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निर्दोष, निष्कलंक बापू


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किसीने ठीक ही लिखा है कि हिन्दू तो वह बूढ़े काका का खेत है, जिसे जो चाहे जब जोत जाय । उदार, सहिष्णु और क्षमाशील इस वर्ग के साथ वर्षों से बूढ़े काका के खेत की तरह बर्ताव हो रहा है । हिन्दू समाज का नेतृत्व करनेवाले ब्रह्मज्ञानी संतों, महात्माओं, समाज-सुधारकों, क्रांतिकारी प्रखर वक्ताओं पर जिसके मन में जो आता है, वह कुछ भी आरोप मढ़ देता है । अब तो दुष्प्रचार की हद हो गयी, जब ७३ वर्षीय पूज्य संत श्री आशारामजी बापू पर साजिशकर्ताओं की कठपुतली, मानसिक असंतुलन वाली कन्या द्वारा ऐसा घटिया आरोप लगवाया गया, जिसका कोई सिर-पैर नहीं, जिसे सुनने में भी शर्म आती है । इससे देश-विदेश में फैले बापूजी के करोड़ो भक्तों व हिन्दू समाज में आक्रोश का ज्वालामुखी सुलग रहा है ।

कुदरत के डंडे से कैसे बचेंगे ?

आरोप लगानेवाली ल‹डकी की मेडिकल जाँच रिपोर्ट में चिकित्सकों ने आरोप को साफ तौर पर नकार दिया है । इससे स्पष्ट होता है कि यह सिर्फ बापूजी को बदनाम करने की सोची-समझी साजिश है लेकिन प्रश्न यह है कि करोड़ो भक्तों के आस्था के केन्द्र बापूजी के बारे में अपमानजनक एवं अशोभनीय आरोप लगाकर भक्तों की श्रद्धा, आस्था व भक्ति को ठेस पहुँचानेवाले कुदरत के डंडे से कैसे बच पायेंगे ? शास्त्रों में स्पष्ट लिखा है कि ‘भगवान स्वयं का अपमान सहन कर सकते हैं मगर अपने प्यारे तत्त्वस्वरूप संतों का नहीं ।’

व्यावसायिक हितों की चिंता

इन झूठे, शर्मनाक आरोपों के मूल में वे शक्तियाँ काम कर रही हैं, जो यह कतई नहीं चाहती हैं कि बापूजी की प्रेरणा से संचालित गुरुकुलों के असाधारण प्रतिभासम्पन्न विद्यार्थी आगे चलकर देश, संस्कृति व गुरुकुल का नाम रोशन करें । दुनिया जानती है कि भारतीय वैदिक गुरुकुल परम्परा पर आधारित शिक्षण एवं सर्वांगीण व्यक्तित्व निर्माण के क्षेत्र में बापूजी के मार्गदर्शन में देशभर में चल रहे गुरुकुल आज कॉन्वेंट शिक्षण पद्धति के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुके हैं । एक तरफ कई व्यावसायिक संस्थाओं की लूट इस पहाड़ के नीचे आ रही है तो दूसरी तरफ इंटरनेट और अश्लील साहित्य सामग्री के जरिये देश के भविष्य को चौपट करने की सुनियोजित साजिश पर पानी फिर रहा है । ओजस्वी-तेजस्वी भारत निर्माण के बापूजी के संकल्प को हजम कर पाना उन साजिशकर्ताओं के लिए अब काँटोंभरी राह साबित हो रहा है । ऐसे में गुरुकुलों की बढ़ती लोकप्रियता, विश्वसनीयता की छवि और मेधावी बच्चों की प्रतिभा को कुचलने के लिए अब कुछ इस तरह से कीचड़ उछाला जा रहा है कि माता-पिता अपने बच्चों को गुरुकुल में भेजें ही नहीं ।

