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साजिश को सच का रूप देने की मनोवैज्ञानिक रणनीति


shilpa

संत श्री आशारामजी बापू के खिलाफ जो षड्यंत्र चल रहा है, उसका मनोवैज्ञानिक तरीके से किस तरह से सुनियोजन किया गया है, यह मैं एक मनोविज्ञानी होने के नाते आपको बताना चाहती हूँ । आठ मुख्य पहलू समझेंगे कि किस तरह इस साजिश को सच का मुखौटा पहनाया जा रहा है ।

(१) जनता के विशिष्ट वर्गों पर निशाना : समाज के शिक्षित, जागरूक, उच्च एवं मुख्यतः युवा वर्ग को निशाना बनाया गया क्योंकि इनको विश्वास दिलाने पर ये तुरंत प्रतिक्रिया करते हैं ।

(२) षड्यंत्र का मुद्दा : देश की ज्वलंत समस्या ‘महिलाओं पर अत्याचार’ को मुख्य मुद्दा बनाया है । इस भावनात्मक विषय पर हर कोई तुरंत प्रतिक्रिया दे के विरोध दर्शाता है ।

(३) रणनीति : चीज को यथार्थपूर्ण, विश्वसनीय, प्रभावशाली दिखाने जैसी मार्केटिंग रणनीति का उपयोग करके दर्शकों को पूरी तरह से प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है ।

दर्शक मनोविज्ञान का भी दुरुपयोग किया जा रहा है । कोई विज्ञापन हमें पहली बार पसंद नहीं आता है लेकिन जब हम बार-बार उसे देखते हैं तो हमें पता भी नहीं चलता है कि कब हम उस विज्ञापन को गुनगुनाने लग गये । बिल्कुल ऐसे ही बापूजी के खिलाफ इस बोगस मामले को बार-बार दिखाने से दर्शकों को असत्य भी सत्य जैसा लगने लगता है ।

(४) प्रस्तुतिकरण का तरीका : पेड मीडिया चैनलों के एंकर आपके ऊपर हावी होकर बात करना चाहते हैं । वे सिर्फ खबर को बताना नहीं चाहते बल्कि सेकंडभर की फालतू बात को भी ‘ब्रेकिंग न्यूज’ बताकर दिनभर दोहराते हैं और आपको हिप्नोटाइज करने की कोशिश करते हैं ।

(५) भाषा : खबर को बहुत चटपटे शब्दों के द्वारा असामान्य तरीके से बताते हैं । ‘बात गम्भीर है, झड़प, मामूली’ आदि शब्दों की जगह ‘संगीन, वारदात, गिरोह, बड़ा खुलासा, स्टिंग ऑपरेशन’ ऐसे शब्दों के सहारे मामूली मुद्दे को भी भयानक रूप दे देते हैं ।

(६) आधारहीन कहानियाँ बनाना, सुटिंग ऑपरेशन्स और संबंधित बिन्दु : ‘आश्रम में अफीम की खेती, स्टिंग ऑपरेशन’ आदि आधारहीन कहानियाँ बनाकर मामले को रुचिकर बना के उलझाने की कोशिश करते हैं ।

(७) मुख्य हथियार : बहुत सारे विडियो जो दिखाये जाते हैं वे तोड़-मरोड़ के बनाये जाते हैं । ऐसे ऑडियो टेप भी प्रसारित किये जाते हैं । यह टेक्नोलॉजी का दुरुपयोग है ।

इसके अलावा कमजोर, नकारात्मक मानसिकतावालों को डरा के या प्रलोभन देकर उनसे बुलवाते हैं । आश्रम से निकाले गये २-५ बगावतखोर लोगों को मोहरा बनाते हैं ताकि झूठी विश्वसनीयता ब‹ढायी जा सके ।

(८) मनोवैज्ञानिक वातावरण तैयार करना : बापूजी की जमानत की सुनवाई से एक दिन पहले धमकियों की खबरें उछाली जाती हैं, कभी पुलिस को, कभी माता-पिता और लड़की को तो कभी न्यायाधीश को । ये खबरें कभी भी कुछ सत्य साबित नहीं हुर्इं ।

अब आप खुद से प्रश्न पूछिये और खुद ही जवाब ढूँढिये कि क्या यह आरोप सच है या एक सोची-समझी साजिश ?

