सत्संग, Saint and People

श्रद्धा (DEVOTION)


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श्रद्धावान, तत्पर और संयमी पुरुष ज्ञान प्राप्त कर लेता है और ज्ञान प्राप्त करके तत्काल ही परमशांति को प्राप्त हो जाता है ।

जिसके जीवन में श्रद्धा नहीं वह पशु और पक्षी जैसा है । जिसके जीवन में श्रद्धा नहीं उसका विकास भी नहीं है । जिसके अंतःकरण में श्रद्धा नहीं उसके जीवन में रस भी नहीं है । श्रद्धा ऐसा अनुपम सद्गुण है कि जिसके हृदय में वह रहता है उसका चित्त श्रद्धेय के सद्गुणों को पा लेता है ।

श्रद्धा सम्बल-सहारा भी है और बल भी है । निर्बल का बल और आश्रय श्रद्धा ही है । अति अहंकारी व्यक्ति श्रद्धा नहीं कर सकता । निर्बल मनवाला मान्यता और कल्पना के संस्कारों को पकड़ रखता है इसलिए उसकी कल्पना के संस्कारों को पकड़ रखता है इसलिए उसकी श्रद्धा टिकती नहीं है । वह घटती-बढ़ती रहती है । परमात्मा में, परमात्म-प्राप्त महापुरुषों में शास्त्रों में श्रद्धा होनी चााहिए । अपने आप पर भी उतनी श्रद्धा होनी चाहिए । जितनी श्रद्धा डगमग होती है उतना ही व्यक्ति का व्यवहार और परमार्थ दोनों में डगमग रहता है । जीवन में अडिग श्रद्धा की आवश्यकता है । जिसके जीवन में श्रद्धा नहीं वह तो कौए से भी बदतर है । कौए का किसी पर भी विश्वास नहीं होता ।

दो प्रकार के मनुष्य सद्गुरु पर श्रद्धा नहीं कर पाते । एक तो महामुर्ख । वे न सद्गुरु को खोज पाते हैं न उन पर श्रद्धा कर पाते हैं । दूसरे जो घमंडी, अहंकारी हैं वे भी शास्त्र, भगवान और सद्गुरु पर श्रद्धा नहीं कर पाते । वे न स्वर्ग पर श्रद्धा कर पाते हैं, न पुण्य में, न पाप में , न ईष्ट में ही श्रद्धा करते हैं । वसिष्ठजी कहते हैं : “ ऐसे पुरुष मर कर वृक्ष आदि योनियों को पाते हैं । “

अपने पिता पर भी श्रद्धा करनी पड़ती है । माता ने बताया कि  – यह पिता है, यह माता है, यह मासा है । इनको श्रद्धा करके ही मानना पड़ता है । बस के ड्राइवर पर भी श्रद्धा करनी पड़ता है । चाय बनानेवाले होटल के नौकर पर भी श्रद्धा करनी पड़ती है कि चाय में जूठा, बासी या छिपकली गिरा हुआ दूध नहीं डाला होगा । अरे ! दाढ़ी बनानेवाले पर श्री श्रद्धा करनी पड़ती है कि गाल पर ही उस्तरा चलायेगा, गले पर नहीं घुमायेगा । यह व्यवहारिक श्रद्धा है । परमतत्त्व परमात्मा को पाने के लिए पारमार्थिक श्रद्धा करनी पड़ती है । जो दुर्बल मनवाला और मान्यताओं का गुलाम है वह अपनी मान्यताओं के विपरीत देखेगा तो उसकी श्रद्धा टूट जायेगी । मजबूत मनवाला आदमी कभी भी, किसी भी अवस्था में रहे, उसकी श्रद्धा टूटती नहीं अपने उद्देश्य के प्रति दृढ़ श्रद्धा हो । अगर आप जप करना चाहते हैं, ध्यान करना चाहते हैं मगर  सोचते हैं कि अभी नहीं परसों करेंगे, दो महीनों के बाद  करेंगे ऐसा ख्याल रखेंगे तो आपको ध्यान और जप में श्रद्धा नहीं है । आपको जिसके प्रति श्रद्धा होती है उसका चिंतन सहज में होने लगता है ।

जीवन में अगर भगवत्प्राप्त महापुरुष, भगवान या शास्त्र के प्रति श्रद्धा नहीं है तो धन, पुत्र, पत्नी, सब सुविधा होते हुये भी अंतर का संगीत नहीं गूँजता, रस नहीं आता । जिसे अंदर से रस नहीं आता वह सिगरेट, दारू, मांस और अण्डे में श्रद्धा रखते हैं । इसलिए वे धनभागी हैं  भक्त जो हरिनाम में, सद्गुरु में एवं  शास्त्र में श्रद्धा करते हैं ।

शास्त्र, भगवान और सदगुरु में श्रद्धा रखनेवाले श्रद्धा के बल से तर जाते हैं । जबकि दूसरे जो भगवान पर श्रद्धा नहीं रख पाते वे क्लब में, डिस्को में अंधश्रद्धा करते हैं । उनकी श्रद्धा अनेक चीजों में होती है । ठोकरें खाते-खाते जीते हैं जैसे नदी में तिनका बहता है वैसे ही नास्तिक, अश्रद्धालु का मन अनेक चीजों में तर्क-वितर्क, कुतर्क में बहता-बहता संसार के कीचड़ में गिरता है । कभी घोड़ा बनता है, कभी गधा बनता है और न चाहते हुये भी समाज की चाकरी में बलात जुटता रहता है । श्रद्धालु अपने आप कर्म करता है इसलिए वह पावन होता है जबकि श्रद्धारहित व्यक्ति से प्रकृति काम लेती है । जो अपने आप कर्म, सेवा करते हैं उनका अंतःकरण शीघ्र स्वच्छ होकर परमात्मरस से पावन होता है । जो अपने आप ईश्वर, शास्त्र, सत्कर्म और समाज के हित में कर्म नहीं कर पाते उनसे प्रकृति बलात् कर्म लेती है । पशु, वृक्ष और नास्तिकों से बलात् काम लिया जाता है ।

श्रद्धा जिसके अंतःकरण में होती है उसे पावन, रसमय, एकाग्र बनाती है और श्रद्धेय का कृपा-प्रसाद करा देती है ।

ऋग्वेद के श्रद्धा सूक्त में आता है कि :

श्रद्धां प्रातर्हवामहे श्रद्धां माध्यन्दिनं परि ।

‘ हम प्रातःकाल में श्रद्धा का आवाहन करते हैं, हम मध्यान्ह में श्रद्धा का आवाहन करते हैं और हम संध्याकाल में भी श्रद्धा का आवाहन करते हैं । ‘

जैसे, हम भगवान की प्रार्थना करते हैं वैसे ही ऋग्वेद के श्रद्धा सूक्त में श्रद्धा की प्रार्थना करते हैं कि :

‘ हे श्रद्धादेवी ! तुम हममें स्थित हो । ‘

यजुर्वेद में भी आया है :

‘ श्रद्धया सत्यमाप्यते । ‘

श्रद्धा से सत्य को पाओ । सामवेद में आता है कि सत्य से सत्य पर, दान से लोभ पर, श्रद्धा से अश्रद्धा पर और अक्रोध से क्रोध पर हम विजय पायें । हमारी श्रद्धा ऐसी हो कि अश्रद्धा को हम कुचल डालें । जिसके जीवन में श्रद्धा एवं दृढ़ता है वह विपरीत परिस्थिति को भी अपने पैरों तले कुचलकर अपनी मंजिल तक पहुँच जायेगा ।