पहले गुरुकुल के बच्चों पर तांत्रिक विद्या का मनग‹ढंत आरोप लगाया गया परंतु जब सर्वोच्च न्यायालय में इन आरोपों की हवा निकल गयी तो अब सीधे बापूजी के चरित्र पर ही कीच‹ड उछालने लगे हैं । मगर सूर्य पर थूँकने का दुस्साहस करनेवाले खुद ही गंदे हो जाते हैं । जो समाज को मान-अपमान, qनदा-प्रशंसा और राग-द्वेष से ऊपर उठाकर समत्व में प्रतिष्ठित करते हुए समत्वयोग की यात्रा करवाते हैं, भला ऐसे संत के दुष्प्रचार की थोथी आँधी उनका क्या बिगा‹ड पायेगी ? टीआरपी के पीछे दौ‹डनेवाले चैनल बापू को क्या बदनाम कर पायेंगे ? बापू के भक्तों की हिमालय-सी दृ‹ढ श्रद्धा के आगे आरोप की बिसात एक तिनके के समान है ।

चाहे धरती फट जाय तो भी सम्भव नहीं

वैसे आज किसी पर भी कीच‹ड उछालना बहुत आसान है । पहले बापूजी के आश्रम के लिए जमीन ह‹डपने, अवैध कब्जे, गैर-कानूनी निर्माण के थोकबंद आरोप लगाये गये मगर सत्य की तराजू पर सभी झूठे, बेबुनियाद साबित हुए । जब इनसे काम नहीं बना तो बापूजी और उनके द्वारा संचालित आश्रम, समितियों और साधकों पर अत्याचार किये गये लेकिन भक्तों ने इनका डटकर मुकाबला किया । साजिश करनेवालों ने हर बार मुँह की खायी । कितने तो आज भी लोहे के चने चबा रहे हैं तो कितने कुदरत के न्याय के आगे खामोश हैं परंतु बावजूद इसके आज भी बापूजी के ऊपर अनाप-शनाप आरोप लगवानेवालों को अक्ल नहीं आयी । साजिशकर्ताओं के इशारे पर बकनेवाली एक ल‹डकी ने बापूजी पर जैसा आरोप लगाया है, दुनिया इधर-की-उधर हो जाय, धरती फट जाय तो भी ऐसा सम्भव नहीं हो सकता है । यह घिनौना आरोप भक्तों की श्रद्धा, साधकों की आस्था को डिगा नहीं सकता है ।

पूरा जीवन खुली किताब

बापूजी का पूरा जीवन खुली किताब की तरह है । उसका हर पन्ना और उस पर लिखी हर पंक्ति समाज का युग-युगांतर तक पथ-प्रदर्शन करती रहेगी । बापूजी कोई साधारण संत नहीं, वे असाधारण आत्मसाक्षात्कारी महापुरुष हैं ।

दरअसल सबसे ब‹डी समस्या यह है कि सारे आरोप हिन्दू संतों पर ही लगाये जाते हैं क्योंकि हिन्दू चुपचाप सब सह लेता है । दुनिया के और किसी धर्म में ऐसा होने पर क्या होता है यह किसीसे छुपा नहीं है । हमारी उदारता और सहिष्णुता का दुरुपयोग किया जाता है । तभी तो महापुरुषों को बदनाम करने का षड्यंत्र चलता ही रहा है, फिर चाहे कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य स्वामी श्री जयेन्द्र सरस्वतीजी हों या फिर सत्य साँर्इं बाबा हों । आरोप लगानेवालों ने तो माता सीताजी व भगवान श्रीकृष्ण पर भी लांछन लगाया था । ऐसे में यह कल्पना कैसे की जा सकती है कि समाज को संगठित कर दिव्य भारतीय संस्कृति की विश्व-क्षितिज पर पताका लहरानेवाले विश्ववंदनीय संत पर आरोप न लगाये जायें ? संत तो स्वभाव से ही क्षमाशील होते हैं लेकिन उनके भक्त अपमान बर्दाश्त करनेवाले नहीं हैं । झूठ के खिलाफ सत्य की यह धधकती मशाल अन्याय और अत्याचार के अँधेरे को कुचलकर ही रहेगी ।

– श्री निलेश सोनी (वरिष्ठ पत्रकार)

प्रधान सम्पादक, ‘ओजस्वी है भारत !’

