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अक्षय फल देनेवाली अक्षय नवमी – आँवला नवमी


avla navmi

कार्तिक शुक्ल नवमी (२९ अक्टूबर २०१७ ) को ‘अक्षय नवमी’ तथा ‘आँवला नवमी’ कहते है | अक्षय नवमी को जप, दान, तर्पण, स्नानादि का अक्षय फल होता है | इस दिन आँवले के वृक्ष के पूजन का विशेष माहात्म्य है | पूजन में कपूर या घी के दीपक से आँवले के वृक्ष की आरती करनी चाहिए तथा निम्न मंत्र बोलते हुये इस वृक्ष की प्रदक्षिणा करने का भी विधान है :

यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च |
तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणपदे पदे ||

इसके बाद आँवले के वृक्ष के नीचे पवित्र ब्राम्हणों व सच्चे साधक-भक्तों को भोजन कराके फिर स्वयं भी करना चाहिए | घर में आंवलें का वृक्ष न हो तो गमले में आँवले का पौधा लगा के अथवा किसी पवित्र, धार्मिक स्थान, आश्रम आदि में भी वृक्ष के नीचे पूजन कर सकते है | कई संत श्री आशारामजी आश्रमों में आँवले के वृक्ष लगे हुये हैं | इस पुण्यस्थलों में जाकर भी आप भजन-पूजन का मंगलकारी लाभ ले सकते हैं |

Limitless fruits from Akshay Navami

Karthik Shukla Navami (29 Nov 2017) is also renowned as “Akshay Navami” or “Amla Navami”. Performing recitations, donations, tarpan, bathing, etc.. offers limitless benefits. There is a special significance of worshiping Amla tree on this day. During puja, one should use a lamp lit using camphor or clarified butter, ghee in front of an Amla tree. Following mantra should be recited and then circumambulate around the tree:
YANI KANI CHA PAPAANI JANMANTARAKRITAANI CHA |
TAANI SARVAANI NASHYANTU PRADAKSHINPADE PADE ||
After this, there is the custom of offering food to pure brahmins and devotees of pure heart, and then one should oneself take meal under the Amla tree. If one doesnot have Amla tree in his backyard then the same practice can be repeated around a small amla plant in a pot or in any holy, religious place or ashram. Many Sant Shri Asaramji ashrams have Amla trees planted in their premises. You may also take benefit of these holy places.

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भगवान नाम जप के 20 नियम !


भगवान नाम जप के 20 नियम …जप के नियम जो इस प्रकार हैं : –

  1. जहाँ तक सम्भव हो वहाँ तक गुरू द्वारा प्राप्त मंत्र की अथवा किसी भी मंत्र की अथवा परमात्मा के किसी भी एक नाम की 1 से 200 माला जप करो।

  2. रूद्राक्ष अथवा तुलसी की माला का उपयोग करो।

  3. माला फिराने के लिए दाएँ हाथ के अँगूठे और बिचली (मध्यमा) या अनामिका उँगली का ही उपयोग करो।

  4. माला नाभि के नीचे नहीं लटकनी चाहिए। मालायुक्त दायाँ हाथ हृदय के पास अथवा नाक के पास रखो।

  5. माला ढंके रखो, जिससे वह तुम्हें या अन्य के देखने में न आये। गौमुखी अथवा स्वच्छ वस्त्र का उपयोग करो।

  6. एक माला का जप पूरा हो, फिर माला को घुमा दो। सुमेरू के मनके को लांघना नहीं चाहिए।

  7. जहाँ तक सम्भव हो वहाँ तक मानसिक जप करो। यदि मन चंचल हो जाय तो जप जितने जल्दी हो सके, प्रारम्भ कर दो।

  8. प्रातः काल जप के लिए बैठने के पूर्व या तो स्नान कर लो अथवा हाथ पैर मुँह धो डालो। मध्यान्ह अथवा सन्ध्या काल में यह कार्य जरूरी नहीं, परन्तु संभव हो तो हाथ पैर अवश्य धो लेना चाहिए। जब कभी समय मिले जप करते रहो। मुख्यतः प्रातःकाल, मध्यान्ह तथा सन्ध्याकाल और रात्रि में सोने के पहले जप अवश्य करना चाहिए।

  9. जप के साथ या तो अपने आराध्य देव का ध्यान करो अथवा तो प्राणायाम करो। अपने आराध्यदेव का चित्र अथवा प्रतिमा अपने सम्मुख रखो।

  10. जब तुम जप कर रहे हो, उस समय मंत्र के अर्थ पर विचार करते रहो।

  11. मंत्र के प्रत्येक अक्षर का बराबर सच्चे रूप में उच्चारण करो।

  12. मंत्रजप न तो बहुत जल्दी और न तो बहुत धीरे करो। जब तुम्हारा मन चंचल बन जाय तब अपने जप की गति बढ़ा दी।

