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साजिश को सच का रूप देने की मनोवैज्ञानिक रणनीति


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संत श्री आशारामजी बापू के खिलाफ जो षड्यंत्र चल रहा है, उसका मनोवैज्ञानिक तरीके से किस तरह से सुनियोजन किया गया है, यह मैं एक मनोविज्ञानी होने के नाते आपको बताना चाहती हूँ । आठ मुख्य पहलू समझेंगे कि किस तरह इस साजिश को सच का मुखौटा पहनाया जा रहा है ।

(१) जनता के विशिष्ट वर्गों पर निशाना : समाज के शिक्षित, जागरूक, उच्च एवं मुख्यतः युवा वर्ग को निशाना बनाया गया क्योंकि इनको विश्वास दिलाने पर ये तुरंत प्रतिक्रिया करते हैं ।

(२) षड्यंत्र का मुद्दा : देश की ज्वलंत समस्या ‘महिलाओं पर अत्याचार’ को मुख्य मुद्दा बनाया है । इस भावनात्मक विषय पर हर कोई तुरंत प्रतिक्रिया दे के विरोध दर्शाता है ।

(३) रणनीति : चीज को यथार्थपूर्ण, विश्वसनीय, प्रभावशाली दिखाने जैसी मार्केटिंग रणनीति का उपयोग करके दर्शकों को पूरी तरह से प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है ।

दर्शक मनोविज्ञान का भी दुरुपयोग किया जा रहा है । कोई विज्ञापन हमें पहली बार पसंद नहीं आता है लेकिन जब हम बार-बार उसे देखते हैं तो हमें पता भी नहीं चलता है कि कब हम उस विज्ञापन को गुनगुनाने लग गये । बिल्कुल ऐसे ही बापूजी के खिलाफ इस बोगस मामले को बार-बार दिखाने से दर्शकों को असत्य भी सत्य जैसा लगने लगता है ।

(४) प्रस्तुतिकरण का तरीका : पेड मीडिया चैनलों के एंकर आपके ऊपर हावी होकर बात करना चाहते हैं । वे सिर्फ खबर को बताना नहीं चाहते बल्कि सेकंडभर की फालतू बात को भी ‘ब्रेकिंग न्यूज’ बताकर दिनभर दोहराते हैं और आपको हिप्नोटाइज करने की कोशिश करते हैं ।

(५) भाषा : खबर को बहुत चटपटे शब्दों के द्वारा असामान्य तरीके से बताते हैं । ‘बात गम्भीर है, झड़प, मामूली’ आदि शब्दों की जगह ‘संगीन, वारदात, गिरोह, बड़ा खुलासा, स्टिंग ऑपरेशन’ ऐसे शब्दों के सहारे मामूली मुद्दे को भी भयानक रूप दे देते हैं ।

(६) आधारहीन कहानियाँ बनाना, सुटिंग ऑपरेशन्स और संबंधित बिन्दु : ‘आश्रम में अफीम की खेती, स्टिंग ऑपरेशन’ आदि आधारहीन कहानियाँ बनाकर मामले को रुचिकर बना के उलझाने की कोशिश करते हैं ।

(७) मुख्य हथियार : बहुत सारे विडियो जो दिखाये जाते हैं वे तोड़-मरोड़ के बनाये जाते हैं । ऐसे ऑडियो टेप भी प्रसारित किये जाते हैं । यह टेक्नोलॉजी का दुरुपयोग है ।

इसके अलावा कमजोर, नकारात्मक मानसिकतावालों को डरा के या प्रलोभन देकर उनसे बुलवाते हैं । आश्रम से निकाले गये २-५ बगावतखोर लोगों को मोहरा बनाते हैं ताकि झूठी विश्वसनीयता ब‹ढायी जा सके ।

(८) मनोवैज्ञानिक वातावरण तैयार करना : बापूजी की जमानत की सुनवाई से एक दिन पहले धमकियों की खबरें उछाली जाती हैं, कभी पुलिस को, कभी माता-पिता और लड़की को तो कभी न्यायाधीश को । ये खबरें कभी भी कुछ सत्य साबित नहीं हुर्इं ।

अब आप खुद से प्रश्न पूछिये और खुद ही जवाब ढूँढिये कि क्या यह आरोप सच है या एक सोची-समझी साजिश ?