और एक बात कि केवल पेड मीडिया चैनल ही नहीं बल्कि इसीके समान प्रिंट मीडिया भी खतरनाक तरीके से जनमानस को प्रभावित कर रहा है । इन दोनों से सावधान रहना चाहिए ।

– शिल्पा अग्रवाल,

प्रसिद्ध मनोविज्ञानी

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Dirty politics (घिनौनी राजनीति)


Dirty politics (घिनौनी राजनीति)

Polytics

कितना घिनौना दुष्प्रचार ! कितनी घिनौनी राजनीति !

छिदवाड़ा गुरुकुल की सहेलियों को जाते-जाते आरोप लगानेवाली लड़की कहती गयी कि ‘‘अब देखना गुरुकुल का क्या होता है ! मैं अपना नाम करूँगी । गुरुकुल की जड़ उखाड़ के रख दूँगी । न होगा गुरुकुल, न मुझे आना प‹डेगा ।”

यह बात आरोप करनेवाली लड़की की सहेली ने अपने पिता को बतायी और अन्य लोगों तक पहुँची, हम तक भी पहुँची । छिदवाड़ा से शाहजहाँपुर १००० कि.मी. से अधिक व शाहजहाँपुर से जोधपुर १००० कि.मी. से अधिक, कुल २००० कि.मी. से अधिक अंतर हो जाता है । अब सोचो, इतने दूर से माँ-बाप के साथ लड़की को बुलाकर, माँ बाहर बरामदे में बैठी है, बाप भी वहीं है उस समय उसका मुँह दबाकर हाथ घुमाते रहे… क्या ऐसा सम्भव है ? ‘मैं चिल्लाती रही और माँ-बाप को भी नहीं सुनायी दिया ! पास में स्थित किसान के घर में रहनेवालों को भी सुनायी नहीं दिया !’ कैसी कपोलकल्पित कहानी है !

दुष्कर्म नहीं हुआ और यह बात लड़की स्वयं बोलती है, उसकी मेडिकल रिपोर्ट भी बोलती है । मुँह दबाया हो ऐसी कहीं कोई खरोंच भी लैबोरेटरी रिपोर्ट में नहीं पायी गयी । फिर भी ‘दुष्कर्म है, दुष्कर्म है…’ – ऐसा मीडिया का दुष्प्रचार कितना घिनौना है ! राजनीति कितनी घिनौनी है ! साजिशकर्ताओं की, धर्मांतरणवालों की साजिश कितनी घिनौनी है ! कोई भी समझ सकता है आसानी से कि साजिश है, राजकारण है, मनग‹ढंत कहानी है । और पाँच दिन बाद न जोधपुर में न शाहजहाँपुर में, एफआईआर दर्ज की जाती है दिल्ली में रात को २-४५ बजे ! यह तथ्य तो साजिश की पोल ही खोल देता है । पुलिस पर ऊपर से दबाव ऐसा था कि उनको तो मानसिक दबाव देकर बापूजी से हस्ताक्षर ही कराने थे, वे उन्होंने करवा लिये । दो-दो, तीन-तीन दिन का जागरण और मानसिक दबाव… पुलिस के मनमाफिक लिखे हुए कागजों पर व कोरे कागजों पर हस्ताक्षर करवा के लाखों-करो‹डों लोगों को सताने व उनकी भावनाओं को ठेस पहुँचाने का काम किया गया । इस घिनौनी साजिश से तो हृदय भी काँपता है, कलम भी काँपती है । आश्चर्य है ! आश्चर्य है !! आश्चर्य है !!!