  13. जप के समय मौन धारण करो और उस समय अपने सांसारिक कार्यों के साथ सम्बन्ध न रखो।

  14. पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुँह रखो। जब तक हो सके तब तक प्रतिदिन एक ही स्थान पर एक ही समय जप के लिए आसनस्थ होकर बैठो। मंदिर, नदी का किनारा अथवा बरगद, पीपल के वृक्ष के नीचे की जगह जप करने के लिए योग्य स्थान है।

  15. भगवान के पास किसी सांसारिक वस्तु की याचना न करो।

  16. जब तुम जप कर रहे हो उस समय ऐसा अनुभव करो कि भगवान की करूणा से तुम्हारा हृदय निर्मल होता जा रहा है और चित्त सुदृढ़ बन रहा है।

  17. अपने गुरूमंत्र को सबके सामने प्रकट न करो।

  18. जप के समय एक ही आसन पर हिले-डुले बिना ही स्थिर बैठने का अभ्यास करो।

  19. जप का नियमित हिसाब रखो। उसकी संख्या को क्रमशः धीरे-धीरे बढ़ाने का प्रयत्न करो।

  20. मानसिक जप को सदा जारी रखने का प्रयत्न करो। जब तुम अपना कार्य कर रहे हो, उस समय भी मन से जप करते रहो।

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तिथि और दिवस विशेष योग !


तिथि और दिवस विशेष योग जैसे रविवारि सप्तमी, बुधवारी अष्टमी, मंगली चतुर्थी, सोमवती अमावस्या,पूर्णिमा,
लाभ पंचमी, साढ़े तीन मुहूर्त, नवरात्री, आदि दिवस विशेष पर ऊपवास, जप, ध्यान, दान, सत्संग-श्रवण
अभ्यास करने से आरोगय एवम आध्यात्मिक उन्नति होती है. महापुरुषों की खोज विधि विधान,
पुरुषार्थ, मन, आत्मा और परमात्मा इनका विशेष मेल करने मे सहायक होती है.  जिज्ञासु के लिये
तत्परता और मार्ग क्रमण प्राप्त होती है. सुनिये और पढिये इसी मे सबकुछ ………

नक्षत्र – ज्योतिष में २७ नक्षत्र है.  ३६० अंश के भाग चक्र को २७ भागो में विभक्त करे तब हर भाग १३-२० अंश आता है.  एक नक्षत्र २४ घंटे रहता है.  कभी कभी २४ घंटे से ज्यादा समय ले लेता है.  चंद्रमा को जो समय १३-२० अंश पार  करने में लगता है उसे नक्षत्र कहते है. सवा  दो नक्षत्रों की एक चन्द्रमा राशी होती है.  प्रत्येक नक्षत्र को ४ चरणों में विभाजित किया गया है.  कुल २७ में ६ नक्षत्र गंमुल  के होते है.  ग्रहों की संख्या ९ है, प्रत्येक ग्रह ३ नक्षत्रों का स्वामी होता है.

कृतिका, उत्तर फाल्गुनी, उत्तर आशाडा, रोहिणी, हस्त, श्रावण, मृगशिरा, चित्रा, धनिस्था, अश्लेशा, ज्येष्ठा, रेवती, पुनर्वसु, विशाखा, पुरवा, भाद्रपद, भरनी, पूर्व फाल्गुनी, पूर्व आशाडा, पुष्य,

अनुराधा, उत्तर भाद्रपद, आर्द्रा, स्वाति, सतभिषा, अश्विनी, मघा, मूल –  इस प्रकार २७ नक्षत्र है.

योग –  हब सूर्य और चन्द्रमा गति में १३-२० अंश का अंतर हो एक योग बनता है.  शुभ और अशुभ मिलकर २७ योग है.  इनकी आवश्कयता यात्रा, मुहुर्त में पड़ती है.  आत्मिक उन्नति और आरोग्यता के लिए भी इनका लाभ होता है.  महापुरुषों ने ऐसे वार या दिवस के साथ बने योग से लाभ उठाने की युक्तियाँ खोज रक्खी है.

विष्कुम्भ, प्रीती, आयुष्मान, सौभाग्य, शोभन, अतिगंड, सुकर्मा, घृति, शूल, गंड, वृद्धि, धृव, व्याघात, हर्षण, वज्र, सिद्धि, व्यतिपात, वरियान, परिधि, शिव, सिद्ध, साध्य, शुभ, ब्रह्म, इन्द्र, वैधृति   इस प्रकार २७ योग है.

विशेष योग ऐसे है……..

