्ञान रूठ जाता है, नाराज हो जाता है। ज्ञान कहता है कि ‘यह तो मेरे पर झूठ का परदा ढाँक देता है, मुझे दबा देता है तो इसके पास क्यों रहूँ ?’ ज्ञान दब जाता है। इस प्रकार असत्य बोलना यह वाणी का पाप है।

पैशुन्य अर्थात् चुगली करनाः इधर की बात उधर और उधर की बात इधर करना। क्या आप किसी के दूत हैं कि इस प्रकार संदेशवाहक का कार्य करते हैं ? चुगली करना आसुरी संपत्ति के अंतर्गत आता है। इससे कलह पैदा होता है, दुर्भावना जन्म लेती है। चुगली करना यह वाणी का तीसरा पाप है।

असम्बद्ध प्रलाप अर्थात् असंगत भाषणः प्रसंग के विपरीत बात करना। यदि शादी-विवाह की बात चल रही हो तो वहाँ मृत्यु की बात नहीं करनी चाहिए। यदि मृत्यु के प्रसंग की चर्चा चल रही हो तो वहाँ शादी-विवाह की बात नहीं करनी चाहिए।

इस प्रकार मानव की वाणी में कठोरता, असत्यता, चुगली एवं प्रसंग के विरुद्ध वाणी – ये चार दोष नहीं होने चाहिए। इन चार दोषों से युक्त वचन बोलने से बोलनेवाले को पाप लगता है।

मन के तीन पापः

परद्रव्येष्विभिध्यानं मनसानिष्टचिन्तनम्।

वितथाभिनिवेशश्च त्रिविधं कर्म मानसम्।।

दूसरे के धन का चिंतन करनाः दूसरे के पास इतना सारा धन है ! उसे कैसे हड़प कर लें ? इसका चिन्तन न करें। वरन् स्वयं परिश्रम करें, द्रव्य उत्पन्न करें, आदान-प्रदान करें, विनिमय करें। दूसरे के धन की चिन्ता करते रहोगे तो मन जलने लगेगा। परिणामस्वरूप न जाने वह कैसा कुकर्म करवा दे ! दूसरे के धन-वैभव का चिंतन करना यह मानसिक पाप है, इससे बचना चाहिए

दूसरे के अनिष्ट का चिंतन करनाः ऐसा मत समझना कि केवल मन में ऐसा विचारने से कोई पाप नहीं लगता। नहीं, मन में दूसरे के नुक्सान का विचार करने से भी पाप लगता है क्योंकि मन में संकल्प होता है तब उसका मंथन भी होने भी लगता है। शरीर में भी वैसे ही रसायन बनने लगते हैं एवं वैसी ही क्रियाएँ भी होने लगती हैं। किसी के लिए अनिष्ट विचार आया तो समझो आपके मन में पाप का बीज बो दिया गया ! वह अंकुरित होकर धीरे-धीरे वृक्ष का रूप भी ले सकता है, आपको पापपरायण बना सकता है। अतः किसी को तकलीफ हो ऐसा मन में विचार तक नहीं करना चाहिए। यह मानसिक पाप है, इससे सावधानीपूर्वक बचना चाहिए।

वितथाभिनिवेशः जो बात हम नहीं जानते उसे सत्य मानकर चलना। ऐसी मान्यता बना लेना यह मन का तीसरा पाप है।

सत्य क्या है ? अबाधित्वं सत्यत्वं। जिसका कभी बाध न हो वह है सत्य। हम उस सत्य को नहीं जानते किंतु जानने का दावा करने लग जाते हैं। आत्मारामी संतों का अनुभव ही सचोट होता है, बाकी तो सब लोग मन-इन्द्रियों के जगत में अपने-अपने मत-पंथ-मजहब को महत्त्व देकर अपनी मान्यता पुष्ट करते हैं। सत्य मान्यताओं के आधार पर नहीं टिका होता परंतु जो तमाम मान्यताएँ मानता है उस मन को जहाँ से सत्तास्फूर्ति मिलती है वह है अबाधित सत्यस्वरूप आत्मदेव। उसी में महापुरुष विश्रांति पाये हुए होते हैं एवं उन महापुरुषों के वचन प्रमाणभूत माने जाते हैं जिन्हें शास्त्र ‘आप्तवचन’ कहते हैं।