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Dirty politics (घिनौनी राजनीति)


Dirty politics (घिनौनी राजनीति)

Polytics

कितना घिनौना दुष्प्रचार ! कितनी घिनौनी राजनीति !

छिदवाड़ा गुरुकुल की सहेलियों को जाते-जाते आरोप लगानेवाली लड़की कहती गयी कि ‘‘अब देखना गुरुकुल का क्या होता है ! मैं अपना नाम करूँगी । गुरुकुल की जड़ उखाड़ के रख दूँगी । न होगा गुरुकुल, न मुझे आना प‹डेगा ।”

यह बात आरोप करनेवाली लड़की की सहेली ने अपने पिता को बतायी और अन्य लोगों तक पहुँची, हम तक भी पहुँची । छिदवाड़ा से शाहजहाँपुर १००० कि.मी. से अधिक व शाहजहाँपुर से जोधपुर १००० कि.मी. से अधिक, कुल २००० कि.मी. से अधिक अंतर हो जाता है । अब सोचो, इतने दूर से माँ-बाप के साथ लड़की को बुलाकर, माँ बाहर बरामदे में बैठी है, बाप भी वहीं है उस समय उसका मुँह दबाकर हाथ घुमाते रहे… क्या ऐसा सम्भव है ? ‘मैं चिल्लाती रही और माँ-बाप को भी नहीं सुनायी दिया ! पास में स्थित किसान के घर में रहनेवालों को भी सुनायी नहीं दिया !’ कैसी कपोलकल्पित कहानी है !

दुष्कर्म नहीं हुआ और यह बात लड़की स्वयं बोलती है, उसकी मेडिकल रिपोर्ट भी बोलती है । मुँह दबाया हो ऐसी कहीं कोई खरोंच भी लैबोरेटरी रिपोर्ट में नहीं पायी गयी । फिर भी ‘दुष्कर्म है, दुष्कर्म है…’ – ऐसा मीडिया का दुष्प्रचार कितना घिनौना है ! राजनीति कितनी घिनौनी है ! साजिशकर्ताओं की, धर्मांतरणवालों की साजिश कितनी घिनौनी है ! कोई भी समझ सकता है आसानी से कि साजिश है, राजकारण है, मनग‹ढंत कहानी है । और पाँच दिन बाद न जोधपुर में न शाहजहाँपुर में, एफआईआर दर्ज की जाती है दिल्ली में रात को २-४५ बजे ! यह तथ्य तो साजिश की पोल ही खोल देता है । पुलिस पर ऊपर से दबाव ऐसा था कि उनको तो मानसिक दबाव देकर बापूजी से हस्ताक्षर ही कराने थे, वे उन्होंने करवा लिये । दो-दो, तीन-तीन दिन का जागरण और मानसिक दबाव… पुलिस के मनमाफिक लिखे हुए कागजों पर व कोरे कागजों पर हस्ताक्षर करवा के लाखों-करो‹डों लोगों को सताने व उनकी भावनाओं को ठेस पहुँचाने का काम किया गया । इस घिनौनी साजिश से तो हृदय भी काँपता है, कलम भी काँपती है । आश्चर्य है ! आश्चर्य है !! आश्चर्य है !!!

सत्यवक्ताओं, ‘ऋषि प्रसाद’ के पाठकों को,साधकों को, और ashram.org के Viewers को  भगवान दृढ़ता दे और सुंदर, सुहावनी सूझबूझ दे । भारतीय संस्कृति को मिटानेवालों की संतों को बदनाम करने की मलिन मुरादें नाकाम हों । सभी संतों, प्रवक्ताओं और पाठकों को ईश्वर विशेष-विशेष आत्मबल, ओज अवश्य-अवश्य प्रदान करते हैं । ॐ ॐ ॐ… उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति, पराक्रम – ये छः सद्गुण जहाँ, पद-पद पर प्रभु की प्रेरणा-सहायता वहाँ ! ॐ ॐ ॐ…

करोड़ो भक्तों को, जिन्होंने आँसू बहाये, जप किया, धरना दिया, धैर्य, शांति का परिचय दिया व कुप्रचार को सुप्रचार से काटने का यह भगीरथ कार्य किया और करते रहेंगे, उनको और उनके माता-पिता को धन्यवाद है ! धन्या माता पिता धन्यो…