सत्यवक्ताओं, ‘ऋषि प्रसाद’ के पाठकों को,साधकों को, और ashram.org के Viewers को  भगवान दृढ़ता दे और सुंदर, सुहावनी सूझबूझ दे । भारतीय संस्कृति को मिटानेवालों की संतों को बदनाम करने की मलिन मुरादें नाकाम हों । सभी संतों, प्रवक्ताओं और पाठकों को ईश्वर विशेष-विशेष आत्मबल, ओज अवश्य-अवश्य प्रदान करते हैं । ॐ ॐ ॐ… उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति, पराक्रम – ये छः सद्गुण जहाँ, पद-पद पर प्रभु की प्रेरणा-सहायता वहाँ ! ॐ ॐ ॐ…

करोड़ो भक्तों को, जिन्होंने आँसू बहाये, जप किया, धरना दिया, धैर्य, शांति का परिचय दिया व कुप्रचार को सुप्रचार से काटने का यह भगीरथ कार्य किया और करते रहेंगे, उनको और उनके माता-पिता को धन्यवाद है ! धन्या माता पिता धन्यो…

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#Bail4Bapuji, #Justice4Bapuji, #WhySoBiased, Controvercy, Dharm Raksha Manch, Dharna, Exclusive News, Indian Culture, Innocent Saint, Media, People's Opinion, Politics, Saint, Saint and People

Is Our Freedom Secure?


After Nirbhaya episode, the laws enacted have become perilous. Many innocent people are trapped because of misuse of laws that are unclear. More emphasis is being placed on the statement of the woman instead of the medical report. In 2012, 46% of the accused were proved innocent, this number reached 75% in the first 8 months of 2013. In 90% of the cases where the accused were innocent, the personal rivalary between the so-called “victim” and the accused was the cause of making accusations. Are the citizens of the country secure and free when such laws exist?

Statistics tell us that the Anti Dowry Act has become a tool used by estranged wives for taking revenge. As per the law, when the woman complains against the husband, all his family including parents, sisters and brothers are put in jail, it does not matter whether they are proven innocent later.  Charges are pressed in court in 93% of the reported cases but the conviction rate is 18%.

Currently 3,72,703 cases are pending out of which the accused will be acquitted in 3,17,000. Without any evidence, even before any charges are substantiated, many innocent people have been put in jail because of the provisions in such laws. Their lives are destroyed because of this. Are the citizens of the country considered secure and free with the existence of such laws?

Mr. Rajeev Jay Chairman of ‘Co-ordination council of All Bar Association’ states that the women and the parents or relatives of the minors themselves are misusing the sexual abuse laws such as POCSO. It has also been found that in many cases, girls abscond on their own and when discovered, level false allegations of sexual assault and kidnapping at the behest of their parents or relatives. Renowned Ex. Justice of the Supreme Court of India Shri Krishna states that ‘In the new rape laws, there have been such changes that are overly excessive, and very harsh.’

Are the citizens of the country considered secure and independent with the existence of such laws?

Laws to protect women have become a danger for them 2 member bench of the Supreme Court has said quoting the National Crime Records Bureau that ‘About 200000 people were arrested under the Anti-Dowry Law out of which 25% were women. Every year about 80,000 women are jailed out of which a vast majority are proved innocent.’  Are the rights and independence of women secure in deed?

Anti-Rape Laws are being grossly abused. Delhi High Court has said that cases have been found where women are misusing the harsh laws pertaining to rape. Justice Kailash Gambhir has said that “Clearly they are fooling the justice system’. The bench said “The court need to ensure that the rape case is not fraudulent.” Women especially those of younger age are being let go off their jobs because of fear of false persecution under rape laws. Women are being used to destroy the fabric of family ties”

Indian Government needs to revise such laws that are  severe societal disturbances and destroying family relationships. Criminals and Innocents both are being treated in the same way!

It is imperati​ve that the Government of India make the required changes in these laws. 

 

(Article in Sade Lok, Punjabi Weekly Published from California, Aug 28-Sept 4 Issue)

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Are the decisions of Indian judiciary or administration really trustworthy?