धन्ना जाट में वह श्रद्धा थी कि पत्थर में से भगवान प्रकट हो गये । शबरी में वह श्रद्धा थी कि जिनके दर्शन के लिए मुनि लालायित रहते थे वे भगवान श्रीराम उसके द्वार पर खुद आये ।

मदालसा में श्रद्धा थी कि मेरी कुख से जो जन्म ले वह अज्ञानी कैसे रहे ? और उसने अपने बच्चों को पालने में ही वेदांत का तत्त्वोपदेश देकर ज्ञानी बना दिया ।

अष्टावक्र ने जनक से कहा कि-

श्रद्धत्स्व तात श्रद्धत्स्व नात्र मोहं कुरुष्व भोः ।

ज्ञानस्वरूपो भगवानात्मा त्वं प्रकृतेः परः ।।

‘ हे सौम्य ! हे प्रिय ! श्रद्धा कर श्रद्धा कर । इसमें (संसार में) मोह मत कर । तू प्रकृति से परे ज्ञानस्वरूप ईश्वर, परमात्मा है । ‘

(अष्टावक्रगीता)

तुम श्रद्धा के बल से कुछ बना सकते हो, कुछ बिगाड़ सकते हो । श्रद्धा के बल से किसी के दिल की बात जान सकते हो । अपने साधन पर श्रद्धा रखकर, कहाँ पर क्या हो रहा है यह भी जान सकते हो । एक जगह बैठकर दूर-दूर तक जो चाहो आदेश दे सकते हो । श्रद्धा में ऐसी शक्ति है कि वह दुःख में सुख बना देती है और सुख में सुखानंद स्वरूप परमात्मा का साक्षात्कार करा देती है ।

काम करते समय पूरी सावधानी, तत्परता बरतो । लापरवाही या और कियी भी कारण से कार्य को बिगड़ने मत दो । कर्म को ही पूजा समझकर उसे सुचारू रूप से करो । ध्यान के द्वारा  योग्यता ब‹ढाओ ।

नर-नारी में बसे हुये उस परमात्मा का प्यारा नाम ‘ नारायण… नारायण… ‘ पूरे प्रेम से लेते चलो और कर्म को कर्मयोग बनाते चलो ।

श्रद्धा अचल कैसे हो ?(Shraddha Achal Kaise Ho ?)
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सत्संग, Bapuji, Guru-Bhakti

गुरु गुरु होते हैं…


 

asaram bapuji , ashram bapuji

गुरु गुरु होते है

गुरुओं  की  कृपा  एवं आत्मीयता  तभी  हमारे अंतःकरण को रंगेगी जब हम उनके साथ श्रद्धा-भक्ति से जुड़ जायेंगे, तदाकार हो जायेंगे । नहीं तो एक-एक विकार को मिटाने के लिए हमें बहुत मजदूरी करनी पड़ेगी ।

गुरु से यदि सच्ची प्रीति जुड़ गयी तो फिर दोष न जाने किस कोने में जाकर क्षीण हो जायेंगे अथवा पलायन कर जायेंगे इसका भी पता नहीं चलेगा । ‘ मुझमें दोष हैं ‘  यह याद करके उन्हें निकालना तो ठीक है लेकिन ऐसे निर्दोष गुरुओं का एवं आत्मा का चिंतन इतना गहरा हो कि दोष की याद ही न आये यह उससे भी अनंतगुना अधिक लाभकारक है ।

भगवान की मूर्ति में और तीर्थ में तो श्रद्धा हो जाती है लेकिन सद्गुरु में श्रद्धा होना कठिन है । सद्गुरु में श्रद्धा होना अर्थात् उनमें कभी कोई भी दोष न देखना। लेकिन… उनमें कभी-न-कभी, कोई-न-कोई दोष, कुछ-न-कुछ कमी दिख ही जायेगी और जैसा दोष अपने चित्त में होगा वैसा दिखेगा जरूर । रामकृष्ण परमहंस के प्रति विवेकानंद की दोष दृष्टि सात बार हुई थी । कभी विवेकानंद को रामकृष्ण परमहंस ने कृपा करके सँभाल लिया तो कभी विवेकानंद ने सच्चे हृदय से प्रायश्चित्त करते हुए माफी माँगते हुए निवेदन कर दिया कि : ‘ मुझे आपके लिए ऐसा-ऐसा भाव आता है । ‘

गुरु के बाह्य व्यवहार को न देखकर गुरु के संकेत को समझना चाहिए । अभी आपके पास गुरुतत्त्व का चश्मा ही नहीं है । अपनी जीवत्व की निगाहों से आप गुरु को कितना और कैसे देखोगे ? अगर गुरु को अपनी तुच्छ मति से मापने-तौलने की कोशिश की तो आपकी खोपड़ीरूपी तराजू टुकड़े-टुकड़े हो जायेगी । गुरु आपकी बुद्धि द्वारा तौलने का विषय नहीं हैं, वरन् गुरु तो गुरु हैं ।

गोरखनाथ के चित्त में भी एक बार कुछ ऐसा ही भाव आ गया था । एक बार उनके गुरु मछन्दरनाथ चल दिये स्त्रियों के देश में । वहाँ की रानी के साथ उनकी शादी भी हो गयी और दो बच्चे भी हो गये । तब लोग गोरखनाथ से कहने  लगे : “ बड़ा आया गुरु का  भक्त ! बड़ा आया मछन्दरनाथ की जय बुलवानेवाला! तेरे गुरु तो भ्रष्ट हो गये… “

गोरखनाथ से नहीं सहा गया । गोरखनाथ सोचने लगे कि : ‘ जहाँ मेरे गुरुदेव पहुँचे हैं उस स्त्रियों के देश में मैं कैसे जाऊँ ? क्योंकि वहाँ तो यति, योगी, त्यागी, साधुओं को प्रवेश की आज्ञा ही नहीं है । राज्य का सारा कार्यभार स्त्रियाँ ही सँभालती हैं । ऐसे देश में जाकर गुरुदेव से संपर्क  कैसे करूँ ? ‘

उस  त्रिया राज्य की रानी ने हनुमानजी को प्रसन्न करके मछन्दरनाथ को पाया था ।

गोरखनाथ ने उस राज्य में जाकर गुरुदेव से संपर्क करने का उपाय खोज लिया । उन्होंने वहाँ की नृत्य-गान करनेवाली नर्तकियों से संपर्क किया और कहा : “ मुझे अपने राजदरबार में ले चलो । “

तब नर्तकियों ने कहा : “ हम तुम्हें नहीं ले जा सकते क्योंकि तुम पुरुष हो । “

“ मुझे स्त्रियों के कपड़े पहनाकर ले चलो । मैं ढोलक तो बजाऊँगा लेकिन पैसा एक भी नहीं लूँगा। “

नर्तकियों में जो मुख्य नर्तकी थी उसने सोचा कि : ‘ ऐसा बिना पैसेवाला और इतना सुन्दर ढोलक बजानेवाला कहाँ मिलेगा ? चलो, इसे ले चलते हैं । ‘

गोरखनाथ को लेकर वे चल प‹डीं राजदरबार की ओर । राजदरबार में जाकर गोरखनाथ ने सारा मामला समझ लिया और नृत्य-गान के समय ढोलक में से आवाज निकाली :

चेत मछन्दर गोरख आया…

चेत मछन्दर गोरख आया…

अब शिष्य के सामने मछन्दरनाथ नृत्य-गान कैसे देख सकते थे ? अतः उन्होंने  सब  नाच-गान करनेवालों को रवाना कर दिया । सबके जाते ही गोरखनाथ ने अपना असली स्वरूप प्रगट कर दिया :