जिस धर्म में ऐसे ब्रह्मवेत्ताओं का मार्गदर्शन नहीं लिया जाता, उस धर्म-संप्रदाय के लोग जड़ मान्यताओं में ही जकड़कर जिद्दी एवं जटिल हो जाते हैं। यह जिद और जटिलता मन का तीसरा दोष है। दूसरे को तुच्छ मानता, जिद्दी एवं जटिल रहना यह इस दोष के लक्षण हैं।

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ईश्वर प्राप्ति, ऋषि दर्शन, भगवान की खोज

संकल्प और पुरुषार्थ


sant shri asaramji bapu

“उस चोट का निशान किंग कां के लिए संयम में दृढ़ रहने के अपने संकल्प की याद दिलाने वाला प्रेरक चिह्न साबित हुआ।”

दरासोव (रूमानिया) मैं सन् 1909 में जन्मे एमाइल चजाया (Emile Czaja) का आयु के अनुपात में शारीरिक विकास बहुत कम हो रहा था। वह दुबला-पतला और दब्बू प्रकृति का था। अक्सर अपने साथियों से मार खाकर घर आता था। यह सब उसके लिए असह्य था पर विवश था, पर क्या करता।

एक दिन उसे बहुत बुरी तरह मार पड़ी। वह रोता-रोता घर आ रहा था कि उससे एक सज्जन ने पूछाः “बच्चे ! क्यों रोते हो ?” उसने उत्तर दियाः “मैं दुबला हूँ, सब लड़के मुझे मारते हैं।” उस व्यक्ति ने स्नेह से उसकी पीठ थपथपायी और प्राणबल भर दियाः “बेटे ! असम्भव कुछ नहीं है। तुम संयम, लगन व पुरुषार्थ का सहारा लो तो दुनिया को हिला सकते हो। फिर शरीर बल का विकास करना क्या बड़ी बात है। निराश मत होओ, उद्यम करो। तुम अवश्य सफल होओगे।”

उन सज्जन के वचन बालक एमाइल के दिल में घर कर गये। एमाइल ने उनके बताये अनुसार दृढ़ संकल्प कर लिया। वह संयमी जीवन जीते हुए प्रबल पुरुषार्थ करने लगा। अपने लक्ष्य की सिद्धि तक विवाह न करने की तथा संयम् ने दृढ़ रहने का उसने संकल्प ले लिया। अब वह प्रतिदिन खूब व्यायाम करके पौष्टिक आहार लेने लगा। कुछ ही समय में उसकी ऊँचाई 6 फीट 3 इंच और वजन 190 किलोग्राम हो गया। उसका विशाल, मजबूत और ऊँचा शरीर देखकर लोग दाँतों तले उँगली दबाने लगे।

किंग कांग ने अपना कुश्ती का पेशा भारत से ही आरम्भ किया। उसने किंगकांग नाम धारण कर दो हजार प्रथम श्रेणी की कुश्तियाँ लड़ीं और विश्वविख्यात पहलवान बना।

अपना पेशा आरम्भ करने के शुरूआती दौर में (लगभग 29 वर्ष की उम्र में) जब तक वह जर्मनी गया तो वहाँ उसके सुडौल शरीर पर अत्यधिक आसक्त हुई एक सुन्दरी ने उसके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा, जिसे किंग कांग ने अस्वीकार कर दिया। इससे क्रोधोन्मत्त हुई उस सुन्दरी ने अपने निरादर का बदला किंग कांग पर शराब की बोतल फेंककर लिया। उस चोट का निशान किंग कांग के लिए संयम में दृढ़ रहने के अपने संकल्प की याद दिलाने वाला प्रेरक चिह्न साबित हुआ। लक्ष्य की पूर्ति तक अविवाहित रहने के अपने संकल्प में वह अडिग रहा।

संयम की शक्ति को आप चाहे जहाँ लगाओ, वह आपको वैश्विक सफलता प्रदान करेगी। उसका सहारा लेकर किंग कांग ने शरीर को सुदृढ़ बनाया और विश्वविख्यात पहलवान बना। आप भी अपनी संयम-शक्ति को जिस लक्ष्य की और लगायेंगे उसे अवश्य प्राप्त कर सकेंगे। अपने लक्ष्य पर ही अपना सारा ध्यान केन्द्रित करके पूरी निष्ठा व लगन से उद्यम करें तो असम्भव भी सम्भव हो जाता है।

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भगवान की खोज !