१. रविवार की सप्तमी आरोग्य प्रदान करने में सक्षम है | इसको अचला सप्तमी भी बोलते है | सूर्यग्रहण के समान इस का पुण्य है लाख गुना फल होगा जप का | सूर्यग्रहण के समय अथवा चंद्रग्रहण के समय स्नान, जप, ध्यान आदि से जो फल होता है वो फल होगा और रविवार की सप्तमी को अगर मानसिक गुरुपूजन का स्नान, जप, ध्यान आदि पूजन किया जाये तो वो फल अक्षय होगा | उस फल का क्षय नहीं होता, पुण्य का फल का क्षय होगा सुख भोगने से, पाप का फल होगा दुःख भोगने से, लेकिन गुरुपूजन का फल अक्षय होगा, नष्ट नहीं होगा, शाश्वत से मिलाने वाला होगा |

२. वर्ष में एक महाशिवरात्रि आती है और हर महीने में एक मासिक शिवरात्रि आती है। उस दिन श्याम को बराबर सूर्यास्त हो रहा हो उस समय एक दिया पर पाँच लंबी बत्तियाँ अलग-अलग उस एक में हो शिवलिंग के आगे जला के रखना | प्रार्थना कर देना, बैठ के जप करना | इससे व्यक्ति के सिर पे कर्जा हो तो जलदी उतरता है, आर्थिक परेशानियाँ दूर होती है |

३. वार्षिक महाशिवरात्रि – इस दिन हिम्मत है तो – सुबह से सूर्योदय से लेकर अगले दिन के सूर्योदय तक पानी भी न पिये | हर महाशिवरात्रि को अगर कोई करे भाग्य की रेखा ही बदल सकती है | ये करना ही चाहिये १५ से लेकर ४५ साल के उम्र के लोगों को |

४. मासिक शिवरात्रि को मंगलवार  उसे भोम प्रदोष योग कहते है ….उस दिन नमक, मिर्च नहीं खाना चाहिये, उससे जलदी फायदा होता है | मंगलदेव ऋणहर्ता देव हैं। उस दिन संध्या के समय यदि भगवान भोलेनाथ का पूजन करें तो भोलेनाथ की, गुरु की कृपा से हम जल्दी ही कर्ज से मुक्त हो सकते हैं। इस दैवी सहायता के साथ थोड़ा स्वयं भी पुरुषार्थ करें। पूजा करते समय यह मंत्र बोलें –
मृत्युंजयमहादेव त्राहिमां शरणागतम्। जन्ममृत्युजराव्याधिपीड़ितः कर्मबन्धनः।।

कभी नींद १२ से २ के बीच खुल जाती है तो पित्त की प्रधानता है | उस समय मिश्री मिश्रित ठंडा पानी…. न हो थोडा गुनगुना पानी पी ले… पित्त का शमन होगा ….नींद अच्छी आयेगी |
लेकिन २ से ६ बजे तक अनिद्रा और दुःख होता तो वायु है | तो मिश्री और जीरा ….कूट के रख दे ,सेक के | जीरा और मिश्री मिलाके पीना चाहिये | लेकिन ठंडा पिने से जठराग्नि मंद होगी | रात को पानी नहीं पीना चाहिये, थोडा गुनगुना पानी पी ले |

५. षट्तिला एकादशी है | स्नान, उबटन जिसमे जौ और तिल पड़ा हो | जौ डाला हुआ पानी पीना, तिल डाला हुआ पानी लेना, तिल मिश्रित भोजन करना, तिल का दान करना, तिल का होम करना ये पापनाशक प्रयोग है |

६. वराह भीष्म तिल द्वादशी | तिल का उपयोग करें स्नान में, प्रसाद में, हवन में, दान में और भोजन में | और तिल के दियें जलाकर सम्पूर्ण व्याधियों से रक्षा की भावना करोगे तो ब्रम्हपुराण कहता है कि तुम्हे व्याधियों से रक्षा मिलेगी |

७.भीष्म अष्टमी, भीष्म श्राद्ध दिवस है | भीष्म के नाम से सूर्य को अर्घ्य दिया, भीष्मजी को अर्घ्य दिया तो संतान हिन् को संतान मिल सकती है और आरोग्य आदि प्राप्त होता है |

८. भविष्योत्तर पुराण में बताया कि  माघी अमावश्या के दिन  अगर भगवान ब्रह्माजी  का कोई पूजन करें, श्लोक और गायत्री मंत्र बोलकर कोई ब्रम्हाजी को नमन करते है और थोड़ी देर शांत बैठे और फिर गुरुमंत्र का जप करें तो उनको विशेष लाभ होता है | जो भाई-बहन जो सत्संग में आते है वो दैवी सम्पदा पाये और लौकिक सम्पदा भी पाये | किसी के सिर पे भार न रहें | दैवी सम्पदा से खूब धनवान हो और लौकिक धन की भी कमी न रहें |
मंत्र इस प्रकार है –

स्थानं स्वर्गेथ पाताले यन्मर्ते किंचिदत्तंम | तद्व्पोंत्य संधिग्धम पद्मयोंने प्रसादत: ||

गायत्री मंत्र –

ॐ भू भुर्व: स्व: तत सवितुर्वरेण्यं | भर्गो देवस्य धीमहि | धियो यो न: प्रचोदयात् ||