“ अलख ! आदेश । “

गुरुदेव को प्रणाम किया और कहा : “ गुरुदेव ! आप इस चक्कर में कैसे ? “

गुरुदेव ने कहा : “ चलो, वापस चलते हैं किन्तु इन बच्चों को भी ले चलना होगा । “

गोरखनाथ : “ जो आज्ञा । “

गोरखनाथ की श्रद्धा थी गुरुचरणों में । अतः बच्चों को तो वे ले चले किन्तु मन में सोचा कि : ‘ यह कचरा? विरक्त योगी का कैसे ? ‘

मार्ग में बच्चों को हाजत हुई तब मछन्दरनाथ ने कहा : “ जाओ गोरख ! इन्हें ले जाओ और धो-धाकर ठीक कर दो । “

गोरखनाथ उन्हें ले गये तालाब के पास और तालाब में डुबा-डुबाकर, जैसे कपड़े को धोते हैं वैसे ही उन्हें भी धो डाला । शिला पर पटकने से दोनों के प्राणपखेरू उड़ गये । फिर गोरखनाथ उन्हें काँटों की बाड़ पर सुखाकर आ गये ।

मछन्दरनाथ : “ कहाँ गये दोनों ? “

गोरखनाथ : “ गुरुजी ! आपने ही तो कहा था कि दोनों को धो-धाकर ठीक करके आओ तो मैं उन्हें धोकर, ठीक करके, सुखाकर आया हूँ । “

मछन्दरनाथ : “ अच्छा अच्छा, कोई बात नहीं । चलो आगे । “

आगे चलकर मछन्दरनाथ को हाजत हुई अतः उन्होंने गोरखनाथ को झोला देते हुए कहा : “ गोरख! जरा ध्यान रखना । इसमें फिकर है । “

मछन्दरनाथ  तो  लोटा  लेकर  चलते  बने । गोरखनाथ को हुआ कि : ‘ इसमें कौन-सी फिकर   होगी ? ‘  देखा तो सोने की र्इंट ! गोरखनाथ ने र्इंट उठाकर कुएँ में फेंक दी ।

मछन्दरनाथ आये और पूछा : “ बेटा ! इसमें जो फिकर थी, वह कहाँ गयी ? “

गोरखनाथ : “ गुरुजी ! आपने ही तो साधनाकाल में बताया था कि फिकर फेंक कुएँ में तो मैंने गुरु की फिकर कुएँ में फेंक दी । “

यहाँ तक तो गोरखनाथ सत्शिष्य से दिख रहे हैं लेकिन अब… चलते-चलते कोई गाँव आया तब मछन्दरनाथ ने कहा : “ गोरख ! तू जा जरा आगे । मैं बाद में आता हूँ । “

गोरखनाथ आगे निकल पड़े । गाँव में जाकर देखते हैं कि खूब तैयारियाँ हो रही हैं । कहीं तोरण बाँधे जा रहे हैं तो कहीं रंगोली पूरी जा रही है । कहीं मंडप बाँधे जा रहे हैं तो कहीं ब्राह्मण उत्सव की तैयारी में लगे हैं । पूरे गाँव को उत्सव की तैयारी में लगा हुआ देखकर गोरखनाथ ने पूछा :

“ क्या बात है ? “

तब किसीने कहा : “ अरे ! तुम्हें पता नहीं ? गोरखिया के गुरु मछन्दरनाथ १२ साल से यहाँ गुफा में समाधि में बैठे हैं । समाधि से उठकर वे बाहर आ रहे हैं । “

“ क्या ? मछन्दरनाथ  तो  एक  ही  हैं और गोरखनाथ भी तो दूसरा नहीं है । “

“ हाँ हाँ, गोरखनाथ एक ही है । वही गोरख, वही सिद्ध, जिसे अपनी सिद्धाई का बड़ा गर्व है । उसीके गुरु यहाँ १२ साल से रहते हैं । “

“ तुमने कभी देखा भी है गुरुदेव को ? “

“ हाँ हाँ, क्यों नहीं ? हर अमावस, पूनम को हम वैदिक  मंत्रों  का  उच्चारण  करते  हैं और  गुरुदेव मछन्दरनाथ हमें दर्शन देते हैं । “

गोरखनाथ को हुआ कि ‘ ये कौन-से मछन्दरनाथ हैं ? देखना पड़ेगा । ‘  गोरखनाथ ने तो बराबर जासूसी की । गुफा वगैरह सब देखा और चक्कर मारा तो देखा कि गुफा में कहीं से भी घुसने की जगह नहीं थी । फिर वे भी किसी जगह से सारा नजारा देखने लगे ।

समय हुआ । शहनाइयाँ,  बिगुल, बाजे और तुरही आदि बजने लगे । धूप-दीप से वातावरण सुगंधित होने लगा । ब्राह्मणों ने वैदिक मंत्रों का उच्चारण करते-करते गुफा का ताला खोला । गुरुदेव मछन्दरनाथ बाहर पधारे ।

आश्चर्य ! गुरुदेव कल तक तो मेरे साथ थे और आज यहाँ !! यह कैसे संभव हुआ !!!

मछन्दरनाथ बोले : “ क्या देखता है गोरख ? गुरु गुरु होते हैं । “

यह एक जीव में से अनेक जीववाद का सिद्धांत है कि एक ऐसी अवस्था भी आती है कि एक शरीर से योगी तप कर रहा हो, दूसरे शरीर से भोग भोग रहा हो और तीसरे शरीर से भजन कर-करवा रहा हो… ऐसा भी कई योगियों के जीवन में संभव होता है जैसे, श्रीकृष्ण ।

अन्तःकरण में यह सारा सामथ्र्य उस आत्मदेव से ही आता है । जैसे आपके अन्तःकरण में सपने की दुनिया बन जाती है वैसे ही आपके अंतःकरण में इतना प्रगा‹ढ सामथ्र्य भी आ सकता है कि आप एक में से अनेक रूप भी बना सकते हैं । फिर भी तत्त्वज्ञान के आगे यह बहुत छोटी बात है ।

तत्त्वज्ञान पाने के लिए ऐसे गुरु चाहिए कि जो आत्मा-परमात्मा के साक्षात्कार के आगे किसी ऋद्धि-सिद्धि को, किसी चमत्कार को ज्यादा महत्त्व न दें । ऐसे गुरुओं से अगर मुलाकात हो जाये तो बेड़ा पार हो जाय ।

मरे हुए को जिन्दा करने की विद्या भी होती है और जिनको आत्मज्ञान हो गया है उनके चित्त में सहज में संकल्प होने पर भी मृतक व्यक्ति जीवित हो सकता है । मृतक को जीवित करनेवाली संजीवनी विद्या जाननेवालों की अपनी स्थिति होती है लेकिन जब किन्हीं ब्रह्मवेत्ता के चित्त में सहज में स्फुरणा हो जाती है तब ब्रह्मवेत्ता नहीं करता है वरन् ब्रह्म स्वभाव में स्पंदन हो जाता है और मृतक जीवित हो जाता है ।

संजीवनी विद्या से जीवनदान अलग बात है और ब्रह्मवेत्ता महापुरुष के संकल्प से जीवनदान अलग बात है । कभी-कभी सिद्धियाँ आत्मवेत्ता महापुरुष में भी दिखती हैं तो कभी-कभी अज्ञानी जीवों में भी सिद्धियाँ होती हैं । अपने-अपने विषय की साधना करके अज्ञानी जीव भी कुछ-कुछ सिद्धियाँ पा लेते हैं । अष्ट सिद्धियाँ प्राप्त किया हुआ व्यक्ति भी ब्रह्मज्ञानी हो यह जरूरी नहीं है ।