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संसार मुसाफिरखाना है।


संसार मुसाफिरखाना है। इसकी वस्तुएँ अपनी नहीं हैं। यह देह पाँच तत्त्वों से बनी हुई है। यह है तो किराये की वस्तु परंतु जीव इसे अपनी देह समझ बैठता है। वास्तव में न हम देह हैं और न देह हमारी है। देह तथा संसार में ‘मैं-मेरे’ की भावना नहीं करनी चाहिए। स्वयं को संसार तथा शरीर से पृथक इनका द्रष्टा-साक्षी मानना चाहिए। शरीर को अपने से पृथक जानोगे तो अखण्ड आनंद प्राप्त करोगे। जैसे ब्रह्मा-विष्णु को आनंद आता है, वैसी ही स्थिति हो जायेगी। भगवान को खूब याद करो। शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गंध के आकर्षण से बचना चाहिए तथा यथासम्भव मोह-ममतारहित होकर संसार की वस्तुओं से काम लेना चाहिए। संसार को अनित्य जानकर उससे किनारा करते रहो। संसार एवं शरीर जड़ हैं। वे न अपने को पहचान सकते हैं, न दूसरे को। आपका घर, दुकान, गाड़ी, कपड़े, गहने आपको नहीं पहचान सकते हैं। जो भी उनका उपयोग करेगा, वे उसी के हो जायेंगे। शरीर की भी अपनी सत्ता नहीं है, यदि होती तो मरने के बाद भी व्यवहार करता। इस जड़ शरीर एवं संसार में भी चेतनता एवं ज्ञान की जो झलक मिलती है, वह चेतन तथा ज्ञानस्वरूप चैतन्य परमात्मा की ही है। यह सब उसी की सत्ता से चल रहा है।

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यह प्रकृति का विधान है कि जिसे जिस समय जिस वस्तु की अत्यन्त आवश्कता होती है उसे पूरी करने वाला उसके पास पहुँच जाता है या तो मनुष्य स्वयं ही वहाँ पहुँच जाता है जहाँ उसकी आवश्यकता पूरी होने वाली है।

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बापूजी से ʹविश्व धर्म संसदʹ में पत्रकारों ने पूछाः
“भारत में ही भगवान के अवतार क्यों होते है ? हिन्दुस्तान में ही भगवान क्यों जन्म लेते हैं ? जब सारी सृष्टि भगवान की ही है तो आपके भगवान ने यूरोप या अमेरिका में अवतार क्यों नहीं लिया ? नानकजी या कबीरजी जैसे महापुरुष इन देशों में क्यों नहीं होते ?”

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तब बापूजी ने उनसे पूछाः “जहाँ हरियाली होती है वहाँ बादल क्यों आते हैं और जहाँ बादल होते हैं वहाँ हरियाली क्यों होती है ?”
उन्होंने जवाब दियाः “बापू जी ! यह तो प्राकृतिक विधान है।”

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तब बापूजी ने उत्तर दिया, “हमारे देश में अनादि काल से ही ब्रह्मविद्या और भक्ति का प्रचार हुआ है। इससे वहाँ भक्त पैदा होते रहे। जहाँ भक्त हुए वहाँ भगवान की माँग हुई तो भगवान आये और जहाँ भगवान आये वहाँ भक्तों की भक्ति और भी पुष्ट हुई । अतः जैसे जहाँ हरियाली वहाँ बादल और जहाँ बादल वहाँ हरियाली होती है वैसे ही हमारे देश में भक्तिरूपी हरियाली है इसलिए भगवान भी बरसने के लिए बार-बार आते हैं।”