अकबर ने बीरबल के सामने अचानक एक दिन 3 प्रश्न उछाल दिये।
प्रश्न यह थे –
1) “भगवान कहाँ रहता है?
2) वह कैसे मिलता है ? और
3) वह करता क्या है?”

बीरबल इन प्रश्नों को सुनकर सकपका गये और बोले – ”जहाँपनाह ! इन प्रश्नों  के उत्तर मैं कल आपको दूँगा।”

जब बीरबल घर पहुँचे तो वह बहुत उदास थे। उनके पुत्र ने जब उनसे पूछा तो उन्होंने बताया –

”बेटा! आज बादशाह ने मुझसे एक साथ तीन प्रश्न पूंछे हैं :
✅ ‘भगवान कहाँ रहता है?
✅ वह कैसे मिलता है?
✅ और वह करता क्या है?’

मुझे उनके उत्तर सूझ नही रहे हैं और कल दरबार में इनका उत्तर देना है।”

बीरबल के पुत्र ने कहा – ”पिता जी ! कल आप मुझे दरबार में अपने साथ ले चलना मैं बादशाह के प्रश्नों के उत्तर दूँगा।” पुत्र की हठ के कारण बीरबल अगले दिन अपने पुत्र को साथ लेकर दरबार में पहुँचे। बीरबल को देख कर बादशाह अकबर ने कहा – ”बीरबल मेरे प्रश्नों के उत्तर दो। बीरबल ने कहा – ”जहाँपनाह आपके प्रश्नों के उत्तर तो मेरा पुत्र भी दे सकता है।”

अकबर ने बीरबल के पुत्र से पहला प्रश्न पूछा – “बताओ ! ‘भगवान कहाँ रहता है?”

बीरबल के पुत्र ने एक गिलास शक्कर मिला हुआ दूध बादशाह से मँगवाया और कहा – जहाँपनाह दूध कैसा है ?

अकबर ने दूध चखा और कहा कि ये मीठा है। परन्तु बादशाह सलामत क्या आपको इसमें शक्कर दिखाई दे रही है ?

बादशाह बोले नही। वह तो घुल गयी।

जी हाँ, जहाँपनाह ! भगवान भी इसी प्रकार संसार की हर वस्तु में रहता है। जैसे शक्कर दूध में घुल गयी है और वह दिखाई नही दे रही है।

बादशाह ने सन्तुष्ट होकर अब दूसरे प्रश्न का उत्तर पूछा – ”बताओ ! भगवान मिलता केैसे है ?” बालक ने कहा – ”जहाँपनाह थोड़ा दही मँगवाइए।”

” बादशाह ने दही मँगवाया तो बीरबल के पुत्र ने कहा – ”जहाँपनाह ! क्या आपको इसमें मक्खन दिखाई दे रहा है ?

बादशाह ने कहा – ”मक्खन तो दही में है पर इसको मथने पर ही दिखाई देगा।”

बालक ने कहा – ”जहाँपनाह ! मन्थन करने पर ही भगवान के दर्शन हो सकते हैं।”

बादशाह ने सन्तुष्ट होकर अब अन्तिम प्रश्न का उत्तर पूछा – ”बताओ ! भगवान करता क्या है?”

बीरबल के पुत्र ने कहा – ”महाराज ! इसके लिए आपको मुझे अपना गुरू स्वीकार करना पड़ेगा।”

अकबर बोले – ”ठीक है, आप गुरू और मैं आप का शिष्य।”

अब बालक ने कहा – ”जहाँपनाह गुरू तो ऊँचे आसन पर बैठता है और शिष्य नीचे।

अकबर ने बालक के लिए सिंहासन खाली कर दिया और स्वयं नीचे बैठ गये।

अब बालक ने सिंहासन पर बैठ कर कहा – ”महाराज ! आपके अन्तिम प्रश्न का उत्तर तो यही है।”

अकबर बोले- ”क्या मतलब ? मैं कुछ समझा नहीं।”

बालक ने कहा – ”जहाँपनाह ! भगवान यही तो करता है। “पल भर में राजा को रंक बना देता है और भिखारी को सम्राट बना देता है।”

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ध्यान की विधियाँ |


Dhyan ki vidhiyaan – Asaramji Bapu

ध्यान की विधियाँ कौन-कौन सी हैं?