रामकृष्ण परमहंस के पास तोतापुरी गुरु के मिलने से पूर्व ही सिद्धाई थी । माँ काली को पुकारने पर माँ का प्रगट होना यह सिद्धाई नहीं तो क्या है ? फिर भी तोतापुरी सद्गुरु की जब कृपा प्राप्त हुई तभी उन्हें आत्मज्ञान हुआ ।

ऐसी  आत्मज्ञानरूपी  परम  कृपा  बरसानेवाले सद्गुरु जब मिल जाते हैं और सत्शिष्य जब उन्हें समझ लेता है तब काम बन जाता है ।  फिर शिष्य के लिए किसी होम-हवन, यज्ञ-यागादि एवं देवी-देवता की उपासना करना शेष नहीं रहता, वरन् उसके लिए तो सद्गुरु ही उपास्य देव हो जाते हैं ।

सुपात्र मिले  तो  कुपात्र को  दान  दिया  न  दिया,

सत्शिष्य मिला तो कुशिष्य को ज्ञान दिया न दिया ।

सूर्य उदय  हुआ  तो  और  दीया  किया  न  किया,

कहे     कवि     गंग     सुन     शाह    अकबर !

पूर्ण गुरु मिले तो और को नमस्कार किया न किया ।।

ब्रह्मज्ञान पूर्ण ज्ञान है । यह आत्मा और ब्रह्म अभिन्न है ऐसा ज्ञान पूर्ण ज्ञान है । तू देह नहीं है और देह तथा जगत का संबंध मिथ्या है जबकि तेरा और ब्रह्म का संबंध शाश्वत है ऐसा अनुभव करानेवाले पूर्ण गुरु कभी-कभी, कहीं-कहीं, बड़ी मुश्किल से मिलते हैं और मिलते भी हैं तो साधारण जीवों की नार्इं खाने-पीने, पहनने-ओ‹ढनेवाले दिखते हैं । अतः उनमें श्रद्धा होना कठिन होता है ।

ईश्वरोगुरुरात्मेति  मूर्तिभेदे  विभागिनः ।

व्योमवत् व्याप्तदेहाय तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।

गुरु भले सामान्य मनुष्य की तरह दो हाथ-पैरवाले दिखें लेकिन अनंत-अनंत ब्रह्माण्डों में व्याप्त होते हैं । आकाश कितना व्यापक होता है किन्तु वह आकाश भी उनके भीतर होता है इतने वे व्यापक होते हैं । इसलिए शिष्य कभी यह न सोचे कि : ‘ गुरु ने जब मंत्रदीक्षा दी थी केवल उसी समय गुरु मेरे पास थे और अब मैं कहीं जाकर सीधा-टे‹ढा करूँगा तो गुरु को पता नहीं चलेगा । ‘  गुरु भले कहें-न-कहें लेकिन अंतरात्मभाव से गुरु वहाँ भी फटकारते हैं कि : ‘ ऐ ! क्या करता है ? ‘

अगर अच्छा काम करते हैं तो अंतर्यामी रूप से गुरु प्रेरणा भी देते हैं कि : ‘ ठीक है… शाबाश है, बेटा! ‘  प्रत्येक शिष्य को इस बात का अनुभव होगा ।

दीक्षा के निमित्त से गुरु-शिष्य के बीच एक सूक्ष्म तार जुड़ जाता है । अगर आपके चार पैसे के यंत्र ‘ कोर्डलेस ‘  का बटन दबाने पर सेटेलाइट से अमेरिका में घंटी बज सकती है तो यह तो मंत्र है । मंत्र से मन सूक्ष्म, मन से मति सूक्ष्म, मति से जीव सूक्ष्म, जीव से प्रकृति सूक्ष्म और प्रकृति से भी परब्रह्म परमात्मा को पाये हुए महापुरुषों का तत्त्व सूक्ष्म होता है और आपका भी तत्त्व सूक्ष्म है तो गुरु को पता क्यों नहीं चलेगा ? चीज जितनी सूक्ष्म होती है उतनी व्यापक होती है । जितनी सूक्ष्म होती है उतनी ही प्रभावशाली होती है । पानी की एक बूँद को गर्म करो तो वाष्प बनने पर उसमें १३०० गुनी ताकत आ जाती है । ऐसे ही अपने मन को साधन-भजन और संयम से सूक्ष्म कर दो तो उसमें भी बड़ी शक्ति आ जाती है । मन को तो साधन-भजन से सूक्ष्म कर भी लिया लेकिन जिसकी सत्ता से साधन-भजन किया वह तो परम सूक्ष्म है । उसका ज्ञान पा लो तो फिर सूक्ष्म करने की भी जरूरत नहीं पड़ती ।

यह बड़ी सूक्ष्म बात है । इस तत्त्वज्ञान की बात को सुनने का मौका देवताओं को भी नहीं मिलता क्योंकि वे भोग-सुख में ही मस्त रहते हैं । उनके पास बुद्धि तो होती है किन्तु वह बुद्धि भोग-सुख में ही खर्च हो जाती है । आत्मज्ञान में रुचि पुण्यवानों को ही होती है । तुलसीदासजी ने भी कहा है :

बिनु पुन्य पुंज मिलही नहीं संता ।

पुण्य नहीं, पुण्यों का पुंज जब एकत्रित होता है तब संत मिलते हैं, संतों के पास जाने की रुचि होती है । किसीने कहा है कि :

“ अगर सात जन्मों के पुण्य हों तभी आत्म-साक्षात्कारी संत के द्वार पर जाने की इच्छा होती है किन्तु जा नहीं पाते, कोई-न-कोई काम आ जाता है । दूसरे सात जन्म के अर्थात् १४ जन्म के पुण्य जोर करते हैं तब उनके द्वार पर तो जा सकते हैं किन्तु वे आयें उसके पहले ही होगा कि ‘ फिर कभी आयेंगे ‘  या  कार्यक्रम पूरा होने पर ही पहुँच पाते हैं। जब तीसरे सात जन्म के अर्थात् २१ जन्म के पुण्य जोर करते हैं तभी उनके सान्निध्य में, उनके चरणों में पहुँच पाते हैं और उनके दैवी कार्यों एवं अनुभवों से जुड़ पाते हैं । “

वर्तमान समय में विदेशी ताकतों द्वारा भारतीय संस्कृति को नष्ट करने का बड़ा गहरा षड्यंत्र चल रहा है । इसके तहत संस्कृति के आधारस्तम्भ संतों-महापुरुषों को झूठे, कपोलकल्पित, घिनौने मामलों में फँसाकर लोगों की आस्था तथा निष्ठा तोड़ने का कार्य किया जा रहा है, जो कि देशद्रोह है । आज मीडिया द्वारा देश के सम्मानीय लोगों, समाजसेवी संस्थाओं के प्रमुखों यहाँ तक कि हमारे आस्था केन्द्र संत-महापुरुषों के कार्टून बनाकर मजाक उड़ाना इत्यादि असंवैधानिक व निम्न स्तर का कार्य हो रहा है । इससे समाज का नैतिक पतन हो रहा है तथा मानवीय मूल्यों का हनन हो रहा है ।

