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साजिश को सच का रूप देने की मनोवैज्ञानिक रणनीति


shilpa

संत श्री आशारामजी बापू के खिलाफ जो षड्यंत्र चल रहा है, उसका मनोवैज्ञानिक तरीके से किस तरह से सुनियोजन किया गया है, यह मैं एक मनोविज्ञानी होने के नाते आपको बताना चाहती हूँ । आठ मुख्य पहलू समझेंगे कि किस तरह इस साजिश को सच का मुखौटा पहनाया जा रहा है ।

(१) जनता के विशिष्ट वर्गों पर निशाना : समाज के शिक्षित, जागरूक, उच्च एवं मुख्यतः युवा वर्ग को निशाना बनाया गया क्योंकि इनको विश्वास दिलाने पर ये तुरंत प्रतिक्रिया करते हैं ।

(२) षड्यंत्र का मुद्दा : देश की ज्वलंत समस्या ‘महिलाओं पर अत्याचार’ को मुख्य मुद्दा बनाया है । इस भावनात्मक विषय पर हर कोई तुरंत प्रतिक्रिया दे के विरोध दर्शाता है ।

(३) रणनीति : चीज को यथार्थपूर्ण, विश्वसनीय, प्रभावशाली दिखाने जैसी मार्केटिंग रणनीति का उपयोग करके दर्शकों को पूरी तरह से प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है ।

दर्शक मनोविज्ञान का भी दुरुपयोग किया जा रहा है । कोई विज्ञापन हमें पहली बार पसंद नहीं आता है लेकिन जब हम बार-बार उसे देखते हैं तो हमें पता भी नहीं चलता है कि कब हम उस विज्ञापन को गुनगुनाने लग गये । बिल्कुल ऐसे ही बापूजी के खिलाफ इस बोगस मामले को बार-बार दिखाने से दर्शकों को असत्य भी सत्य जैसा लगने लगता है ।

(४) प्रस्तुतिकरण का तरीका : पेड मीडिया चैनलों के एंकर आपके ऊपर हावी होकर बात करना चाहते हैं । वे सिर्फ खबर को बताना नहीं चाहते बल्कि सेकंडभर की फालतू बात को भी ‘ब्रेकिंग न्यूज’ बताकर दिनभर दोहराते हैं और आपको हिप्नोटाइज करने की कोशिश करते हैं ।

(५) भाषा : खबर को बहुत चटपटे शब्दों के द्वारा असामान्य तरीके से बताते हैं । ‘बात गम्भीर है, झड़प, मामूली’ आदि शब्दों की जगह ‘संगीन, वारदात, गिरोह, बड़ा खुलासा, स्टिंग ऑपरेशन’ ऐसे शब्दों के सहारे मामूली मुद्दे को भी भयानक रूप दे देते हैं ।

(६) आधारहीन कहानियाँ बनाना, सुटिंग ऑपरेशन्स और संबंधित बिन्दु : ‘आश्रम में अफीम की खेती, स्टिंग ऑपरेशन’ आदि आधारहीन कहानियाँ बनाकर मामले को रुचिकर बना के उलझाने की कोशिश करते हैं ।

(७) मुख्य हथियार : बहुत सारे विडियो जो दिखाये जाते हैं वे तोड़-मरोड़ के बनाये जाते हैं । ऐसे ऑडियो टेप भी प्रसारित किये जाते हैं । यह टेक्नोलॉजी का दुरुपयोग है ।

इसके अलावा कमजोर, नकारात्मक मानसिकतावालों को डरा के या प्रलोभन देकर उनसे बुलवाते हैं । आश्रम से निकाले गये २-५ बगावतखोर लोगों को मोहरा बनाते हैं ताकि झूठी विश्वसनीयता ब‹ढायी जा सके ।

(८) मनोवैज्ञानिक वातावरण तैयार करना : बापूजी की जमानत की सुनवाई से एक दिन पहले धमकियों की खबरें उछाली जाती हैं, कभी पुलिस को, कभी माता-पिता और लड़की को तो कभी न्यायाधीश को । ये खबरें कभी भी कुछ सत्य साबित नहीं हुर्इं ।

अब आप खुद से प्रश्न पूछिये और खुद ही जवाब ढूँढिये कि क्या यह आरोप सच है या एक सोची-समझी साजिश ?