और एक बात कि केवल पेड मीडिया चैनल ही नहीं बल्कि इसीके समान प्रिंट मीडिया भी खतरनाक तरीके से जनमानस को प्रभावित कर रहा है । इन दोनों से सावधान रहना चाहिए ।

– शिल्पा अग्रवाल,

प्रसिद्ध मनोविज्ञानी

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निर्दोष, निष्कलंक बापू


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किसीने ठीक ही लिखा है कि हिन्दू तो वह बूढ़े काका का खेत है, जिसे जो चाहे जब जोत जाय । उदार, सहिष्णु और क्षमाशील इस वर्ग के साथ वर्षों से बूढ़े काका के खेत की तरह बर्ताव हो रहा है । हिन्दू समाज का नेतृत्व करनेवाले ब्रह्मज्ञानी संतों, महात्माओं, समाज-सुधारकों, क्रांतिकारी प्रखर वक्ताओं पर जिसके मन में जो आता है, वह कुछ भी आरोप मढ़ देता है । अब तो दुष्प्रचार की हद हो गयी, जब ७३ वर्षीय पूज्य संत श्री आशारामजी बापू पर साजिशकर्ताओं की कठपुतली, मानसिक असंतुलन वाली कन्या द्वारा ऐसा घटिया आरोप लगवाया गया, जिसका कोई सिर-पैर नहीं, जिसे सुनने में भी शर्म आती है । इससे देश-विदेश में फैले बापूजी के करोड़ो भक्तों व हिन्दू समाज में आक्रोश का ज्वालामुखी सुलग रहा है ।

कुदरत के डंडे से कैसे बचेंगे ?

आरोप लगानेवाली ल‹डकी की मेडिकल जाँच रिपोर्ट में चिकित्सकों ने आरोप को साफ तौर पर नकार दिया है । इससे स्पष्ट होता है कि यह सिर्फ बापूजी को बदनाम करने की सोची-समझी साजिश है लेकिन प्रश्न यह है कि करोड़ो भक्तों के आस्था के केन्द्र बापूजी के बारे में अपमानजनक एवं अशोभनीय आरोप लगाकर भक्तों की श्रद्धा, आस्था व भक्ति को ठेस पहुँचानेवाले कुदरत के डंडे से कैसे बच पायेंगे ? शास्त्रों में स्पष्ट लिखा है कि ‘भगवान स्वयं का अपमान सहन कर सकते हैं मगर अपने प्यारे तत्त्वस्वरूप संतों का नहीं ।’

व्यावसायिक हितों की चिंता

इन झूठे, शर्मनाक आरोपों के मूल में वे शक्तियाँ काम कर रही हैं, जो यह कतई नहीं चाहती हैं कि बापूजी की प्रेरणा से संचालित गुरुकुलों के असाधारण प्रतिभासम्पन्न विद्यार्थी आगे चलकर देश, संस्कृति व गुरुकुल का नाम रोशन करें । दुनिया जानती है कि भारतीय वैदिक गुरुकुल परम्परा पर आधारित शिक्षण एवं सर्वांगीण व्यक्तित्व निर्माण के क्षेत्र में बापूजी के मार्गदर्शन में देशभर में चल रहे गुरुकुल आज कॉन्वेंट शिक्षण पद्धति के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुके हैं । एक तरफ कई व्यावसायिक संस्थाओं की लूट इस पहाड़ के नीचे आ रही है तो दूसरी तरफ इंटरनेट और अश्लील साहित्य सामग्री के जरिये देश के भविष्य को चौपट करने की सुनियोजित साजिश पर पानी फिर रहा है । ओजस्वी-तेजस्वी भारत निर्माण के बापूजी के संकल्प को हजम कर पाना उन साजिशकर्ताओं के लिए अब काँटोंभरी राह साबित हो रहा है । ऐसे में गुरुकुलों की बढ़ती लोकप्रियता, विश्वसनीयता की छवि और मेधावी बच्चों की प्रतिभा को कुचलने के लिए अब कुछ इस तरह से कीचड़ उछाला जा रहा है कि माता-पिता अपने बच्चों को गुरुकुल में भेजें ही नहीं ।