हाल ही में पूज्य संत श्री आशारामजी बापू को षड्यंत्र के तहत झूठे आरोप लगवाकर फँसाया गया और अब मीडिया द्वारा रोज कुछ-न-कुछ बिना किसी प्रमाण के झूठी व बेबुनियाद खबरें दिखाकर समाज व देश की जनता को गुमराह किया जा रहा है तथा इन खबरों के द्वारा न्याय-प्रणाली पर दबाव डालने की साजिश की जा रही है । देश के संत-समाज एवं साधकगण, विभिन्न धार्मिक एवं सामाजिक संगठनों ने निर्दोष पूज्य बापूजी के खिलाफ हो रही साजिश की निंदा की है एवं विभिन्न संत-सम्मेलनों एवं गोष्ठियों द्वारा बापूजी को अपना पूर्ण समर्थन व्यक्त किया है ।

हम लोग देश की जनता, कार्यपालिका, विधायिका – सबका इस ओर ध्यान आकर्षित कर संत श्री आशारामजी बापू पर लगाये गये झूठे, मनगढ़त आरोपों का पूरी तरह खंडन करते हैं और उनके साथ जो घोर अन्याय एवं अत्याचार हो रहा है, उसका प्रतिवाद करते हैं ।

क्या हा सच्चाई

क्या है सच्चाई – 1

क्या है सच्चाई -2

क्या है सच्चाई -2

षडयंत्र की पूरी वास्तविकता जानिए …

SHADYANTRA KI VASTAVIKTA

आप सभी संतो, साधकों, गुरु-भक्तों और देशवासियों की श्रद्धा सच्चे संतो मे टीकी रहे ऐसी सुभ-कामना के साथ आप सभी को हरी ॐ |

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सत्संग

अपनी डफली अपना राग


एक में सब, सब में एक। तू ही तू, तू ही तू…

Ashram.org

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आत्मा के प्रमाद से जीव दुःख पाते हैं। आकाश में वन नहीं होता और चन्द्रमा के मंडल में ताप नहीं होता, वैसे ही आत्मा में देह या इन्द्रियाँ कभी नहीं हैं। सब जीव आत्मरूप हैं। वृक्ष में बीज का अस्तित्व छुपा हुआ है, ऐसे ही जीव में ईश्वर का और ईश्वर में जीव का अस्तित्व है फिर भी जीव दुःखी है, कारण की जानता नहीं है। चित्त में आत्मा का अस्तित्व है और आत्मा में चित्त का, जैसे बीज में वृक्ष-वृक्ष में बीज। जैसे बालू से तेल नहीं निकल सकता, वन्ध्या स्त्री का बेटा संतति पैदा नहीं कर सकता, आकाश को कोई बगल में बाँध नहीं सकता, ऐसे ही आत्मा के ज्ञान के सिवाय सारे बंधनों से कोई नहीं छूट सकता। आत्मा का ज्ञान हो जाय, उसमें टिक जाय तो फिर व्यवहार करे चाहे समाधि में रहे, उपदेश करे चाहे मौन रहे, अपने आत्मा में वह मरत…

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Saint: The Life-breath of A Nation

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Tomaraja was the king of Kaivarta state. Once it so happened that a visitor from a neighboring state was insulted in Kaivarta. That person went back and said, “The citizens of our kingdom are blatantly insulted in the kingdom of Tomaraja.”

In due course the message made its way to Vishwajita, the king of that state. He said, “I cannot tolerate the insult of even a sweeper of my kingdom. I am proud of my citizens. It is the citizens; who make the king great. Of what use is the king who cannot protect his subjects from insults? O Commander, you lay a siege to the kingdom of Kaivarta, and have a firm determination to defeat that state in war. I too shall join you there if need be.”

The Commander said, “No Your Majesty! We shall manage it ourselves.”

King Vishwajita thought they would conquer King Tomaraja easily.

The king of Kaivarta no doubt was a small king, but he was the devotee and disciple of a saint who was in communion with God, the greatest of the great. This was the reason why it was found to be extremely difficult for Vishwajita to attain victory in the war. As the war continued for four days, with no significant success coming their way, the king said, “These enemies couldn’t have stood against us for even an hour, and yet just see how they are stretching it for days together with massive losses on our side! What after all is the matter? Do anything you must; for it is only by pulverizing them that we can avenge the insult of our citizen.”

The soldiers could do nothing on the war front, but one day they managed to arrest a citizen of Kaivarta, Saint Sri Devalashwaji on charges of spying; while he was passing through the area where Vishwajita’s army were camping. The saint was blissfully ignorant about the danger of passing through the enemy camps.  He wasn’t a spy, but Vishwajita thought, ‘We are not going to win the war; so why not hang this citizen of the enemy kingdom and douse the fire of venom raging in our hearts!’ He roared, “He will be sentenced to death. He will be hanged.”

Though named ‘Vishwajita’, i.e. ‘the conqueror of the world’, he was defeated by inner enemies such as anger, jealousy and egotism. One who hears satsang and conquers all passions is the true ‘Vishwajita’ otherwise so many were named ‘Vishwajita’ when they were born but they died without becoming ‘Vishwajita’ in true sense.

When the people of Kaivarta state came to know that their beloved Saint Sri Dewalashwaji had not only been arrested; but was also sentenced to death by hanging in near future; they all stopped taking food and water. They held a mass prayer. They said, ‘O God, no such an injustice should not be done to your beloved innocent saint at any cost.’ The king too was informed about this matter. He became calm for a while and began to think over the strategy ahead. When faced with some big trouble that can’t be surmounted by individual effort, one should seek support from a powerful man. Kings are generally rajasic in nature (characterized by anger, action, passion, envy etc.), yet this king thought, ‘One of their citizens was insulted and they attacked us to avenge the same; here they have captured our revered saint, who is absolutely innocent. It is altogether another issue that they have arrested him on the false charges of spying. Oh God, what should I do now? …’

One fine morning a stranger came to the royal court of Vishwajita, and said, “I have brought the message of Tomaraja, the king of the neighbouring Kaivarta.”

“I see, that’s a very small state, and still continuing the battle. So, has he now accepted defeat?”

“No, he hasn’t accepted defeat nor is he going to accept it ever; but you have arrested a saint of our state. So, king Tomaraja has sent the message that he is ready to pay 2 crores gold coins for the release of the saint.”

“2 crores! You mean 2 crores gold coins for releasing just one person!”

“He is not a mere person; he is the Soul of the universe having experienced oneness with the Supreme Consciousness. People get peace of mind listening to his pious words. People become virtuous souls on having His darshan. He is a saint.”

“Is Dewalashwaji a saint? But he has been arrested on charges of spying; and how can we release an enemy spy, even if he be a saint?”

“The king of Kaivarta has sent a request, ‘Whatever additional conditions may be put forward by you; they are all acceptable to us. If 2 crores gold coins fall short of your expectations, we won’t mind giving away our entire kingdom; but we can’t tolerate the assassination of a saint of our state.”

Vishwajita was left shocked, “What after all is so special about that saint?”

“He is a saint. He is free from ignorance. ‘I am the body and I am subject to birth and death,’ is the common notion of a worldly man. Whereas, his realization is ‘I am the Soul, I am unborn and deathless.’ The whole society earns huge religious merits just by having darshan of such a man of Knowledge; and due only to his pious presence we, a small kingdom, are able to wage war for a long time with none other than a great emperor like you. The supreme value and importance of the blessings, guidance and grace of a saint is known to the king of Kaivarta.”

“So, will Tomaraja really pay 2 crores gold coins to me?”

“Yes, certainly.”

“But, you are completely unknown to me; how can I trust you? I need some concrete evidence.”