और एक बात कि केवल पेड मीडिया चैनल ही नहीं बल्कि इसीके समान प्रिंट मीडिया भी खतरनाक तरीके से जनमानस को प्रभावित कर रहा है । इन दोनों से सावधान रहना चाहिए ।

– शिल्पा अग्रवाल,

प्रसिद्ध मनोविज्ञानी

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गौ सेवा - गाय की रक्षा - देश की रक्षा

बापू जी के श्री चित्र को १०८ परिक्रमा करती निवाई गौशाला की गौमाता

Awesome, Gau-sewa, Saint and People, Social Activities

गौ सेवा – गाय की रक्षा – देश की रक्षा

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सार्इं टेऊँराम


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वृक्ष कबहुँ नहीं फल भखै, नदी न पीवे नीर ।

परमारथ के कारने, साधु धरा शरीर ।।

जैसे वृक्ष अपने फलों को स्वयं भी कभी नहीं खाता, सरिता अपने नीर का स्वयं पान कभी नहीं करती वैसे ही संतों का जीवन भी अपने लिए नहीं होता । हालांकि संतों की यश-कीर्ति से जलनेवाले लोग उनकी यश-कीर्ति को धूमिल करने के बहुतेरे प्रयास करते हैं । किन्तु इन सबकी परवाह न करते हुए वे संतजन अपने जीवन को परहित में ही व्यतीत कर देते हैं । उनका जीवन तो बस, मानवमात्र को दुःखों से छुटकारा दिलवाकर उनके भीतर शांति एवं आनंद भरने में ही खर्च होता है ।

सिंध प्रांत में ऐसे ही एक महान संत हो गये- सार्इं टेऊँराम । उनके सान्निध्य को पाकर लोग बहुत खुशहाल रहते थे । निगाहमात्र से ही लोगों में शांति एवं आनंद का संचार कर देने की शक्ति उनमें थी । उनके सत्संग में मात्र वृद्ध स्त्री-पुरुष ही नहीं, कई युवान-युवतियाँ भी आते थे । उनकी बढ़ती प्रसिद्धि एवं उनके प्रति लोगों के प्रेम को देखकर कई तथा-कथित समाजसुधारकों को तकलीफ होने लगी । समाजसुधारक भी दो प्रकार के लोग होते हैं एक तो सज्जन लोग होते हैं और दूसरे वे लोग होते हैं जो दूसरों के यश को देखकर जलते हैं । उनको होता है कि कैसे भी करके अपनी प्रसिद्धि हो जाये । ऐसे ही कुछ मलिन मुरादवालों ने सार्इं टेऊँराम का कुप्रचार शुरू कर दिया । कुप्रचार ने इतना जोर पकड़ा, इतना जोर पकड़ा कि कुछ भोलेभाले सज्जन लोगों ने सार्इं टेऊँराम के पास जाना बंद कर दिया । उस वक्त के सज्जनों की यह बड़ी भारी गलती रही । उन्होंने सोचा कि ‘अपना क्या ? जो करेगा सो भरेगा ।’

अरे ! कुप्रचार करनेवाले क्यों कुप्रचार करते ही रहें ? वे बिचारे करें और फिर भरें उससे पहले ही तुम उन्हें आँखें दिखा दो ताकि वे दुष्कर्म करें भी नहीं और भरें भी नहीं । समाज की बरबादी न हो, समाज गुमराह न हो । खैर… सार्इं टेऊँराम की निंदा एवं कुप्रचार ने आखिरकार इतना जोर पकड़ा कि नगर पालिका में एक प्रस्ताव पास किया गया कि सार्इं टेऊँराम के आश्रम में जो लड़के-लड़कियाँ जायेंगे उनके माता-पिता को पाँच रूपये जुर्माना भरना पड़ेगा । उस वक्त पाँच रूपये की कीमत बहुत थी । ७८ रूपये तोला सोने की कीमत थी तब की यह बात है । सौ रूपये दान करना तो अच्छी बात है लेकिन दंड भरना, यह तो बड़ी लज्जा की बात है । कुछ कमजोर मन के लोग थे उन्होंने तो अपने बेटे-बेटियों को सार्इं टेऊँराम के आश्रम में जाने से रोका । कुछ लड़के-लड़कियाँ तो रुक गये । लेकिन जिनको महापुरुष की कृपा का स्वाद ठीक से समझ में आ गया था वे नहीं रुके । उनकी अंतरात्मा तो मानो कहती हो कि :