पहले गुरुकुल के बच्चों पर तांत्रिक विद्या का मनग‹ढंत आरोप लगाया गया परंतु जब सर्वोच्च न्यायालय में इन आरोपों की हवा निकल गयी तो अब सीधे बापूजी के चरित्र पर ही कीच‹ड उछालने लगे हैं । मगर सूर्य पर थूँकने का दुस्साहस करनेवाले खुद ही गंदे हो जाते हैं । जो समाज को मान-अपमान, qनदा-प्रशंसा और राग-द्वेष से ऊपर उठाकर समत्व में प्रतिष्ठित करते हुए समत्वयोग की यात्रा करवाते हैं, भला ऐसे संत के दुष्प्रचार की थोथी आँधी उनका क्या बिगा‹ड पायेगी ? टीआरपी के पीछे दौ‹डनेवाले चैनल बापू को क्या बदनाम कर पायेंगे ? बापू के भक्तों की हिमालय-सी दृ‹ढ श्रद्धा के आगे आरोप की बिसात एक तिनके के समान है ।

चाहे धरती फट जाय तो भी सम्भव नहीं

वैसे आज किसी पर भी कीच‹ड उछालना बहुत आसान है । पहले बापूजी के आश्रम के लिए जमीन ह‹डपने, अवैध कब्जे, गैर-कानूनी निर्माण के थोकबंद आरोप लगाये गये मगर सत्य की तराजू पर सभी झूठे, बेबुनियाद साबित हुए । जब इनसे काम नहीं बना तो बापूजी और उनके द्वारा संचालित आश्रम, समितियों और साधकों पर अत्याचार किये गये लेकिन भक्तों ने इनका डटकर मुकाबला किया । साजिश करनेवालों ने हर बार मुँह की खायी । कितने तो आज भी लोहे के चने चबा रहे हैं तो कितने कुदरत के न्याय के आगे खामोश हैं परंतु बावजूद इसके आज भी बापूजी के ऊपर अनाप-शनाप आरोप लगवानेवालों को अक्ल नहीं आयी । साजिशकर्ताओं के इशारे पर बकनेवाली एक ल‹डकी ने बापूजी पर जैसा आरोप लगाया है, दुनिया इधर-की-उधर हो जाय, धरती फट जाय तो भी ऐसा सम्भव नहीं हो सकता है । यह घिनौना आरोप भक्तों की श्रद्धा, साधकों की आस्था को डिगा नहीं सकता है ।

पूरा जीवन खुली किताब

बापूजी का पूरा जीवन खुली किताब की तरह है । उसका हर पन्ना और उस पर लिखी हर पंक्ति समाज का युग-युगांतर तक पथ-प्रदर्शन करती रहेगी । बापूजी कोई साधारण संत नहीं, वे असाधारण आत्मसाक्षात्कारी महापुरुष हैं ।

दरअसल सबसे ब‹डी समस्या यह है कि सारे आरोप हिन्दू संतों पर ही लगाये जाते हैं क्योंकि हिन्दू चुपचाप सब सह लेता है । दुनिया के और किसी धर्म में ऐसा होने पर क्या होता है यह किसीसे छुपा नहीं है । हमारी उदारता और सहिष्णुता का दुरुपयोग किया जाता है । तभी तो महापुरुषों को बदनाम करने का षड्यंत्र चलता ही रहा है, फिर चाहे कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य स्वामी श्री जयेन्द्र सरस्वतीजी हों या फिर सत्य साँर्इं बाबा हों । आरोप लगानेवालों ने तो माता सीताजी व भगवान श्रीकृष्ण पर भी लांछन लगाया था । ऐसे में यह कल्पना कैसे की जा सकती है कि समाज को संगठित कर दिव्य भारतीय संस्कृति की विश्व-क्षितिज पर पताका लहरानेवाले विश्ववंदनीय संत पर आरोप न लगाये जायें ? संत तो स्वभाव से ही क्षमाशील होते हैं लेकिन उनके भक्त अपमान बर्दाश्त करनेवाले नहीं हैं । झूठ के खिलाफ सत्य की यह धधकती मशाल अन्याय और अत्याचार के अँधेरे को कुचलकर ही रहेगी ।

– श्री निलेश सोनी (वरिष्ठ पत्रकार)

प्रधान सम्पादक, ‘ओजस्वी है भारत !’

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झूठे आरोपों से सावधान !