Straight from the heart of a revered saint’s disciple

We feel proud being Indian nationals. We got freedom on Aug 17, 1947 and are indebted to our freedom fighters for what they did and sacrificed for attaining us Indians the “political liberty”. Later, our constitution was formed and we started celebrating Independence Day and Republic Day every year. A number of people are given awards on these occasions for their performances in various fields, be it for the act of bravery, regimes of social service, medicine, art, literature, defense, cinema Science or sports.

Whether these decisions to select a person from the aforesaid streams satiate the need of the nation in its progress or lack something in this regard, is an unanswered question.

Whoever is presented before us for his/her heroic deeds is taken as a hero and vice-versa. Frankly, this is just a “media propaganda” created or influenced by political minds.

Without twisting my words, I come to the point. A girl files a zero FIR in Delhi for some reason and the person on duty files a case of rape. The person against whom that FIR is lodged is not an ordinary one, but a revered saint who teaches and preaches not only by His words but actions too. He acts and applies in His life the lessons of celibacy, abstinence and has no attraction towards worldly pleasures; thus sticking to His own preaching.

 

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Such a pious saint is caught up by Police personnel as ruthlessly as a culprit without him being given a chance to carry his worship material along; that too in the dark night when his devotees are praying & requesting and claiming of Him not being guilty of any such offence. A tale is concocted and a false case is lodged and charges are framed on the basis of false evidence. The case proceedings go on and on…

This is one year old story that I am talking about and the case is instituted against Pujya Sant Shri Asharamji Bapu. The court proceedings are delayed, denying justice every moment; thus indirectly attempting to shake the faith of millions of his disciples with questions in their eyes. A saint who deserves respect, dignity and honor, is deprived of all the basic amenities that even a normal person is supposed to avail; and that too at the age of 74, when He is suffering from a rare chronic disease “Trigeminal Neuralgia” (Refer: http://en.wikipedia.org/wiki/Trigeminal_neuralgia)?

Where are all the journalists who are unable to capture this Hero’s coverage? Where are all the media powerhouses that claim to cover the facts in their news bytes or articles? Where are all judiciary, administration, legislator, executor who assert to maintain the dignity of law and order? Where are the persons who yell for human rights? Can’t they dare to come out of their respective dens?

 

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Instead of honoring a person who has transformed people and reformed their lives; thus showing a “true respect” for our culture, nation and values; these demons have ensnared Him into an absolutely fake  case of sexual assault and without any proof, have blamed Him of  his being pedophile, cultivating opium and selling liquor… One after another allegations have been leveled against him and yet He remains contended, with the very thought in his mind that :

Ilzaam lagaane waalon ne ilzaam lagaaye laakh magar teri saugaat samajh kar sar pe uthaaye jaate hain

That is, He considers all this is to be the Almighty’s wish and in a way, He is true, considering His spiritual, mental and intellectual stature.

But is what we are doing with such an adorable saint justified? Definitely not!

We have ignored the case in its entirety and have been waiting that judiciary will provide justice to his disciples. We expect from that judiciary, that has till date 3 lakh plus cases pending in Jaipur and Jodhpur benches, of which 50 cases are lis-pendens for 1st and 2nd appeals for more than 20-40 years. A civil suit related to property was instituted in the year 1937 before we got independence, which is still lis-pendens. This is the oldest ever undecided case (for 77 years) in Rajasthan, which is handled by the 5th generation of the parties in conflict.

So, what more can be expected of our judiciary in this particular scenario of Bapuji’s case, where, practically there is hardly any scope of improvement?

On the other hand, the lawyers’ strike has worsened the situation in disposal of case. For how long all his disciples and followers are going to wait in this matter?

Why are we still silent on this critical issue?

 

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Where has our spirit of patriotism gone?  Where has our determination and urge for our Gurudev’s acquittal in this fabricated case, disappeared?

Who can deny His endeavors to make India as world spiritual leader?

How can we ignore the innocent disciples’ sentiments, who adore Him and reach the Jodhpur Central Jail on every hearing and every Poonam (full moon day)?

Right from the day He was caught up by the police to till date, His disciples left no stone unturned to prove and support his innocence.