ध्यान की अनेकानेक एवं अनंत विधियाँ संसार में प्रचलित हैं | साधकों की सुविधा के लिए विभिन्न शास्त्रों व ग्रंथों से प्रमाण लेकर ध्यान की विधियाँ बताते हैं जिनका अभ्यास करके साधक शीघ्रातिशीघ्र ईश्वर साक्षात्कार को प्राप्त कर सकता है |

ध्यान की विधियाँ :

१. श्री कृष्ण अर्जुन संवाद :- भगवन श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा: शुद्ध एवं एकांत स्थान पर कुशा आदि का आसन बिछाकर सुखासन में बैठें | अपने मन को एकाग्र करें. मन व इन्द्रियों की क्रियाओं को अपने वश में करें, जिससे अंतःकरण शुद्ध हो. इसके लिए शारीर, सर व गर्दन को सीधा रखें और हिलाएं-दुलायें नहीं. आँखें बंद रखें व साथ ही जीभ को भी न हिलाएं. अब अपनी आँख की पुतलियों को भी इधर-उधर नहीं हिलने दें और उन्हें एकदम सामने देखता हुआ रखें. एकमात्र ईश्वर का स्मरण करते रहें. ऐसा करने से कुछ ही देर में मन शांत हो जाता है और ध्यान आज्ञा चक्र पर स्थित हो जाता है और परम ज्योति स्वरुप परमात्मा के दर्शन होते हैं.

विशेष :- ध्यान दें जब तक मन में विचार चलते हैं तभी तक आँख की पुतलियाँ इधर-उधर चलती रहती हैं. और जब तक आँख की पुतलियाँ इधर-उधर चलती हैं तब तक हमारे मन में विचार उत्पन्न होते रहते हैं. जैसे ही हम मन में चल रहे समस्त विचारों को रोक लेते हैं तो आँख की पुतलियाँ रुक जाती हैं. इसी प्रकार यदि आँख की पुतलियों को रोक लें तो मन के विचार पूरी तरह रुक जाते हैं. और मन व आँख की पुतलियों के रुकते ही आत्मा का प्रभाव ज्योति के रूप में दीख पड़ता है.

  • गीतोपदेश अ. ६ श्लोक १२ से 15

२. शिव-पार्वती संवाद :-

भगवन शिव ने पार्वतीजी से कहा :- “एकांत स्थान पर सुखासन में बैठ जाएँ. मन में ईश्वर का स्मरण करते रहें. अब तेजी से सांस अन्दर खींचकर फिर तेजी से पूरी सांस बाहर छोड़कर रोक लें. श्वास इतनी जोर से बाहर छोड़ें कि इसकी आवाज पास बैठे व्यक्ति को भी सुनाई दे. इस प्रकार सांस बाहर छोड़ने से वह बहुत देर तक बाहर रुकी रहती है. उस समय श्वास रुकने से मन भी रुक जाता है और आँखों की पुतलियाँ भी रुक जाती हैं. साथ ही आज्ञा चक्र पर दबाव पड़ता है और वह खुल जाता है. श्वास व मन के रुकने से अपने आप ही ध्यान होने लगता है और आत्मा का प्रकाश दिखाई देने लगता है. यह विधि शीघ्र ही आज्ञा चक्र को जाग्रत कर देती है.

  • नेत्र तंत्र

३. शिवजी ने पार्वतीजी से कहा :-

रात्रि में एकांत में बैठ जाएँ. आंकें बंद करें. हाथों की अँगुलियों से आँखों की पुतलियों को दबाएँ. इस प्रकार दबाने से तारे-सितारे दिखाई देंगे. कुछ देर दबाये रखें फिर धीरे-धीरे अँगुलियों का दबाव कम करते हुए छोड़ दें तो आपको सूर्य के सामान तेजस्वी गोला दिखाई देगा. इसे तैजस ब्रह्म कहते हैं. इसे देखते रहने का अभ्यास करें. कुछ समय के अभ्यास के बाद आप इसे खुली आँखों से भी आकाश में देख सकते हैं. इसके अभ्यास से समस्त विकार नष्ट होते हैं, मन शांत होता है और परमात्मा का बोध होता है.