Bachcha

इस संसार में सज्जनों, सत्पुरुषों और संतों को जितना सहन करना पड़ा है उतना दुष्टों को नहीं । ऐसा मालूम होता है कि इस संसार ने सत्य और सत्त्व को संघर्ष में लाने का मानो ठेका ले रखा है । यदि ऐसा न होता तो गांधीजी को गोलियाँ नहीं खानी पड़तीं, दयानंदजी को जहर न दिया जाता और लिंकन व केनेडी की हत्या न होती । निंदा करनेवाला व्यक्ति किसी दूसरे का बुरा करने के प्रयत्न के साथ विकृत मजा लेने का प्रयत्न करता है । इस क्रिया में बोलनेवाले के साथ सुननेवाले का भी सत्यानाश होता है ।
निंदा एक प्रकार का तेजाब है । वह देनेवाले की तरह लेनेवाले को भी जलाता है । लेनेवाले की भी शांति, सूझबूझ और पुण्य नष्ट कर देता है । यह दुनिया का दस्तूर ही है कि जब-जब भी संसार में व्याप्त अंधकार को मिटाने के लिए जो दीपक अपने आपको जलाकर प्रकाश देता है, दुनिया की सारी आँधियाँ, सारे तूफान उस प्रकाश को बुझाने के लिए दौड़ पड़ते हैं निंदा, अफवाह और अनर्गल कुप्रचार की हवा को साथ लेकर ।
समाज जब किसी ज्ञानी संतपुरुष की शरण, सहारा लेने लगता है तब राष्ट्र, धर्म व संस्कृति को नष्ट करने के कुत्सित कार्यों में संलग्न असामाजिक तत्त्वों को अपने षड्यंत्रों का भंडाफोड़ हो जाने का एवं अपना अस्तित्व खतरे में पड़ने का भय होने लगता है । परिणामस्वरूप अपने कर्मों पर पर्दा डालने के लिए वे उस दीये को ही बुझाने के लिए नफरत, निंदा, कुप्रचार, असत्य, अमर्यादित व अनर्गल आक्षेपों व टीका-टिप्पणियों की आँधियों को अपने दिलो-दिमाग में लेकर लग जाते हैं, जो समाज में व्याप्त अज्ञानांधकार को नष्ट करने के लिए महापुरुषों द्वारा प्रज्वलित हुआ था ।
ये असामाजिक तत्त्व अपने विभिन्न षड्यंत्रों द्वारा संतों व महापुरुषों के भक्तों व सेवकों को भी गुमराह करने की कुचेष्टा करते हैं । समझदार साधक या भक्त तो उनके षड्यंत्रजाल में नहीं फँसते, महापुरुषों के दिव्य जीवन के प्रतिपल से परिलक्षित उनके सच्चे अनुयायी कभी भटकते नहीं, पथ से विचलित होते नहीं अपितु और अधिक श्रद्धायुक्त हो उनके दैवी कार्यों में अत्यधिक सक्रिय व गतिशील होकर सद्भागी हो जाते हैं लेकिन जिन्होंने साधना के पथ पर अभी-अभी कदम रखे हैं ऐसे कुछ नवपथिक गुमराह हो जाते हैं और इसके साथ ही आरम्भ हो जाता है नैतिक पतन का दौर, जो संतविरोधियों की शांति और पुण्यों को समूल नष्ट कर देता है ।
इन्सान भी बड़ा ही अजीब किस्म का व्यापारी है । जब चीज हाथ से निकल जाती है तब वह उसकी कीमत पहचानता है । जब महापुरुष शरीर छोड़कर चले जाते हैं, तब उनकी महानता का पता लगने पर वह पछताते हुए रोते रह जाता है और उनके चित्रों का आदर करने लगता है । लेकिन उनके जीवित सान्निध्य में उनका सत्संग-ज्ञान पचाया होता तो बात ही कुछ और होती । कई अन्य महापुरुषों और शिरडीवाले साँर्इं बाबा के साथ भी यही हुआ था |

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सावधानी ही साधना है


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गोधरा (गुजरात ) में पांडुरंग नाम का एक बड़ा ही कुशाग्र और सुदृढ़ विद्यार्थी था , जो दुसरो की मदद के लिए सदैव तत्पर रहता था । उसकी माता रुक्मिणी उसे बाबू कहकर पुकारती थी । वह बचपन से ही लौकिक पढाई के साथ अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य परमात्म प्राप्ति के प्रति खुब जागरुक था ।

वर प्रसन्न मुख सुजबुझ का धनी और एक अच्छा नाटककार भी था । वह बाँसुरी बहुत सुंदर व सुरीली बजाता था । जिसे सुननेवाले मंत्रमुग्ध हो जाते और रोज सुनने की अभिलाषा रखते थे । वह रोज शाम को आधा घण्टा बंसी बजाता और घूमने जाता था ।

एक दिन किसी बेचैनी के कारण उसने बंसी नही बजायी और सीधा घूमने निकल पड़ा । सामने टीले के ऊपर एक किशौरी बैठी थी । उसने पूछा की आज बाँसुरी क्यों नहीं बजायी ?