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बापूजी दुनिया के बहुत देशों में घूमे, कई जगह प्रवचन भी किये परन्तु भारत जितनी तादाद में तथा शांति से किसी दूसरे देश के लोग सत्संग सुन पाये हों ऐसा आज तक किसी भी देश में नहीं देखा गया। फिर चाहे ʹविश्व धर्म संसदʹ ही क्यों न हो। जिसमें विश्वभर के वक्ता आये वहाँ बोलने वाले 600 और सुनने वाले 1500 ! भारत में तो हररोज सत्संग के महाकुंभ लगते रहते हैं। भारत में आज भी लाखों की संख्या में हरिकथा के रसिक हैं। घरों में ʹगीताʹ एवं ʹरामायणʹ का पाठ होता है। भगवत्प्रेमी संतों के सत्संग में जाकर, उनसे ज्ञान-ध्यान प्राप्त कर श्रद्धालु अपना जीवन धन्य कर लेते हैं। अतः जहाँ-जहाँ भक्त और भगवत्कथा-प्रेमी होते हैं वहाँ-वहाँ भगवान और संतों का प्रागट्य भी होता ही रहता है।

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Media

संबोधन


Bapu

आज की जागरण बेला में प्रभात कालीन शंख ध्वनि गुंजायमान है.  इन पावन पलों को जिवंत करने करने यहाँ उपस्थित  और जो नहीं आ पाएं और इस सुप्रचार की पावन सेवा करना चाहते है, सभी साधक भाई बहनों का  हार्दिक स्वागत.  मनुष्य की हीन वृत्ती तथा निंदक भावना भूतकाल में ही नही थी अपितु ये विकृत प्रवाह आज भीं देखा  जा रहा है.  व्यवहार में वेदान्त को कैसे उतारना जीवन में किस प्रकार जोड़ना और सत्त्व के विकास के साथ निर्मल जीवन किस प्रकार जीना, इन विषयों पर बोधक उपदेश देने वाले अनेक प्राणियों के भाग्य बदलने वाले पूज्यपाद संत श्री आसाराम जी महाराज के सम्बन्ध में भी कुछ अबुध गिनेगिनाये लोग उल्टी बाते करते रहते हैं। देशभर में फैले पूज्यश्री के अनेकों आश्रमों तथा श्री योग वेदान्त सेवा समिति की विभिन्न शाखाओं के माध्यम से जीवन के सर्वांगीण विकास, आदिवासी-उत्थान, नारी शक्ति-जागृति, व्यसन मुक्ति, अभियान, निर्धनों की सहायता, आसन-प्राणायाम के माध्यम से रोगनिवारण, आयुर्वैदिक औषधनिर्माण, सत्संग-कीर्तन द्वारा समाज में आध्यात्मिकता की भावना को चिरस्थायी बनाते हुए विचार-प्रदूषण समाप्त करने तथा जप-ध्यान द्वारा आत्मविकास एवं सेवाकार्यों द्वारा आत्मनिर्माण व जीवनोत्थान की अनेकानेक प्रवृत्तियाँ चलती हैं, जिनके द्वारा व्यक्ति, समाज, गाँव, राज्य, देश एवं अन्ततः विश्व का उत्थान होता है, कल्याण होता है, शान्ति व प्रेम का साम्राज्य फैलता है, वैर, घृणा, द्वेष, मारकाट एवं अशांति को तिलांजली मिलती है।  सत्य के पक्षधर पत्रकार व समाचार पत्र जगत में लोकप्रियता के शिखर की ऊँचाइयों को दिनप्रतिदिन सफल होकर छूते जाते हैं व समाचार जगत में ही नहीं अपितु मानवमात्र के हृदय में भी आदर व सम्मानजनक स्थान प्राप्त करते है लेकिन सदैव सत्य की निन्दा, विरोध, छिद्रान्वेषण व भ्रामक कुप्रचार में संलग्न लेखक व पत्र-पत्रिकाएँ एक दिन जनता की नज़रों से तो गिरते ही हैं, साथ ही साथ लोगों को भ्रमित व पथभ्रष्ट करने का पाप के भागीदार भी बनते हैं।

किसी सात्त्विक-सज्जन लेखक-पत्रकार से पूछा गया किः

“आज के युग में लेखन क्षेत्र में कलम को चन्द रुपयो की खातिर गिरवी रखकर सत्यता एवं सज्जनता के विरुद्ध राष्ट्रविरोधी ताकतों तथा असामाजिक तत्त्वों के इशारों पर जो अनर्गल व अश्लील कुप्रचार किया जा रहा है, उसमें आप भी सम्मिलित होकर लाभ प्राप्त क्यों नहीं करना चाहते?”