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विजया एकादशी – 26 फरवरी, 2014

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युधिष्ठिर ने पूछा: हे वासुदेव! फाल्गुन (गुजरात महाराष्ट्र के अनुसार माघ) के कृष्णपक्ष में किस नाम की एकादशी होती है और उसका व्रत करने की विधि क्या है? कृपा करके बताइये ।

भगवान श्रीकृष्ण बोले: युधिष्ठिर ! एक बार नारदजी ने ब्रह्माजी से फाल्गुन के कृष्णपक्ष की ‘विजया एकादशी’ के व्रत से होनेवाले पुण्य के बारे में पूछा था तथा ब्रह्माजी ने इस व्रत के बारे में उन्हें जो कथा और विधि बतायी थी, उसे सुनो :
ब्रह्माजी ने कहा : नारद ! यह व्रत बहुत ही प्राचीन, पवित्र और पाप नाशक है । यह एकादशी राजाओं को विजय प्रदान करती है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है ।
त्रेतायुग में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्रजी जब लंका पर चढ़ाई करने के लिए समुद्र के किनारे पहुँचे, तब उन्हें समुद्र को पार करने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा था । उन्होंने लक्ष्मणजी से पूछा : ‘सुमित्रानन्दन ! किस उपाय से इस समुद्र को पार किया जा सकता है ? यह अत्यन्त अगाध और भयंकर जल जन्तुओं से भरा हुआ है । मुझे ऐसा कोई उपाय नहीं दिखायी देता, जिससे इसको सुगमता से पार किया जा सके ।’
लक्ष्मणजी बोले : हे प्रभु ! आप ही आदिदेव और पुराण पुरुष पुरुषोत्तम हैं । आपसे क्या छिपा है? यहाँ से आधे योजन की दूरी पर कुमारी द्वीप में बकदाल्भ्य नामक मुनि रहते हैं । आप उन प्राचीन मुनीश्वर के पास जाकर उन्हींसे इसका उपाय पूछिये ।
श्रीरामचन्द्रजी महामुनि बकदाल्भ्य के आश्रम पहुँचे और उन्होंने मुनि को प्रणाम किया । महर्षि ने प्रसन्न होकर श्रीरामजी के आगमन का कारण पूछा ।
श्रीरामचन्द्रजी बोले : ब्रह्मन् ! मैं लंका पर चढ़ाई करने के उद्धेश्य से अपनी सेनासहित यहाँ आया हूँ । मुने ! अब जिस प्रकार समुद्र पार किया जा सके, कृपा करके वह उपाय बताइये ।
बकदाल्भय मुनि ने कहा : हे श्रीरामजी ! फाल्गुन के कृष्णपक्ष में जो ‘विजया’ नाम की एकादशी होती है, उसका व्रत करने से आपकी विजय होगी । निश्चय ही आप अपनी वानर सेना के साथ समुद्र को पार कर लेंगे ।
राजन् ! अब इस व्रत की फलदायक विधि सुनिये :
दशमी के दिन सोने, चाँदी, ताँबे अथवा मिट्टी का एक कलश स्थापित कर उस कलश को जल से भरकर उसमें पल्लव डाल दें । उसके ऊपर भगवान नारायण के सुवर्णमय विग्रह की स्थापना करें । फिर एकादशी के दिन प्रात: काल स्नान करें । कलश को पुन: स्थापित करें । माला, चन्दन, सुपारी तथा नारियल आदि के द्वारा विशेष रुप से उसका पूजन करें । कलश के ऊपर सप्तधान्य और जौ रखें । गन्ध, धूप, दीप और भाँति भाँति के नैवेघ से पूजन करें । कलश के सामने बैठकर उत्तम कथा वार्ता आदि के द्वारा सारा दिन व्यतीत करें और रात में भी वहाँ जागरण करें । अखण्ड व्रत की सिद्धि के लिए घी का दीपक जलायें । फिर द्वादशी के दिन सूर्योदय होने पर उस कलश को किसी जलाशय के समीप (नदी, झरने या पोखर के तट पर) स्थापित करें और उसकी विधिवत् पूजा करके देव प्रतिमासहित उस कलश को वेदवेत्ता ब्राह्मण के लिए दान कर दें । कलश के साथ ही और भी बड़े बड़े दान देने चाहिए । श्रीराम ! आप अपने सेनापतियों के साथ इसी विधि से प्रयत्नपूर्वक ‘विजया एकादशी’ का व्रत कीजिये । इससे आपकी विजय होगी ।
ब्रह्माजी कहते हैं : नारद ! यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजी ने मुनि के कथनानुसार उस समय ‘विजया एकादशी’ का व्रत किया । उस व्रत के करने से श्रीरामचन्द्रजी विजयी हुए । उन्होंने संग्राम में रावण को मारा, लंका पर विजय पायी और सीता को प्राप्त किया । बेटा ! जो मनुष्य इस विधि से व्रत करते हैं, उन्हें इस लोक में विजय प्राप्त होती है और उनका परलोक भी अक्षय बना रहता है ।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं : युधिष्ठिर ! इस कारण ‘विजया’ का व्रत करना चाहिए । इस प्रसंग को पढ़ने और सुनने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है ।