That unknown man then extended his right hand towards the king. There was an inscription on his brilliantly dazzling ring – ‘Kaivarta-king, Tomaraja’. On seeing that, Vishwajita quickly jumped down from his throne and embraced him affectionately, saying – “O King, it’s you! You have come early in the morning to beg for the release of the saint all alone and weapon-less, without even caring for your own life! You have enlightened me to a great truth. Now, there is no question of continuing this war; please accept me as your friend. Even befriending one; who is protected by a saint is sure to bring me good.” The massacre of soldiers was stopped, the bloodshed came to an end; and there was a blessed flow of love all around.

I would like to congratulate the Kaivarta-king, Tomaraja a thousand times. Who can ever harm the kingdom; which is protected by a saint; and whose ruler is a great Guru-Bhakta like King Tomaraja. Since then the two neighboring states became allies.

संत : राष्ट्र के प्राणाधार

कैवर्त राज्य का राजा था तोमराज । पडोसी राज्य से आये किसी व्यक्ति का कैवर्त में अपमान हो गया । वह अपने राज्य में जाकर बोला : “कैवर्त-सम्राट तोमराज के राज्य में हमारे राज्य के नागरिकों का अपमान हो रहा है ।”

राजा विश्वजित तक बात पहुँची । राजा ने कहा : “मेरे राज्य के झाडू लगानेवाले का भी कोई अपमान करेगा तो हम बर्दाश्त नहीं करेंगे । हमारे नागरिक हमारी शान हैं । नागरिक हैं तो राजा है । जब नागरिक का अपमान होता है तो राजा किस काम का ? जाओ सेनापति ! कैवर्त-सम्राट तोमराज के राज्य को घेरा डालो और उस राज्य को परास्त करने का दृढ़ निश्चय करो । जरूरत पडी तो मैं भी आ जाता हूँ ।”

सेनापति : “नहीं राजन् ! हम निपटा लेंगे ।”

राजा विश्वजित ने सोचा कि ‘तोमराज को यूँ जीत लेंगे…’ कैवर्त-सम्राट था तो छोटा राजा लेकिन बडे-में-बडे जो परमात्मा हैं, उससे मिले हुए संत का भक्त था, शिष्य था । इसलिए विश्वजित को युद्ध जीतना भारी पड रहा था, युद्ध में कोई सफलता नहीं मिल रही थी । १ दिन, २ दिन, ३ दिन, ४ दिन बीते… बोले : “ये तो १ घंटे के ग्राहक थे लेकिन ४-५ दिन हो गये और हमारी सेना मारी जा रही है ! आखिर क्या है ? कुछ भी करो, हमारे नागरिक के अपमान का बदला उस राज्य की मिट्टी पलीत करने से ही होगा ।”

सैनिक और तो कुछ कर नहीं पाये लेकिन एक दिन कैवर्त-सम्राट के नागरिक, संत देवलाश्वजी विश्वजित के सैनिक-खेमों के पास से गुजरे तो विश्वजित के सैनिकों ने उनको जासूसी के गुनाह में पकड लिया । अब उन संत को तो पता भी नहीं था कि यहाँ से गुजरना है कि नहीं ! जासूस तो थे नहीं लेकिन विश्वजित ने सोचा, ‘शत्रु राज्य का नागरिक है न, और उसको हम जीत नहीं सकते हैं तो चलो, उनके एक आदमी को ही फाँसी देकर अपनी जलन निकालें ।’ वह गुस्से में बोला : “इनको फाँसी की सजा दी जायेगी !”

नाम तो था विश्वजित लेकिन भीतर से क्रोध के आगे, द्वेष और अहंकार के आगे हारा हुआ था । विश्वजित तो वह है जो सत्संग के द्वारा विकारों को हरा दे, बाकी तो कई विश्वजित पैदा हो के मर गये ।

कैवर्त राज्य के लोगों ने सुना कि उनके संत देवलाश्वजी बंदी बनाये गये हैं और उनको फाँसी की सजा सुना दी गयी है । लोगों ने खाना-पीना छोड दिया । भगवान को पुकारने लगे : ‘हे भगवान ! कुछ भी हो, तुम्हारे प्यारे संत, निर्दोष संत के साथ ऐसा अन्याय न हो !’ सम्राट के कान बात गयी । कैवर्त-सम्राट शांत हो गया और सोचने लगा कि ‘अब क्या करें ?’

जब कोई ब‹डी मुसीबत आये और अपने बलबूते से वह हटायी नहीं जा सके तो किसी-न-किसी बलवान की शरण लेनी चाहिए । सम्राट तो रजोगुणी होते हैं किन्तु यह सम्राट सोचने लगा, ‘उनके देश के किसी नागरिक का अपमान हुआ तो वे हमारे देश पर चढाई करते हैं और अब तो हमारे देश के संत को ही उन्होंने पकड लिया है । मेरे देश के संत निर्दोष हैं, वे लोग भले दोष मान लें जासूसी का । अब हम क्या करें प्रभु ?…’

एक सुबह एक अनजान व्यक्ति पहुँचा विश्वजित के राजदरबार में और बोला : “मैं पडोसी देश का संदेशा लाया हूँ, कैवर्त-सम्राट तोमराज का ।”

“अच्छा ! वह तो छोटा-सा राज्य है, अभी तक लोहा ले रहा है । अब क्या उसने हार मान ली ?”

“नहीं, उन्होंने हार तो नहीं मानी और वे हारेंगे भी नहीं किन्तु हमारे राज्य के संत को आपने बंदी बनाया है । सम्राट तोमराज ने कहा है कि २ करोड़  स्वर्णमुद्राएँ ले लो और हमारे संत को रिहा कर दो ।”

“२ करोड़  ! एक व्यक्ति के लिए २ करोड़  स्वर्णमुद्राएँ !”

“वे व्यक्ति नहीं हैं, विश्वात्मा हैं । परमात्मा से उनका मन जुड़ा हुआ है । उनकी वाणी से लोगों को शांति मिलती है । उनके दर्शन से लोग पुण्यात्मा हो जाते हैं । वे संत हैं ।”

“देवलाश्वजी संत हैं ? वे तो जासूसी के गुनाह में पकड़े गये हैं और शत्रु का जासूस चाहे संत हो, हम कैसे छोड सकते हैं ?”

“कैवर्त-सम्राट ने प्रार्थना भेजी है कि और जो भी कुछ आप शर्त रखें, हमें कबूल है । २ करोड़  स्वर्णमुद्राएँ अगर कम लगें तो मैं अपना राज्य देने से भी चूकूँगा नहीं । हमारे देश के संत की हत्या हम बर्दाश्त नहीं करेंगे ।”

विश्वजित की आँखें फटी रह गयीं : “आखिर तो उस संत में क्या है ?”

“वे संत हैं, उनके अज्ञान का अंत हो गया है । ‘मैं शरीर हूँ और जन्मता-मरता हूँ’- यह संसारी लोग मानते हैं । ‘मैं आत्मा हूँ, अजन्मा हूँ’- ऐसा ज्ञान उन्हें हुआ है । ऐसे पुरुष के दर्शन से समाज का पुण्य बढ़ता है और ऐसे पुरुष हैं तो हमारा छोटा-सा राज्य भी आपके इतने बडे चक्रवर्ती राज्य से लोहा लेने में सफल हो रहा है । संत का आशीर्वाद, मार्गदर्शन, कृपाप्रसाद… वह तो हमारे कैवर्त-सम्राट तोमराज जानते हैं ।”

“क्या २ करोड़  स्वर्णमुद्राएँ दे देंगे तोमराज ?”  “हाँ ।”

“उसका प्रमाण क्या है ? तुम तो आगंतुक व्यक्ति हो, मैं कैसे विश्वास करूँ ?”