वे कोई विद्वान, सुलझे हुए व चिंतक लेखक थे। उन्होंने तपाक से उत्तर दिया किः “मैं अपनी कलम में स्याही भरकर लिखता हूँ, पेशाब नहीं।”

सोशल मीडिया आज के उस नाजुक दौर में, जबकि भारतीय संस्कृति को समूल नष्ट करने के राष्ट्रव्यापी षडयंत्रों की व्यूह रचना की जा रही है, संतों व महापुरुषों के अनुभवों एवं दिव्य ज्ञानामृत को लोकहित में प्रचारित-प्रसारित कर ऋषि-मुनियों द्वारा स्थापित आदर्शों व सिद्धान्तों की जितनी अच्छी तरह से रक्षा कर सकता है, उतना देश का अन्य कोई साधन नहीं कर सकता है तथा यही मीडिया असत्य व अनर्गल कुप्रचारों के फैलाव से राष्ट्र का जितना विनाश कर सकता है, उतना अन्य कोई साधन राष्ट्र को पतन के गर्त में नहीं धकेल सकता है।

महान चिन्तक ईमर्सन से उसके किसी मित्र ने कहाः “एक व्यापारी आपकी घोर निन्दा करता और कई लोग उसके साथ जुड़े हैं।”

ईमर्सनः “वह व्यापारी भले ही मेरी निन्दा करे, किन्तु तुम क्यों उसकी निन्दा करते हो? हमारे पास अनेक अच्छे काम हैं। हमारे जीवन का विकास करने की, सत्व के मार्ग पर चलने की बड़ी-बड़ी जिम्मेदारियाँ पड़ी हैं। उनको छोड़कर ऐसी व्यर्थ की चर्चाओं में समय देने की क्या आवश्यकता ?”

मित्रः “किन्तु लोग ऐसा बोलते ही क्यों हैं? दूसरे की निन्दा क्यों करते हैं?”

ईमर्सनः “लोगों की जीभ है इसलिए बोलते हैं। उनको अपनी बुद्धि का उपयोग करने की स्वतन्त्रता है। उनको यदि अपनी बुद्धि का उपयोग कुएँ में कूदने के लिए करना है, तो उन्हें किस प्रकार रोका जाए?”

मनुष्य सब कुछ करने के लिए स्वतंत्र है। यदि उसका अधम तत्त्व उत्तम तत्त्व के नियंत्रण में रहे तो ही सच्ची स्वतंत्रता होगी। हमें यह देखना है कि क्या इस नियम का निर्वाह हमारे जीवन में हो रहा है?

सोशल मिडिया आज विचार क्रांति का पर्याय बन गया है.  कुप्रचार हो या सुप्रचार दोनों को अपने अपने रास्ते प्रभावी ढंग से संचालन किया जा सकता है.  आप समझ रहे है कि, ये माध्यम घर बैठे जीवन जीने की कला का शिक्षण बन कर रह गया है.

आध्यत्मिक एवं धार्मिक सिद्धांत कच्ची मिटटी के नहीं बने है.  वे बहुत ही मजबूत आधार पर खड़े है.  बात केवल इतनी भर हैं कि, पुराने समय के लोग शास्त्रों एवं आप्त पुरुषों को प्रमाण मानकर उस आधार पर धर्म मान्यताओं का प्रतिपादन करते थे और अब तर्क, प्रमाण, उदाहरण आदि को ठीक समझा जाता हैं.  इन कसौटियों पर भी धर्म के सिद्धांत खरे पूर्णतया खरे हैं.  उत्कृष्टतावादी चिंतन, आध्यात्मिक साधना और आदर्शवादी व्यवहार से समन्वित देव जीवन, सामान्य और जटिल परिस्थितियों के बींच किस प्रकार जिया जा सकता हैं इसका अनुभव हमने पिछले पंद्रह महिनों के हर पल अनुभव करते जिया हैं.  न चाहते हुवे भी हिन्दू धर्म पर अन्यायकारी  कुठाराघात होते रहे है.