पाडुरंग एकदम चौक गया उसने पुछा : तुमने मुझसे किस कारण से पुछा ?

मझे आपकी बंसी की धुन बहुत अच्छी लगती है । हररोज सुनने के लिऐ मैं इस समय राह देखते हुए बैठती हुँ ।

उसके बाद घर जाती हूँ।

पांडुरंग ने महसूस किया कि उसका यह शौक उसकी एक आदत है और किसी के लिए लगाव का कारण । जिसे बाहरी जगत में नाम कमाना हो , संगीत के जगत में प्रसिद्ध होने की महत्वाकांक्षा हो अथवा जो कामी हो ऐसा कोई हो , ऐसा कोई व्यक्ति भले ऐसे प्रसंगो से खुश हो जाये किंतु जिन्हे भीतर के सोऽहं के संगीत का रस वास्तव में मिल गया हो वे राही अपने लक्ष्य से कभी भटक नही सकते । उसका तो यह सिद्धांत होता है कि ईश्वर के लिए संसार का सब कुछ छोड देगें लेकिन संसारी उपलब्धि और वाहवाही के लिए ईश्वर को कभी नहीं छोडेगे ।

पाडुरंग को लगा, जो लगाव प्रेम प्रमात्मा को करना चाहिए, वह इस नश्वर शरीर या किसी क्षणिक आनंददायी सुर ताल में उलझ जाय, यह उस व्यक्ति के लिए और खुद मेरे लिए भी दुखदायी हैं ।

दुसरे ही क्षण उसने अपनी प्यारी बाँसुरी उठायी और एक बड़ा पत्थर ढूँढ़ लिया । उस किशोरी ने देखा की जिस बाँसुरी ने उसे मोहित कर रखा था, उसके टुकडे टुकडे हो गयें हैं और कुँए के पानी की सतह पर तैर रहे हैं । आज से यह बाँसुरी कभी नही बजेगी । पांडुरंग के मुँह से ये उदगार सुन सभी स्तब्ध थे ।

जीवन के छोटे – से -छोटे कार्य में भी हमारी सावधानी होनी चाहिए । सावधानी ही साधना है । तटस्थता से नजर रखनी चाहिए कि यह कार्य हमे किस मार्ग पर ले जा रहा है और इसका अंतिम परिणाम क्या होगा ?

बाल्य काल से ही स्व नियंत्रण, इन्द्रिय -संयम आदि गुणों की मुर्ति पांडुरंग आगे चलकर अपने स्वरुपज्ञान को उपलब्ध हुए और संत रंग अवधूत महाराज के नाम से सुविख्यात हुए | इस लिए सुसज्जनों के लिए सावधानी ही साधना है |

akhir kya hai sach

साजिश-को-सच-का-रूप-देने-की-मनोवैज्ञानिक-रणनीति 

आखिर क्यों है सब से ज्यादा निशाने पर बापूजी 

मीडिया इस पर चुप क्यों ?

संस्कृति पर कुठाराघात 

 

 

 

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Amavasya


In this Satsang, Sant Shri Asaram Bapu ji advises that one should not have sex on the holy days of Holi, Diwali, Shivratri, Janmashtami, Amavasya & Poornima. This leads to mentally/physically crippled children, in case a child is conceived on these nights. Even if a child is not conceived, sex on these days leads to excessive loss of vital energy. Hence, householders should refrain from having sex on the aforementioned days.

Endearingly called ‘Bapu ji’ (Asaram Bapu Ji), His Holiness is a Self-Realized Saint from India. Pujya Asaram Bapu ji preaches the existence of One Supreme Conscious in every human being, be it Hindu, Muslim, Christian, Sikh or anyone else. Pujya Bapu ji represents a confluence of Bhakti Yoga, Gyan Yoga & Karma Yoga. For more information, kindly visit –

http://www.ashram.org [Official Website]

http://www.ashramnews.org [Official Website]

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हर कोई चाहता है, सुधार की भूमिका………


Rajasthan Patrika , jhuthi khabre

सुधर जा, सुधर ने की सीजन है …

सुधरजा राजस्थान पत्रिका वाले

Sudharja Rajasthan Patrika wale

जहाँ पर सारे बुद्धिजीवियों,डाक्टरों एवं वैज्ञानिकों की सारी खोजें पूर्ण हो जाती हैं, और विज्ञान जिस विषय पर आके बां पुकार देता है, वहाँ से अध्यात्म की शुरूआत होती है |