उस आगंतुक ने अपना दायाँ हाथ सम्राट विश्वजित के नजदीक कर दिया । चमचमाती अँगूठी में लिखा था : ‘कैवर्त-सम्राट तोमराज’ ! विश्वजित कूदकर नीचे उतरा और गले लगाया : “सम्राट तुम ! संत को रिहा कराने की भीख माँगने अपने प्राणों की बाजी लगाकर सुबह-सुबह अकेले, निहत्थे आये हो ! तुमने मेरी आँखें खोल दी हैं । अब युद्ध तो क्या चलेगा, तुम मुझे अपना मित्र बना लो । जिसके रक्षक संत हैं, उसका मित्र बनने से भी हमारा कल्याण होगा ।”

हजारों सैनिकों की मृत्यु का अंत हुआ, खून की धाराओं का अंत हुआ और प्रेम का प्रसाद बहने लगा ।

मैं कैवर्त-सम्राट तोमराज को हजार-हजार बार धन्यवाद दूँगा । जिस कैवर्त राज्य के रखवाले संत हैं और जिस राजसत्ता को सँभालनेवाले तोमराज जैसे गुरुभक्त हैं, उस राज्य का बाल बाँका कौन कर सकता है ! उस दिन से दोनों पडोसी राज्य दूध-शक्कर की नार्इं रहे ।

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संत श्री आशारामजी बापू ने चाय – बीडी – पान – मसाला – तम्बाकू – सिगरेट – गुटखा – शराब लाखों लोगो के छुडवा दिये, इससे इसका उत्पादन करने वाली कम्पनीयों का करोडो रूपये का नुकशान होने लगा | और डॉक्टरों का घंधा चोपट हो गया | और कई मेडिकल स्टोर्स बंद हो गये | और दवा बनानेवाली कंपनियों का करोड़ों रुपयों का नुकशान होने लगा | इसके इलावा पूज्य बापूजी ने धर्मांतरण को रोका है | पूज्य बापूजी के भक्त – साधक परिवार फ़िल्म बहुत कम देखते है | और जीवन उपयोगी चीजे बापूजी के आश्रम की ज्यादा इस्तेमाल करते है, जों कि सस्ती और अच्छी होती है | इससे कई विदेशी कम्पनियों को करोड़ो रूपये का नुकशान होता है | इन कारणों से सभी कम्पनियों ने और धर्मांतरण वालोने मिलके पूज्य बापूजी के खिलाफ षड़यंत्र किया है |

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The Truth of New Year Gudi Padwa


नया वर्ष का सच

The Truth of New Year

भारतीय संस्कृति का चैत्री नूतन वर्ष – 28 मार्च
चैत्रे मासि जगद् ब्रम्हाशसर्ज प्रथमेऽहनि ।
-ब्रम्हपुराण

अर्थात ब्रम्हाजी ने सृष्टि का निर्माण चैत्र मास के प्रथम दिन किया । इसी दिन से सत्ययुग का आरंभ हुआ । यहीं से हिन्दू संस्कृति के अनुसार कालगणना भी #आरंभ हुई । इसी कारण इस दिन वर्षारंभ मनाया जाता है । यह दिन महाराष्ट्र में ‘गुडीपडवा’ के नाम से भी मनाया जाता है । गुडी अर्थात् ध्वजा । पाडवा शब्द में से ‘पाड’ अर्थात पूर्ण; एवं ‘वा’ अर्थात वृद्धिंगत करना, परिपूर्ण करना । इस प्रकार पाडवा इस शब्द का अर्थ है, परिपूर्णता ।

गुड़ी (बाँस की ध्वजा) खड़ी करके उस पर वस्त्र, ताम्र- कलश, नीम की पत्तेदार टहनियाँ तथा शर्करा से बने हार चढाये जाते हैं।

गुड़ी उतारने के बाद उस शर्करा के साथ नीम की पत्तियों का भी प्रसाद के रूप में सेवन किया जाता है, जो जीवन में (विशेषकर वसंत ऋतु में) मधुर रस के साथ कड़वे रस की भी आवश्यकता को दर्शाता है।

वर्षारंभके दिन सगुण #ब्रह्मलोक से प्रजापति, ब्रह्मा एवं सरस्वतीदेवी इनकी सूक्ष्मतम तरंगें प्रक्षेपित होती हैं ।

चैत्र #शुक्ल प्रतिपदा के दिन प्रजापति तरंगें सबसे अधिक मात्रा में पृथ्वी पर आती हैं । इस दिन सत्त्वगुण अत्यधिक मात्रा में #पृथ्वी पर आता है । यह दिन वर्ष के अन्य दिनों की तुलना में सर्वाधिक सात्त्विक होता है ।

प्रजापति #ब्रह्मा द्वारा तरंगे पृथ्वी पर आने से वनस्पति के अंकुरने की भूमि की क्षमता में वृद्धि होती है । तो बुद्धि प्रगल्भ बनती है । कुओं-तालाबों में नए झरने निकलते हैं ।

#चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन #धर्मलोक से धर्मशक्ति की तरंगें पृथ्वी पर अधिक मात्रा में आती हैं और पृथ्वी के पृष्ठभाग पर स्थित धर्मबिंदु के माध्यम से ग्रहण की जाती हैं । तत्पश्चात् आवश्यकता के अनुसार भूलोक के जीवों की दिशा में प्रक्षेपित की जाती हैं ।

इस दिन #भूलोक के वातावरण में रजकणों का प्रभाव अधिक मात्रा में होता है, इस कारण पृथ्वी के जीवों का #क्षात्रभाव भी जागृत रहता है । इस दिन वातावरण में विद्यमान अनिष्ट शक्तियों का प्रभाव भी कम रहता है । इस कारण वातावरण अधिक #चैतन्यदायी रहता है ।
भारतीयों के लिए चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का दिन अत्यंत शुभ होता है ।

साढे तीन मुहूर्तों में से एक #मुहूर्त

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, अक्षय तृतीया एवं दशहरा, प्रत्येक का एक एवं कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा का आधा, ऐसे साढे तीन मुहूर्त होते हैं । इन साढे तीन #मुहूर्तों की विशेषता यह है कि अन्य दिन शुभकार्य हेतु मुहूर्त देखना पडता है; परंतु इन चार दिनों का प्रत्येक क्षण #शुभमुहूर्त ही होता है ।

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम एवं धर्मराज युधिष्ठिर का राजतिलक दिवस, मत्स्यावतार दिवस, #वरुणावतार संत #झुलेलालजी का अवतरण दिवस, सिक्खों के द्वितीय गुरु #अंगददेवजी का #जन्मदिवस, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार का जन्मदिवस, चैत्री नवरात्र प्रारम्भ आदि पर्वोत्सव एवं जयंतियाँ वर्ष-प्रतिपदा से जुड़कर और अधिक महान बन गयी।

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रकृति सर्वत्र माधुर्य #बिखेरने लगती है।

भारतीय संस्कृति का यह नूतन वर्ष जीवन में नया उत्साह, नयी चेतना व नया आह्लाद जगाता है। वसंत #ऋतु का आगमन होने के साथ वातावरण समशीतोष्ण बन जाता है।

सुप्तावस्था में पड़े जड़-चेतन तत्त्व गतिमान हो जाते हैं । नदियों में #स्वच्छ जल का संचार हो जाता है। आकाश नीले रंग की गहराइयों में चमकने लगता है।