Realistically and practically thinking, can one befool the whole society for a year, if in jail? Definitely Not! His disciples come from all sects & religions and all age groups; and thus have sufficient sense to understand the biased media’s role in his defamation.

It is the impact of His spiritual power that He predicted that India would win Kargil war without much harm. He chanted some mantra and made His disciples do the same to protect our nation during the war. Whether this “spiritual soldier” deserves imprisonment or an award is a question to be answered by judiciary when Independence Day’s celebrations are still reminiscent.

We pray to the God that may judiciary decide this matter judiciously and release the saint soon, without any delay, so as to gain the lost trust of Indian citizens in judiciary’s judgments.

Controvercy

Independence Awards

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साईं राम … साईं भगवान !!


अच्छा होता साईं बाबा में कमियां ढूँढने की जगह , उनकी निंदा कर अपनी विद्वता का परिचय कराने की जगह, उत्पन्न होने वाली छद्म धर्म् निरपेक्षिता को ही उद्दयेश बनाया जाता, बाबा जी की भक्ति के नाम पर होने वाले व्यापारीकरन पर ही ध्यान केन्द्रित किया जाता तो उत्तम होता | लेकिन वो मुस्लिम संत हैं इस कारण ही विद्वान् लोगो का शिकार नही बन रहे , इसके पहले भी संत एकनाथ जी, तुकाराम जी, ज्ञान देव जी,रामकृष्ण परम हंस जी सब का विरोध हुआ | विद्वानों ने शास्त्र खोल कर रख दिए , पूजा ऐसे नही होती, भक्ति ऐसे नही होती, ये आचार ठीक है और ये नही ठीक है | शास्त्रों की एक एक पंक्ति से पूरे जीवन की जांच पड़ताल करने का बीड़ा उठा लिया जाता है | और समस्त कमियां निकल कर जन साधारण को पुरजोर बताया जाता है की अमुक संत दुर्गुणों से भरे हैं , सद्गुण तो छू नही गया |

भगवत प्राप्ति मात्र हिन्दुओ को हो सकती है , आत्मानंद की मस्ती उनको ही आ सकती है , आज तक ऐसा किसी संत का वचन न पढ़ा न सुना, इतना अपार कष्ट है तो गुरु वाणी से बाबा बुल्लेशाह के वचन भी निकाल दो | रसखान, राबिया, बाबा फरीद, बाबा बुल्लेशाह, अहमद फ़क़ीर, सरमद फ़क़ीर कोई कृष्ण भक्त, कोई आत्मरामी …(यह एक अलग विषय है की ज्ञान योग, भक्ति योग, अष्टांग योग कौन किस की सहायता से पहुंचे हैं और क्या कुछ संभावनाएं हैं )

मुस्लिम सम्प्रदाए क्यों उनकी तस्वीर या मूर्ती लगाएगा ? वो मूर्ति उपासक हैं नही | हिन्दू हैं अपने प्रेमास्पद को पूजने के लिए ना जाने क्या क्या करते हैं , रामकृष्ण परमहंस जी की पूजा पद्धति को देख कर विद्ववान , पंडित जन उन्हें पागल करार देते थे |

अब वर्तमान समय में अगर व्यापारीकरण हो रहा है तो जांच सीधे उसकी बनती है, ना की निंदा की | अगर साईं जी की पूजा करने वाले अगर राम जी की मूर्ती, कृष्ण भगवान् की मूर्ती छोटी रखते हैं और उससे दुसरे भक्तो की भावनाओं को कष्ट पहुंचता है तो ये बात प्रबलता के साथ कह कर मदिर संचालकों को समझाई जा सकती है |रामकृष्ण परम हंस जी मछली सेवन करते थे , क्योंकि वो बंगाली थे ……तो क्या उन्हें साकार या निराकार दर्शन नही हुए थे ??? तो क्या इसका मतलब सब मांस खाए?नही वो देश, काल, परम्परा के अनुसार अपना भोजन कर रहे थे, स्वाद लोलुपता के कारण नही | भगवद प्राप्ति में मुख्य बात तड़प है , चाहे जो योग कर लो अगर उद्धेश्य के प्रति छटपटाहट नही है तो काम बनेगा नही |