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विजया एकादशी – 26 फरवरी, 2014

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Shrimad Bhagawad Gita Jayanti

“गीता” कैसी भी परिस्थिती मे अपनी बुद्धि को डावाडोल नहीं होने देने की सीख देती है ।

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Shrimad Bhagawad Gita Jayanti

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उत्पत्ति एकादशी का व्रत हेमन्त ॠतु में मार्गशीर्ष मास के कृष्णपक्ष ( गुजरात महाराष्ट्र के अनुसार कार्तिक ) को करना चाहिए । इसकी कथा इस प्रकार है :
युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा : भगवन् ! पुण्यमयी एकादशी तिथि कैसे उत्पन्न हुई? इस संसार में वह क्यों पवित्र मानी गयी तथा देवताओं को कैसे प्रिय हुई?
श्रीभगवान बोले : कुन्तीनन्दन ! प्राचीन समय की बात है । सत्ययुग में मुर नामक दानव रहता था । वह बड़ा ही अदभुत, अत्यन्त रौद्र तथा सम्पूर्ण देवताओं के लिए भयंकर था । उस कालरुपधारी दुरात्मा महासुर ने इन्द्र को भी जीत लिया था । सम्पूर्ण देवता उससे परास्त होकर स्वर्ग से निकाले जा चुके थे और शंकित तथा भयभीत होकर पृथ्वी पर विचरा करते थे । एक दिन सब देवता महादेवजी के पास गये । वहाँ इन्द्र ने भगवान शिव के आगे सारा हाल कह सुनाया ।
इन्द्र बोले : महेश्वर ! ये देवता स्वर्गलोक से निकाले जाने के बाद पृथ्वी पर विचर रहे हैं । मनुष्यों के बीच रहना इन्हें शोभा नहीं देता । देव ! कोई उपाय बतलाइये । देवता किसका सहारा लें ?
महादेवजी ने कहा : देवराज ! जहाँ सबको शरण देनेवाले, सबकी रक्षा में तत्पर रहने वाले जगत के स्वामी भगवान गरुड़ध्वज विराजमान हैं, वहाँ जाओ । वे तुम लोगों की रक्षा करेंगे ।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं : युधिष्ठिर ! महादेवजी की यह बात सुनकर परम बुद्धिमान देवराज इन्द्र सम्पूर्ण देवताओं के साथ क्षीरसागर में गये जहाँ भगवान गदाधर सो रहे थे । इन्द्र ने हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की ।
इन्द्र बोले : देवदेवेश्वर ! आपको नमस्कार है ! देव ! आप ही पति, आप ही मति, आप ही कर्त्ता और आप ही कारण हैं । आप ही सब लोगों की माता और आप ही इस जगत के पिता हैं । देवता और दानव दोनों ही आपकी वन्दना करते हैं । पुण्डरीकाक्ष ! आप दैत्यों के शत्रु हैं । मधुसूदन ! हम लोगों की रक्षा कीजिये । प्रभो ! जगन्नाथ ! अत्यन्त उग्र स्वभाववाले महाबली मुर नामक दैत्य ने इन सम्पूर्ण देवताओं को जीतकर स्वर्ग से बाहर निकाल दिया है । भगवन् ! देवदेवेश्वर ! शरणागतवत्सल ! देवता भयभीत होकर आपकी शरण में आये हैं । दानवों का विनाश करनेवाले कमलनयन ! भक्तवत्सल ! देवदेवेश्वर ! जनार्दन ! हमारी रक्षा कीजिये… रक्षा कीजिये । भगवन् ! शरण में आये हुए देवताओं की सहायता कीजिये ।
इन्द्र की बात सुनकर भगवान विष्णु बोले : देवराज ! यह दानव कैसा है ? उसका रुप और बल कैसा है तथा उस दुष्ट के रहने का स्थान कहाँ है ?
इन्द्र बोले: देवेश्वर ! पूर्वकाल में ब्रह्माजी के वंश में तालजंघ नामक एक महान असुर उत्पन्न हुआ था, जो अत्यन्त भयंकर था । उसका पुत्र मुर दानव के नाम से विख्यात है । वह भी अत्यन्त उत्कट, महापराक्रमी और देवताओं के लिए भयंकर है । चन्द्रावती नाम से प्रसिद्ध एक नगरी है, उसीमें स्थान बनाकर वह निवास करता है । उस दैत्य ने समस्त देवताओं को परास्त करके उन्हें स्वर्गलोक से बाहर कर दिया है । उसने एक दूसरे ही इन्द्र को स्वर्ग के सिंहासन पर बैठाया है । अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, वायु तथा वरुण भी उसने दूसरे ही बनाये हैं । जनार्दन ! मैं सच्ची बात बता रहा हूँ । उसने सब कोई दूसरे ही कर लिये हैं । देवताओं को तो उसने उनके प्रत्येक स्थान से वंचित कर दिया है ।