सूर्य-रश्मियों की प्रखरता से खड़ी फसलें परिपक्व होने लगती हैं ।

किसान नववर्ष एवं नयी फसल के स्वागत में जुट जाते हैं। #पेड़-पौधे नव पल्लव एवं रंग-बिरंगे फूलों के साथ लहराने लगते हैं।

बौराये आम और कटहल नूतन संवत्सर के स्वागत में अपनी सुगन्ध बिखेरने लगते हैं । सुगन्धित वायु के #झकोरों से सारा वातावरण सुरभित हो उठता है ।

कोयल कूकने लगती हैं । चिड़ियाँ चहचहाने लगती हैं । इस सुहावने मौसम में #कृषिक्षेत्र सुंदर, #स्वर्णिम खेती से लहलहा उठता है ।

इस प्रकार #नूतन_वर्ष का प्रारम्भ आनंद-#उल्लासमय हो इस हेतु प्रकृति माता सुंदर भूमिका बना देती है । इस बाह्य #चैतन्यमय प्राकृतिक वातावरण का लाभ लेकर व्यक्तिगत व सामाजिक जीवन में भी उपवास द्वारा #शारीरिक #स्वास्थ्य-लाभ के साथ-साथ जागरण, नृत्य-कीर्तन आदि द्वारा भावनात्मक एवं आध्यात्मिक जागृति लाने हेतु नूतन वर्ष के प्रथम दिन से ही माँ आद्यशक्ति की उपासना का नवरात्रि महोत्सव शुरू हो जाता है ।

नूतन वर्ष प्रारंभ की पावन वेला में हम सब एक-दूसरे को सत्संकल्प द्वारा पोषित करें कि ‘सूर्य का तेज, चंद्रमा का अमृत, माँ शारदा का ज्ञान, भगवान #शिवजी की #तपोनिष्ठा, माँ अम्बा का शत्रुदमन-सामर्थ्य व वात्सल्य, दधीचि ऋषि का त्याग, भगवान नारायण की समता, भगवान श्रीरामचंद्रजी की कर्तव्यनिष्ठा व मर्यादा, भगवान श्रीकृष्ण की नीति व #योग, #हनुमानजी का निःस्वार्थ सेवाभाव, नानकजी की #भगवन्नाम-निष्ठा, #पितामह भीष्म एवं महाराणा प्रताप की #प्रतिज्ञा, #गौमाता की सेवा तथा ब्रह्मज्ञानी सद्गुरु का सत्संग-सान्निध्य व कृपावर्षा – यह सब आपको सुलभ हो ।

इस शुभ संकल्प द्वारा ‘#परस्परं #भावयन्तु की सद्भावना दृढ़ होगी और इसी से पारिवारिक व सामाजिक जीवन में #रामराज्य का अवतरण हो सकेगा, इस बात की ओर संकेत करता है यह ‘#राम राज्याभिषेक दिवस।

अपनी गरिमामयी संस्कृति की रक्षा हेतु अपने मित्रों-संबंधियों को इस पावन अवसर की स्मृति दिलाने के लिए बधाई-पत्र लिखें, दूरभाष करते समय उपरोक्त सत्संकल्प दोहरायें, #सामूहिक भजन-संकीर्तन व प्रभातफेरी का आयोजन करें, #मंदिरों आदि में #शंखध्वनि करके नववर्ष का स्वागत करें

Standard
यौगिक प्रयोग, सत्संग, ॐ की महिमा, dhyan

ध्यान (योग) – संत श्री आशारामजी बापू


संत श्री आशारामजी बापू

संत श्री आशारामजी बापू

ध्यान करने के लिए स्वच्छ जगह पर स्वच्छ आसन पे बैठकर साधक अपनी आँखे बंध करके अपने मन को दूसरे सभी संकल्प-विकल्पो से हटाकर शांत कर देता है। और ईश्वर, गुरु, मूर्ति, आत्मा, निराकार परब्रह्म या किसी की भी धारणा करके उसमे अपने मन को स्थिर करके उसमें ही लीन हो जाता है। जिसमें ईश्वर या किसीकी धारणा की जाती है उसे साकार ध्यान और किसीकी भी धारणा का आधार लिए बिना ही कुशल साधक अपने मनको स्थिर करके लीन होता है उसे योग की भाषा में निराकार ध्यान कहा जाता है। गीता के अध्याय-६ में श्रीकृष्ण द्वारा ध्यान की पद्धति का वर्णन किया गया है।

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सत्संग

विश्व में फैली अशांति को दूर करने का उपाय


vishva shanti

Only Then World Peace is Possible…

प्रश्न : स्वामीजी ! आज विश्व में हर कोई आगे भागना चाहता है । रास्ता सही है या गलत – इससे उसको कोई मतलब नहीं । दूसरे को धक्का दे के सिर्फ दौड में आगे पहुँचना है । इससे विश्व में जो अशांति फैल रही है, उसे दूर करने का क्या कोई रास्ता है ?

पूज्य बापूजी : हाँ, रास्ता है । दूसरे को धक्का दे के आगे बढने की अपेक्षा दूसरे को आगे बढाते हुए आगे बढने का रास्ता है । किसीकी टाँग खींचकर आगे बढने, ऊपर उठने के बजाय साथ में आगे बढने से शांति का संबंध है । Every action creates a reaction. हम जो भी करते हैं, वह घूम-फिर के हमारे पास आता है । हम भले विचार करेंगे, भलाई करेंगे तो हमारे चित्त में भले भाव पैदा होंगे । सामनेवाले का अहित सोचेंगे तो उसका अहित हो चाहे न हो लेकिन अहित के विचार से हमारे चित्त में अशांति और धड़कनें बढ़ जाती हैं ।

विश्व में अशांति क्यों है ? क्योंकि शांति का जो मूल है, उसको विश्व भूल गया है और इन्द्रियों को तृप्त करने के पीछे पडा है । मनुष्य जितना विषय-विकारों के पीछे तेजी से भागेगा, उतना ही मन की चंचलता बढ़ेगी, उतना ही झूठ-कपट, धोखाधड़ी करके सुखी रहने की कोशिश करेगा । हकीकत में दूसरे का शोषण या दूसरे को दुःखी करके जो सुखी होने की कोशिश करता है, वह प्राचीनकाल से आसुरी स्वभाववालों की सूची में गिना जाता है । आसुरं भावमाश्रिताः । (गीता : ७.१५) जो आसुर भाव का आश्रय लेते हैं, वे भले बाहर से थोड़े सुखी और सफल दिख जायें थो‹डे दिन के लिए लेकिन उन्हें चित्त की शांति, माधुर्य नहीं मिलता ।

बोले, ‘चित्त की शांति से क्या लाभ होगा ?’ चित्त की शांति से ‘परमात्म-प्रसाद, आत्मसुख’ की प्राप्ति होगी । परमात्म-प्रसाद मतलब बुद्धि को जो संतोष मिलेगा, मन को जो तृप्ति मिलेगी उससे आप जिस किसी व्यवहार में हैं, जिस किसी प्रवृत्ति में हैं सही निर्णय आयेंगे । बहुत सारे रोग, बहुत सारे गलत निर्णय, दुर्घटनाएँ तथा बहुत सारे झगड़’ अशांति के कारण होते हैं । सारे दुःखों का मूल अगर खोजा जाय तो अशांति है और सारे सुखों का मूल परमात्म-शांति है ।

अशान्तस्य कुतः सुखम् । ‘अशांत को सुख कहाँ ?’

शान्तस्य कुतः दुःखम् । ‘शांत को दुःख कहाँ ?

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