हमें रोक सके ये जमाने में दम नहीं । हमसे जमाना है जमाने से हम नहीं ।।

बीड़ी-सिगरेटवाला बीड़ी-सिगरेट नहीं छोड़ता, शराबी शराब नहीं छोड़ता, जुआरी जुआ खेलना नहीं छोड़ता, तो वे समझदार, सत्संगी युवक-युवतियाँ गुरु के द्वार पर जाना कैसे छोड़ देते ? पास करनेवालों ने तो पाँच रूपये का जुर्माना पास कर दिया किन्तु सच्चे भक्तों ने सार्इं टेऊँराम के आश्रम में जाना नहीं छोड़ा । हमारी जिनके प्रति श्रद्धा होती है, उनके लिए हमारे चित्त में सुख की भावना होती है चाहे फिर रामभक्त शबरी हो या कृष्णभक्त मीरा । उनके हृदय में अपने आराध्य के लिए सुख देने की ही भावना थी । सार्इं टेऊँराम के शिष्य भी अपने गुरु की प्रसन्नता के लिए प्रयत्नशील रहते थे । अपने गुरु के प्रति अपने अहोभाव को प्रदर्शित करने के लिए अपनी-अपनी सामथ्र्य के अनुसार पत्र-पुष्पादि अर्पित करते थे । इसे देखकर दुष्टजनों के हृदय में बड़ी ईष्र्या उत्पन्न होती थी । अतः उन्होंने कुप्रचार करने के साथ-साथ पाँच रूपये दंड का प्रस्ताव भी पास करवा लिया । कुछ ढीले-ढाले लोग नहीं आते थे, बाकी के सार्इं टेऊँराम के प्यारों ने तो आश्रम जाना जारी ही रखा । ईश्वर के पथ के पथिक इसी प्रकार वीर होते हैं । उनके जीवन में चाहे हजार विघ्न-बाधाएँ आ जायें किन्तु वे अपने लक्ष्य से च्युत नहीं होते । अनेक अफवाहें एवं निंदाजनक बातें सुनकर भी उनका हृदय गुरुभक्ति से विचलित नहीं होता क्योंकि वे गुरुकृपा के महत्त्व को ठीक से समझते हैं, गुरु के महत्त्व को जानते हैं । अपने सद्गुरु श्री तोतापुरी महाराज में श्री रामकृष्ण परमहंस की अडिग श्रद्धा थी । एक बार किसीने आकर उनसे कहा : ‘‘तोतापुरी महाराज फलानी महिला के घर बैठकर खा रहे हैं । उन्हें आपने गुरु बनाया ?’’

रामकृष्ण : ‘‘अरे ! बकवास मत कर । मेरे गुरुदेव के प्रति एक भी अपशब्द कहा तो ठीक न होगा ।’’ ‘‘किन्तु हम तो आपका भला चाहते हैं । आप तो माँ काली के साथ बात करते थे… इतने महान होकर भी तोतापुरी को गुरु माना ! थोड़ा तो विचार करें । वे तो ऐसे ही हैं । रामकृष्ण बोल पड़े : ‘‘मेरे गुरु कलाल खाने जायें तो भी मेरे गुरु मेरे लिए तो साक्षात् नन्दराय ही हैं ।’’

यह है श्रद्धा । ऐसे लोग तर जाते हैं । बाकी के लोग आधे में ही मर जाते हैं । …तो वे सार्इं टेऊँराम के प्यारे कैसे भी करके पहुँच जाते थे अपने गुरु के द्वार पर । माता-पिता को कहीं बाहर जाना होता तब लड़का-लड़की कहीं भागकर आश्रम न चले जायें यह सोचकर माता-पिता अपने बेटों को खटिया के पाये से बाँध देते और उन्हें बरामदे में रखकर बाहर से ताला लगाकर चले जाते । फिर सत्संग के प्रेमी लड़के क्या करते… खटिया को हिला-डिलाकर तोड़ देते एवं जिस पाये से उनका हाथ बँधा होता उस बँधे पाये के साथ ही सार्इं टेऊँराम के आश्रम पहुँच जाते और सार्इं टेऊँराम से खुलवा लेते । सार्इं टेऊँराम एवं अन्य साधक उनके बंधनों को खोल देते । जब लोगों ने देखा कि ये लोग तो खटिया के पाये समेत आश्रम पहुँच जाते हैं । अब क्या करें ?