इन्द्र की यह बात सुनकर भगवान जनार्दन को बड़ा क्रोध आया । उन्होंने देवताओं को साथ लेकर चन्द्रावती नगरी में प्रवेश किया । भगवान गदाधर ने देखा कि “दैत्यराज बारंबार गर्जना कर रहा है और उससे परास्त होकर सम्पूर्ण देवता दसों दिशाओं में भाग रहे हैं ।’ अब वह दानव भगवान विष्णु को देखकर बोला : ‘खड़ा रह … खड़ा रह ।’ उसकी यह ललकार सुनकर भगवान के नेत्र क्रोध से लाल हो गये । वे बोले : ‘ अरे दुराचारी दानव ! मेरी इन भुजाओं को देख ।’ यह कहकर श्रीविष्णु ने अपने दिव्य बाणों से सामने आये हुए दुष्ट दानवों को मारना आरम्भ किया । दानव भय से विह्लल हो उठे । पाण्ड्डनन्दन ! तत्पश्चात् श्रीविष्णु ने दैत्य सेना पर चक्र का प्रहार किया । उससे छिन्न भिन्न होकर सैकड़ो योद्धा मौत के मुख में चले गये ।
इसके बाद भगवान मधुसूदन बदरिकाश्रम को चले गये । वहाँ सिंहावती नाम की गुफा थी, जो बारह योजन लम्बी थी । पाण्ड्डनन्दन ! उस गुफा में एक ही दरवाजा था । भगवान विष्णु उसीमें सो गये । वह दानव मुर भगवान को मार डालने के उद्योग में उनके पीछे पीछे तो लगा ही था । अत: उसने भी उसी गुफा में प्रवेश किया । वहाँ भगवान को सोते देख उसे बड़ा हर्ष हुआ । उसने सोचा : ‘यह दानवों को भय देनेवाला देवता है । अत: नि:सन्देह इसे मार डालूँगा ।’ युधिष्ठिर ! दानव के इस प्रकार विचार करते ही भगवान विष्णु के शरीर से एक कन्या प्रकट हुई, जो बड़ी ही रुपवती, सौभाग्यशालिनी तथा दिव्य अस्त्र शस्त्रों से सुसज्जित थी । वह भगवान के तेज के अंश से उत्पन्न हुई थी । उसका बल और पराक्रम महान था । युधिष्ठिर ! दानवराज मुर ने उस कन्या को देखा । कन्या ने युद्ध का विचार करके दानव के साथ युद्ध के लिए याचना की । युद्ध छिड़ गया । कन्या सब प्रकार की युद्धकला में निपुण थी । वह मुर नामक महान असुर उसके हुंकारमात्र से राख का ढेर हो गया । दानव के मारे जाने पर भगवान जाग उठे । उन्होंने दानव को धरती पर इस प्रकार निष्प्राण पड़ा देखकर कन्या से पूछा : ‘मेरा यह शत्रु अत्यन्त उग्र और भयंकर था । किसने इसका वध किया है ?’
कन्या बोली: स्वामिन् ! आपके ही प्रसाद से मैंने इस महादैत्य का वध किया है।
श्रीभगवान ने कहा : कल्याणी ! तुम्हारे इस कर्म से तीनों लोकों के मुनि और देवता आनन्दित हुए हैं। अत: तुम्हारे मन में जैसी इच्छा हो, उसके अनुसार मुझसे कोई वर माँग लो । देवदुर्लभ होने पर भी वह वर मैं तुम्हें दूँगा, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है ।
वह कन्या साक्षात् एकादशी ही थी।
उसने कहा: ‘प्रभो ! यदि आप प्रसन्न हैं तो मैं आपकी कृपा से सब तीर्थों में प्रधान, समस्त विघ्नों का नाश करनेवाली तथा सब प्रकार की सिद्धि देनेवाली देवी होऊँ । जनार्दन ! जो लोग आपमें भक्ति रखते हुए मेरे दिन को उपवास करेंगे, उन्हें सब प्रकार की सिद्धि प्राप्त हो । माधव ! जो लोग उपवास, नक्त भोजन अथवा एकभुक्त करके मेरे व्रत का पालन करें, उन्हें आप धन, धर्म और मोक्ष प्रदान कीजिये ।’
श्रीविष्णु बोले: कल्याणी ! तुम जो कुछ कहती हो, वह सब पूर्ण होगा ।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं : युधिष्ठिर ! ऐसा वर पाकर महाव्रता एकादशी बहुत प्रसन्न हुई । दोनों पक्षों की एकादशी समान रुप से कल्याण करनेवाली है । इसमें शुक्ल और कृष्ण का भेद नहीं करना चाहिए । यदि उदयकाल में थोड़ी सी एकादशी, मध्य में पूरी द्वादशी और अन्त में किंचित् त्रयोदशी हो तो वह ‘त्रिस्पृशा एकादशी’ कहलाती है । वह भगवान को बहुत ही प्रिय है । यदि एक ‘त्रिस्पृशा एकादशी’ को उपवास कर लिया जाय तो एक हजार एकादशी व्रतों का फल प्राप्त होता है तथा इसी प्रकार द्वादशी में पारण करने पर हजार गुना फल माना गया है । अष्टमी, एकादशी, षष्ठी, तृतीय और चतुर्दशी – ये यदि पूर्वतिथि से विद्ध हों तो उनमें व्रत नहीं करना चाहिए । परवर्तिनी तिथि से युक्त होने पर ही इनमें उपवास का विधान है । पहले दिन में और रात में भी एकादशी हो तथा दूसरे दिन केवल प्रात: काल एकदण्ड एकादशी रहे तो पहली तिथि का परित्याग करके दूसरे दिन की द्वादशीयुक्त एकादशी को ही उपवास करना चाहिए । यह विधि मैंने दोनों पक्षों की एकादशी के लिए बतायी है ।
जो मनुष्य एकादशी को उपवास करता है, वह वैकुण्ठधाम में जाता है, जहाँ साक्षात् भगवान गरुड़ध्वज विराजमान रहते हैं । जो मानव हर समय एकादशी के माहात्मय का पाठ करता है, उसे हजार गौदान के पुण्य का फल प्राप्त होता है । जो दिन या रात में भक्तिपूर्वक इस माहात्म्य का श्रवण करते हैं, वे नि:संदेह ब्रह्महत्या आदि पापों से मुक्त हो जाते हैं । एकादशी के समान पापनाशक व्रत दूसरा कोई नहीं है ।