कांची कामकोटी पीठ के शंकराचार्य जी को फंसाया गया

—– शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती जी मौन

साध्वी प्रज्ञा

—– शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती जी मौन

स्वामी नित्यानंद फर्जी सेक्स सी डी

—– शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती जी मौन

स्वामी रामदेव जी पर लाठी चार्ज

—– शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती जी मौन

स्वामी श्यामानंद को नशीला पदार्थ खिलाया गया

—– शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती जी मौन

स्वामी लक्ष्मणानन्द सरस्वती जी की निर्मम हत्या

—– शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती जी मौन

स्वामी रामसुख दस जी पर अनर्गल आरोप

—– शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती जी मौन

स्वामी केशवानंद जी को झूठे बलात्कार केस में फंसाया गया

—– शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती जी मौन

स्वामी अमृतानन्द के मुह में मांस ठुंसा गया

—– शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती जी मौन

संत निगमानंद को साजिश कर के मारा गया

—– शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती जी मौन

चारो शंकराचार्य जी में वार्षिक कोई एक दो बैठक होती हो जिसमें हिन्दू धर्म के उत्थान के विषय में गहरा मंथन होता हो..ऐसा मुझे ज्ञात नही | शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती जी चाहते तो उत्तम रास्ता निकाल सकते थे वो ज्ञानी जन हैं , सबको बैठकर अच्छे से समझा सकते थे | पर ऐसा हुआ नही | वो हिन्दू एकता जिसके कारण बीजेपी आई , आखिरकार एक दांव से दो भाग में बंटती हुई दिख रही है, आर्य समाजी भाई लोग क्यों मूर्ती की उपासना को सही ठहराएंगे ? वह तो निराकार की उपासना में रहते हैं, फिर साईं जी की मूर्ती हो या कृष्ण जी की वह अपने सिद्धांत से ठीक हैं …… सबके अपने उद्धेश्य, सबकी अपनी चाहत…. कोई इस बात से चिढ़ा बैठा है की मुस्लिम की पूजा हो रही है , कोई इस बात से परेशान है , इतना पैसा आ रहा है ? और सबको अब साईं जी में दुर्गुण ही दुर्गुण दिख रहे हैं |

आज की परिस्थिति को देख कर लगता है —कबीर जी तो व्यर्थ ही कहे गए “जात न पूछो संत की पूछ लीजिये ज्ञान “

कुतर्क देखिये —-वो अल्लाह अल्लाह कहते थे —जिसको वो सबका मालिक एक कहता था , वो ‘एक’ कौन है —-आत्म मस्ती में रहने वाले संत जिस साधना पद्धति से जिस अभ्यास को करते हुए प्राप्त अवस्था में पहुंचते हैं, उसके बाद भले उनके सारे मत बिखर जाएँ फिर भी स्थूल देह को जिसका अभ्यास है वो उसको आसानी से या कह लो स्वाभाववश बोलता रहता है …….चैतन्य महाप्रभु जी के लिए सबकुछ कृष्ण ही थे …कृष्ण कृष्ण ही रटते रहते थे —- कल्पना कीजिये “चैतन्य महाप्रभु या प्रभुपाध्य जी की तस्वीर किसी यूरोपी देश में तोड़ी जाए …की कैसे ये भगवान् को ‘एक’ कहते हैं..ये तो कृष्ण कृष्ण कहते हैं , जीसस तो कहते ही नही ”

आरोप देखिये —-अपने को भगवान् कहता है —- रामकृष्ण परमहंस जी ने विवेकानंद जी के सामने सात बार कहा “की जो राम बन कर आये , कृष्ण बन कर आये वही में हूँ ” | ब्रह्मनिष्ठ संत जब अपनी मस्ती में आते हैं या अपने किसी किसी साधक के सामने अपने को उजागर करना चाहते हैं तो…ऐसे वाणी स्वतः नि:सृत होती है …..पर इसका परिणाम घातक ही हो जाता है क्योंकि शिष्य तो समझता है, प्रेमी भक्त समझता है लेकिन साधारण जन ये रहस्य नही समझ पाते और यही कहते हैं “देखो खुद को भगवान् कहता है ” जीसस को परिणाम भुगतना पड़ा “I am King of the King” और क्रूस में लटका दिए गए |