  • शिव पुराण, उमा संहिता

४.शिवजी ने पार्वतीजी से कहा :-

रात्रि में ध्वनिरहित, अंधकारयुक्त, एकांत स्थान पर बैठें. तर्जनी अंगुली से दोनों कानों को बंद करें. आँखें बंद रखें. कुछ ही समय के अभ्यास से अग्नि प्रेरित शब्द सुनाई देगा. इसे शब्द-ब्रह्म कहते हैं. यह शब्द या ध्वनि नौ प्रकार की होती है. इसको सुनने का अभ्यास करना शब्द-ब्रह्म का ध्यान करना है. इससे संध्या के बाद खाया हुआ अन्न क्षण भर में ही पाच जाता है और संपूर्ण रोगों तथा ज्वर आदि बहुत से उपद्रवों का शीघ्र ही नाश करता है. यह शब्द ब्रह्म न ॐकार है, न मंत्र है, न बीज है, न अक्षर है. यह अनाहत नाद है (अनाहत अर्थात बिना आघात के या बिना बजाये उत्पन्न होने वाला शब्द). इसका उच्चारण किये बिना ही चिंतन होता है. यह नौ प्रकार का होता है :-

१. घोष नाद :- यह आत्मशुद्धि करता है, सब रोगों का नाश करता है व मन को वशीभूत करके अपनी और खींचता है.

२. कांस्य नाद :- यह प्राणियों की गति को स्तंभित कर देता है. यह विष, भूत, ग्रह आदि सबको बांधता है.

३. श्रृंग नाद :- यह अभिचार से सम्बन्ध रखने वाला है.

४. घंट नाद :- इसका उच्चारण साक्षात् शिव करते हैं. यह संपूर्ण देवताओं को आकर्षित कर लेता है, महासिद्धियाँ देता है और कामनाएं पूर्ण करता है.

५. वीणा नाद :- इससे दूर दर्शन की शक्ति प्राप्त होती है.

६. वंशी नाद :- इसके ध्यान से सम्पूर्ण तत्त्व प्राप्त हो जाते हैं.

७. दुन्दुभी नाद :- इसके ध्यान से साधक जरा व मृत्यु के कष्ट से छूट जाता है.

८. शंख नाद :- इसके ध्यान व अभ्यास से इच्छानुसार रूप धारण करने की शक्ति प्राप्त होती है.

९. मेघनाद :- इसके चिंतन से कभी विपत्तियों का सामना नहीं करना पड़ता.

इन सबको छोड़कर जो अन्य शब्द सुनाई देता है वह तुंकार कहलाता है. तुंकार का ध्यान करने से साक्षात् शिवत्व की प्राप्ति होती है.

  • शिव पुराण, उमा संहिता

५. भगवान श्री कृष्ण ने उद्धवजी से कहा :-

शुद्ध व एकांत में बैठकर अनन्य प्रेम से ईश्वर का स्मरण करें और प्रार्थना करें कि ‘हे प्रभु! प्रसन्न होइए! मेरे शारीर में प्रवेश करके मुजहे बंधनमुक्त करें.’ इस प्रकार प्रेम और भक्तिपूर्वक ईश्वर का भजन करने से वे भगवान भक्त के हृदय में आकर बैठ जाते हैं. भक्त को भगवान् का वह स्वरुप अपने हृदय में कुछ-कुछ दिखाई देने लगता है. इस स्वरुप को सदा हृदय में देखने का अभ्यास करना चाहिए. इस प्रकार सगुण स्वरुप के ध्यान से भगवान हृदय में विराजमान होते ही हृदय की सारी वासनाएं संस्कारों के साथ नष्ट हो जाती है और जब उस भक्त को परमात्मा का साक्षात्कार होता है तो उसके हृदय कि गांठ टूट जाती है और उसके सरे संशय छिन्न-भिन्न हो जाते हैं और कर्म-वासनाएं सर्वथा क्षीण हो जाती हैं |

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