Utpatti Ekadashi

Yudhishthira asked Lord Krishna, “O Lord! How did the auspicious day of pious Ekadashi originate ? Why is it considered so pious in this world, and how is it dear to the deities?”
Lord Krishna responded, “O Son of Kunti! It is an ancient story. In Satyuga, there lived a demon named Mura. He was extraordinary, extremely terrifying and caused fear to all gods. The wicked giant, embodiment of death, had defeated even Indra, the king of gods. All gods were defeated by him and were driven out of heaven. They wandered on the earth, anxious and fearful. One day, all gods approached Lord Shiva. Indra narrated their tale of woes to Lord Shiva.
Indra said, ‘O Lord! All we gods, having been driven out of the heaven, are roaming around on the earth. Living among mortals undermines our stature. O Lord! Kindly suggest some remedy. Whose help should we seek?’
Lord Shiva said, ‘O King of Gods! Go where Lord Vishnu, the eagle-bannered god, the Lord of the world, the protector of all, and the best resort, dwells. He will protect you all.’
“Yudhishthira! Receiving this advice from Lord Shiva, the sagacious Indra, accompanied by all gods, went to Kshirsagar (the ocean of milk) where Lord Vishnu was reposing. Indra, with his hands folded in prayers, extolled Lord Vishnu.
Indra said, ‘O Lord of the Gods! I bow before thee, Lord! Thou art our master, thou art our intellect, thou alone are the doer and thou alone are the cause of all that happens. Thou art the mother and father of all beings of this world. Gods and demons both bow down to you. O beloved of Pundareek! You are the enemy of the demons. O slayer of the demon Madhu! Kindly protect us. Lord of the universe! Fierce and colossal demon Mura has vanquished all gods and expelled them from the heavens. O Lord of all gods! Thou love those who seek your refuge! Frightened, gods have come to seek your protection. O slayer of the wicked demons! O Lotus-eyed! O Lord of all gods! O Janardan! Shower affection on your devotees! Give us thy benign protection. Kindly do give! Lord! Kindly help the gods who have come seeking protection.’
Listening to Indra’s tale of woes, Lord Vishnu said, ‘King of gods! What is this demon like? What appearance and strength does he possess and where is the abode of this wicked one?’
Indra said, ‘O Lord of all gods! In ancient times, a great demon named Taljangh was born in Lord Brahma’s lineage. He was extremely fierce. His son is well known as demon Mura. He too is very fierce, extraordinarily valiant and frightening to the gods. There is a famous town named Chandrawati which he has chosen as his abode. This wicked demon has defeated all the gods and forced them to flee the heavens. He has enthroned another Indra (as chief of Gods). He has appointed others in the role of ‘Agni’ (the Fire-God), Surya (the Sun-God), Chandrama (the Mooon-God), Vayu (the Wind-God) and Varuna (the Water-God). Lord! I am speaking the absolute truth. He has appointed others to various positions, stripping the gods of their rightful positions.’
When Indra narrated all this, Lord Vishnu was terribly engaged. He stormed Chandrawati. The mace-bearing Lord Vishnu reached Chandrawati accompanied by Gods. He observed that the demon-king was repeatedly roaring, and the vanquished gods were fleeing in terror. Seeing Lord Vishnu, the demon said, ‘Keep standing… don’t run away.’ Listening to this challenge, Lord Vishnu’s eyes turned red with anger. The Lord said,
‘O sinful demon! Observe the strength of my arms.’ Saying this, Lord Vishnu started slaying, with His divine arrows, the demons that were before Him. The demons were flustered out of fear. Son of Pandu! Thereafter, Lord Vishnu used His Sudarshan-Chakra (a divine weapon in the form of a disc) on the demon-army, which tore apart the demons leading them to death. Torn into pieces with its strikes, many demons were killed.
Only one demon fought there ceaselessly. He made all the Gods flee. A close fight took place between Vishnu and the demon, which lasted for thousand divine years. Vishnu was vanquished.