जिन्होंने पंच कर्मेन्द्रिय व ज्ञानेन्द्रियों और 11 वें मन पर विजय पा ली हो अब भला क्या उन महापुरूषों को हम अपनी छोटी मती-गति से तौलेंगे ? वे हमारे आपे से बाहर है |

वे महापुरूष क्या करना चाहते हैं और क्या नही…

भौतिक जगत के नेटवर्क से अध्यात्मिक जगत की तुलना करना कहाँ तक जायज है ?

भौतिक जगत के नेटवर्क में कुछ न कुछ समस्याएं आती ही रहती हैं क्योंकि वह प्रकृति जन्य है |

परंतु आध्यात्म जगत के नेटवर्किंग मैनेजमेंट में ऐसी समस्या नही होती | अगर इसपर कोई सवाल उठाता है तब तो वह मंद-बुद्धि प्राणी है |

सत्य की मांग होनी चाहिए लेकिन समय के दौर में वाद-प्रतिवाद व दोषारोपण करके समस्त कार्यप्रणाली को यदि कोई मोड देने का प्रयास करता है तो एक सवाल खड़ा होता है, प्रक्रिया-अंत का……. परिणाम ? कौन जिम्मेदार होगा ?

मिथ्याजगत की तुच्छ बातें क्या अपने आपमें ठोस है ?

जहाँ पर वेदों ने भी नेती नेती कह कर चुप्पी साध ली हो क्योंकि ब्रह्म मन, बुद्धि व वाणी का विषय नहीं है, जो शब्दों में बयां न किया जा सके उस तत्व में जिन्होंने स्थिति पा ली हो भला,

उस ब्रह्म को उनके मैंनेजमेंट  को क्या हम अपनी छोटी खोपडी से तौल पायेंगे ? ….नहीं ।

आज  यह विचार सभी भक्तों के मन में उठा है, सो लेखनी चल पडी ….

आप लोगों ने सत्संग में तो यह सुना ही होगा।

कि संत श्री आसारामजी बापू इस बार को लेकर 17 वीं बार धरती पर आ चुके हैं।

श्री योगवशिष्ठ महारामायण में

काकभूषुण्डी जी ने एक कथा सुनाई है।

उसमें भगवान रामजी का 12 बार और भगवान श्री कृष्ण के 16 बार अवतार कथा का वर्णन किया है।

पूर्व की बात को फीर से दोहराता हूँ …, आशाराम बापू जी ने उस सत्संग में कहा हैं की मैं 16 बार पहले भी आ चुका हूँ ये 17वीं बार मेरा आना हुआ है। और यह भी कहा हैं की पुराण आदि में मेरी कथाएँ भी आती हैं।

क्या अब भी पूज्य आसाराम बापूजी की महिमा को पहेचान नहीं पा रहे हो ?

कुछ लोग जानबूझकर whatsapp पर गलत सन्देश फैला रहे है और राजस्थान पत्रिका ने भी झूठी खबर छापी थी, साधकों से अनुरोध है, सच्ची खबर जानके के लिए www.ashram.org पर जाये और पूज्य आसाराम बापूजी का मंगलमय दर्शन और कोर्ट अपडेट के लिए www.aapatkalinmission.org पर जाये |

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Harmful Effects Of Oven-Foods


Harmful Effects Of Oven-Foods

OVEN FOODS

जो ओवन में गर्म करते है न खाना, तो समझो खिलाने वाले की सत्यानाश करते है। ओवन के माइक्रो वेव्स इतने तेज़ होते है, वैज्ञानिको ने प्रयोग किया ओवन में पानी गर्म करके फिर कुदरती शीतल हुआ, वो पौधे को दिया और दूसरा ओवन में  गर्म किया हुआ नही, सीधा पानी । तो जिस पौधे को ओवन वाला गर्म करके  फिर ठंडा करके दिया वो पौधा ४-६  दिन में सुख गया, मर गया और जिसको कुदरती पानी देते थे, वो जिन्दा रहा । तो जीवनशक्ति पोषकतत्व, ओवन में माइक्रो वेव्स होते है न उससे मर जाते  है ,तो ओवन स्वास्थ्य  के लिए बहुत बुरा है । 

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