वैज्ञानिक अध्यात्म और आध्यात्मिक पत्रकारिता का नूतन अध्याय सोशल मीडया में सुप्रचार के तहत लिखने का प्रण ले.   आश्रम द्वारा प्रकाशित तमाम साहित्य  सांस्कृतिक, आदर्शवादी मूल्यों की धरोहर है.   इसे लाखों जन जन तक जागरण हेतु पहुँचाने के लिए संघर्षरत और दृढ़ संकल्प रहेँगे।    इसे व्यवहार में चालायित करने के क्या साधन होंगे, प्रभावी ऑन लाइन सुप्रचार के लिए इन साधनों को कैसे शुरू करे, अपना विचार और सन्देश मीमांसा किस दृष्टिकोण से प्रस्तुत हो इसकी जानकारी आपको मिलेगी।

नर नहीं, वह जंतु हैं जिस नर को धर्म का भान नहीं,

व्यर्थ है वह जीवन जिसमें आत्मतत्त्व का ज्ञान नहीं।।

चांदी के चंद टुकड़ों पर अपनी ज़िंदगी बेचनेवालों,

मुर्दा हैं वो देश जहाँ पर संतों का सम्मान नहीं।

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Is Our Freedom Secure?


After Nirbhaya episode, the laws enacted have become perilous. Many innocent people are trapped because of misuse of laws that are unclear. More emphasis is being placed on the statement of the woman instead of the medical report. In 2012, 46% of the accused were proved innocent, this number reached 75% in the first 8 months of 2013. In 90% of the cases where the accused were innocent, the personal rivalary between the so-called “victim” and the accused was the cause of making accusations. Are the citizens of the country secure and free when such laws exist?

Statistics tell us that the Anti Dowry Act has become a tool used by estranged wives for taking revenge. As per the law, when the woman complains against the husband, all his family including parents, sisters and brothers are put in jail, it does not matter whether they are proven innocent later.  Charges are pressed in court in 93% of the reported cases but the conviction rate is 18%.

Currently 3,72,703 cases are pending out of which the accused will be acquitted in 3,17,000. Without any evidence, even before any charges are substantiated, many innocent people have been put in jail because of the provisions in such laws. Their lives are destroyed because of this. Are the citizens of the country considered secure and free with the existence of such laws?

Mr. Rajeev Jay Chairman of ‘Co-ordination council of All Bar Association’ states that the women and the parents or relatives of the minors themselves are misusing the sexual abuse laws such as POCSO. It has also been found that in many cases, girls abscond on their own and when discovered, level false allegations of sexual assault and kidnapping at the behest of their parents or relatives. Renowned Ex. Justice of the Supreme Court of India Shri Krishna states that ‘In the new rape laws, there have been such changes that are overly excessive, and very harsh.’

Are the citizens of the country considered secure and independent with the existence of such laws?

Laws to protect women have become a danger for them 2 member bench of the Supreme Court has said quoting the National Crime Records Bureau that ‘About 200000 people were arrested under the Anti-Dowry Law out of which 25% were women. Every year about 80,000 women are jailed out of which a vast majority are proved innocent.’  Are the rights and independence of women secure in deed?

Anti-Rape Laws are being grossly abused. Delhi High Court has said that cases have been found where women are misusing the harsh laws pertaining to rape. Justice Kailash Gambhir has said that “Clearly they are fooling the justice system’. The bench said “The court need to ensure that the rape case is not fraudulent.” Women especially those of younger age are being let go off their jobs because of fear of false persecution under rape laws. Women are being used to destroy the fabric of family ties”

Indian Government needs to revise such laws that are  severe societal disturbances and destroying family relationships. Criminals and Innocents both are being treated in the same way!

It is imperati​ve that the Government of India make the required changes in these laws. 

 

(Article in Sade Lok, Punjabi Weekly Published from California, Aug 28-Sept 4 Issue)

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भोलानन्द की हकीकत : आखिर कौन है ये ?