Thereafter, Lord Vishnu left for Badrikashram. At Badrikashram, there was a cave named Sinhawati, which was twelve yojans (a traditional measure of distance, yojan approximately equals 8 miles) long. O Son of Pandu! There was only one entrance to the cave. Lord Vishnu slept in that cave. That demon was, anyhow, following Lord Vishnu with the objective of killing Him. As such, he too entered the cave. Seeing Vishnu asleep there, the demon was delighted. He thought, ‘This is the God who is a terror for demons. Therefore, I shall undoubtedly kill him.’ Yudhishthira! While the demon was entertaining such thoughts, a maiden sprang up from Lord Vishnu’s form. She was superbly beautiful and auspicious, armed to teeth with divine missiles and weapons. She was the creation to Lord Vishnu’s effulgence. Her strength and valour was formidable. Yudhishthira! The demon-king Mura saw the maiden. Desirous of a battle, the girl challenged him for a duel. A battle ensued. The girl was completely well versed in all aspects of warfare. The demon Mura was reduced to ashes simply by her grunt. In the meanwhile, Lord Vishnu woke up. Seeing the demon lying lifeless on the ground, Lord Vishnu asked, ‘This enemy of mine was very fierce and dreadful. Who killed him?”
The girl said, ‘Lord! It is only with Thy grace that I have killed this colossal demon.’
Lord Vishnu said, ‘Propitious lady! Through this pious deed of yours, the Sages and Gods in all the three worlds have been pleased. Therefore, seek any boon from me as per your wish. Even if you demand something unattainable by gods, I will surely grant you; there is not an iota of doubt in it.’
The maiden was Ekadashi herself. She said, ‘Lord! If Thou art pleased, grant that I should become, with Thy divine grace, foremost among all places of pilgrimage, destroyer of all difficulties, and granter of all types of siddhis (supernatural powers). Lord! Let all those, who will observe a fast on this day with a feeling of devotion towards You, be endowed with all siddhis. Madhav! Be pleased to grant wealth, righteousness and salvation to those who observe a fast on my day, taking no food at all, taking a meal only in the night or taking only one meal during the day.’
Lord Vishnu said, ‘Propitious lady! Whatever you are asking is all granted.’
Yudhishthira! The Ekadashi of a great vow was immensely pleased to be endowed with this boon. The Ekadashi of both the fortnights is equally propitious. One would not differentiate between Ekadashi coming in bright and dark fortnights. If there is a small part of Ekadashi (eleventh moon day) remaining at the time of sunrise, full Dwadashi (twelfth moon day) in the middle, and a little bit of Trayodashi (thirteenth moon day) at the end of the day; it is called Trisparsha (touching three) Ekadashi. This TrisparshaEkadashi is very dear to the Lord. Observing a fast on one Trisparsha Ekadashi grants virtues equivalent to observing a fast on one thousand Ekadashi days. Similarly, if the fast is broken on the Dwadashi day, one gets virtues equivalent to observing fast on one thousand Ekadashi days. Ashtami (eighth moon day), Ekadashi (eleventh moon day), Shashthi (sixth moon day), Tritiya (third moon day) and Chaturdashi (fourteenth moon day), when these are mixed with the previous solar day, should not be observed as fast days. Fasting is prescribed on these moon days only when mixed with the next solar day, i.e. the moon day, which sees the Sunrise. If there is Ekadashi on the first day and also in the night, and on the second day Ekadashi lasts for a little while, then one should not observe a fast on the first day, and should observe a fast only on the second day, which has a part of Dwadashi. What I have told you applies to Ekadashi of both fortnights.
A person, observing a fast on Ekadashi, attains Vaikunth, the abode of eagle-bannered Lord Vishnu. One who recites the importance of Ekadashi all the time realizes virtues equivalent to donating one thousand cows. There is no doubt that those who devoutly listen to it by day or night are delivered of sins as grave as Brahmhatya (slaying of a Brahmin). There is no other vow that is as sin-destroying as Ekadashi.