सरमद फ़क़ीर को भुगतना पड़ा “में शाहन का शाह” और औरंगजेब ने गर्दन उड़वा दी.. भूल जाते हैं रामचरित मानस की पंक्तियाँ—-“सोइ जानहि जेहि देहु जनाई जानत तुमहिं तुमहि हुई जाई” | एक भाई ने चिंता व्यक्त करते हुए लिखा की साईं जी के भक्त राम जन्म भूमि बात पर भाग जाते हैं —-यही है छद्म धर्म निरपेक्षिता— जहाँ न्याय और सत्य बात स्वीकार करने की जगह है वहां स्वीकार नही करते और चले जाते हैं तो जो साईं भक्त नही हैं उनके मन में द्वेष तो भर ही जायेगा ना | लेकिन ऐसे छद्म धर्मनिरपेक्षीयों की मूर्खता का जवाब मुर्खता तो नही होगी ना |

प्रार्थना है सभी भाई बहनों से थोडा धैर्य से काम लें, अपने अहम् से जोड़कर हर बात न देखें | बेवजह निंदा -स्तुति से बचें, देखिये कोई आपस की लड़ाई का लाभ न उठा ले | मीडिया को टीआरपी बढ़ाने का अवसर मिल ही गया है | अच्छा है आपको शास्त्रों का अद्भुत ज्ञान है , आप उपरोक्त लिखे गए शब्दों की धज्जियाँ उड़ा सकते हो | क्योंकि मैंने समस्त शास्त्रों का अभ्यास नही किया है…और दूसरे की निंदा करने के लिए शास्त्रों से पंक्तियाँ ढूँढती फिरू ऐसी रूचि भी अभी तक जाग्रत नही हुई है , मुझे तो आत्म मस्ती में डूबे ब्रह्मनिष्ठ संतो का सत्संग और साहित्य प्रिय है, उसको पढ़ने के प्रयास में रहती हूँ , अपनी क्षुद्र बुद्धि के आधार पर कुछ गलत सही लिख दिया हो … तो  जो गलत लगे सो त्याग दीजियेगा जो ग्राह्य हो सो स्वीकार कर लीजियेगा |

 

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समाज को भ्रमित करने वालों से रहिये सावधान !


समाज को भ्रमित करने वाले लोगों से सावधान रहिये !

महापुरुषों के जीवन में अनेक लोग अनुयायी बनते हैं और कुछ अपने कर्मों की गति से छोड़ भी जाते हैं ! महापुरुष तो कभी किसी का बुरा नहीं चाहते पर ऐसे आने और जाने वाले कई लोग उन्ही महापुरुषों पर अनेक लांछन लगाना शुरू कर देते हैं !

गौतम बुद्ध, महावीर, गुरु नानक, मीराबाई जैसे संतों पर आरोप लगाने वालों को क्या कभी इतिहास में जगह मिली है ?

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किन्ही 2-४ पथभ्रष्ट लोगों की निराधार बातों को प्रसारित करना, उनकी श्रद्धा के साथ खिलवाड़ करना और कुत्सित कर्म करके समाज के लोगों को गुमराह करना, ये समाज के हित में नहीं है !

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ऐसे ही पथभ्रष्ट लोगों में से एक है बडौदा का अमृत प्रजापति जिसने कई झूठे और मनगढ़ंत आरोप लगाये बापूजी और आश्रम पर !

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आइये जानते हैं क्या है वैद्य अमृत प्रजापति की सच्चाई !

 

 

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|| सब की खबर ले, सब को खबर दे || दिलीप लालवानी – संपादक – दैनिक धनुषधारी.