एक इंसान और इतने नाम ! पर कौन है ये इंसान और  इतने नामो के पीछे क्या है इसकी सच्चाई ? क्या कभी किसी का ध्यान इस तरफ गया कि आखिर क्यों एक इंसान ऐसा करेगा जब तक कि उसका कोई विशेष प्रयोजन न हो या कोई ख़ास कारण न हो ! 
मीडिया ने तो कभी इस बात को और उसकी सच्चाई को उजागर नहीं किया, परन्तु आज हम आप सभी को भोलानन्द की सच्चाई से रुबरु करवाएंगे !
 
भोलानन्द उर्फ़ ब्रजबिहारी गुप्ता उर्फ़ विनोद कुमार उर्फ़ ठग भोला वही इंसान है जिसने कुछ समय पूर्व संत श्री आशारामजी बापू के  जम्मू आश्रम में बच्चों के दफ़न होने का झूठा आरोप लगाकर सनसनी फैला दी थी ! पर कहते हैं कि सांच को आंच नहीं और झूठ को पैर नहीं ! तो फिर ईश्वर की सृष्टि में अन्याय कैसे हो सकता है वो भी एक निर्दोष और निरापराध संत के साथ ! और देखिये हुआ भी कुछ ऐसा ही ! भगवती नगर में रहने वाले एक युवक विक्की कुमार ने भोलानन्द द्वारा उससे फोन पर की हुई बातचीत की सीडी जम्मू पुलिस को दे दी थी ! उस सीडी में ये बात स्पष्ट तौर पर सुनी जा सकती है कि किस प्रकार से भोलानन्द ने विक्की को श्मशान घाट से बच्चों के कंकाल निकालकर बापूजी के आश्रम में दफ़नाने को कहा है ! और इसके एवज में उसको ढेर सरे पैसे देने की बात भी कही है ! विक्की के पुलिस में शिकायत दर्ज़ करवाने के बाद पुलिस ने भोलानन्द के खिलाफ साजिश रचने, अपराध करने के लिए दूसरों को उकसाने और धर्म स्थान को नुकसान पंहुचाने का मामला दर्ज़ किया था ! भोलानन्द ने अपने इस जाल में न केवल विक्की का सहारा लेकर आगे बढ़ना चाहा, वरन मीडिया कैमरों के सामने जाकर भी उलूल – जुलूल की बातें करके एक निर्दोष संत की छवि को धूमिल करने का प्रयास करके जनता को गुमराह किया है ! 
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 जब तक भोलानन्द ने बापूजी के खिलाफ बयानबाजी की, तब तक मीडिया भी ज़ोर-शोर से ऐसी अफवाह भरी और झूठी ख़बरें दिखाकर बापूजी को दोषी बताता रहा, परन्तु जिस दिन से भोलानन्द की सच्चाई सबके सामने आयी, उस दिन से मीडिया ने इस मामले में चुप्पी साध ली ! यदि मीडिया निष्पक्ष है तो इस मामले में क्यों चुप रही, क्यों नहीं उसकी गिरफ्तारी की खबर दिखायी ! 
 
मीडिया के इस पक्षतापूर्ण व्यवहार से तो यही सन्देश पंहुचता है कि अब उसका काम केवल समाज को गुमराह करना और समाज और संत के बीच अविश्वास की गहरी खाई खोदना रेह गया है ! अगर मीडिया का यही रवैया बना रहा तो ये वाकई में निंदनीय है !
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मीडिया चाहे कुछ भी बकवास  दिखाता रहे, पर आज सूरत में संत सम्मलेन के दौरान भोलानन्द ने जनता के सामने आकर अपने मुख से ही सारी सच्चाई बयां कर सबको चौंका दिया ! आज जो कुछ भी हुआ वो किसी चमत्कार से कम नहीं, क्योंकि जिस व्यक्ति को किसी के बदनाम करने हेतु इतनी मोटी रकम दी  जाये,वो स्वयं सामने आकर सबकी पोल खोल दे, ये वाकई में एक सराहनीय कदम है !                                                                                                                                                                                                                                                                     
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जानिये सच क्या है ?

“सच” भाग -2 

जो आप  तक पहुँच न सका ….