उन दुर्बुद्धियों ने फिर एक प्रस्ताव पास कर लिया कि नगर में मरनेवाले पशुओं को लाकर सार्इं टेऊँराम के आश्रम के आसपास डाल दिया जाये । नगरपालिका के लोग मरे हुए ढोरों को वहाँ फेंक जाते । कितना अत्याचार ।

किन्तु सहनशीलता के मूर्तिमंत रूप सार्इं टेऊँराम गह्ने खोदकर नमक डालकर उन पशुओं को गाड़ देते । इसमें उनके शिष्य उन्हें सहाय करते । सार्इं टेऊँराम अपने आश्रम में ही अनाज उगाते थे । जब कुप्रचारकों ने देखा कि हमारा यह दाँव भी विफल जा रहा है तो उन्होंने एक नया फरमान जारी करवा दिया कि कोई भी दुकानदार सार्इं टेऊँराम के आश्रम की कोई भी वस्तु न खरीदे अन्यथा उस पर जुर्माना किया जायेगा । जब इतने से भी सार्इं टेऊँराम की समता, सहनशीलता में कोई फर्क नहीं आया एवं उनके साधकों की श्रद्धा यथावत् देखी तो उन नराधमों ने, आश्रम जिस कुँए के जल का उपयोग करता था उसमें केरोसीन (मिट्टी का तेल) डाल दिया । क्या नीचता की पराकाष्ठा है । कितना घोर अत्याचार ! लेकिन सार्इं टेऊँराम भी पक्के थे । संत-महापुरुष कच्ची मिट्टी के थोड़े-ही होते हैं ? भगवान की छाती पर खेलने की उनकी ताकत होती है । कई बार भगवान अपने प्राण को त्यागकर भी भक्तों की, संतों की बात रख लेते हैं, जैसे, भीष्म पितामह के संकल्प को पूरा करने के लिए भगवान ने अपने हथियार न उठाने के प्रण को छोड़ दिया था ।

सार्इं टेऊँराम के कुप्रचार से एक ओर जहाँ कमजोर मनवालों की श्रद्धा डगमगाती वहीं उनके प्यारों का प्रेम उनके प्रति दिन-ब-दिन बढ़ता जाता । सार्इं टेऊँराम अपने आश्रम में एक चबूतरे पर बैठकर सत्संग करते थे । उनके पास अन्य साधु-संत भी आते थे । अतः वह चबूतरा छोटा पड़ता था । यह सोचकर उनके भक्तों ने उस चबूतरे को बड़ा बनवा दिया । बड़े चबूतरे को देखकर उनके विरोधी ईष्र्या से जल उठे एवं वहाँ के तहसीलदार को बुला लाये । उसने आकर कहा कि यह चबूतरा अनधिकृत रूप से बनाया गया है जिसके कारण सड़क छोटी हो गयी है एवं लोगों को आने-जाने में परेशानी होती है । अतः इस चबूतरे  को तोड़ देना चाहिए । यह कहकर उसने सार्इं टेऊँराम के विरुद्ध मामला दर्ज कर दिया एवं उन्हें अदालत में उपस्थित होने को कहा । किन्तु निश्चित समय पर सार्इं टेऊँराम अदालत में उपस्थित न हुए । दूसरे दिन जब वे स्नान करके तालाब से लौटे तो देखा कि चबूतरा टूटा हुआ है । संत तो सहन कर भी लेते हैं किन्तु प्रकृति से उनका विरोध सहा नहीं जाता । कुछ समय के पश्चात् उस तहसीलदार का स्थानांतरण दूसरी जगह हो गया । उसकी जगह दूसरा तहसीलदार आया वह बड़ा श्रद्धालु और भक्त था । अतः उसने पुनः  वह चबूतरा बनवा दिया । जिन्होंने सार्इं टेऊँराम को अपमानित करने की कोशिश की, लज्जित और बदनाम करने की कोशिश की, उनकी तो कोई दाल नहीं गली । जिन्होंने सार्इं टेऊँराम को निन्दित करने का प्रयास किया, उनका कुप्रचार करके उनकी कीर्ति को कलंकित करने का प्रयास किया । उनमें से किसीका बेटा मर गया तो किसीको लकवा हो गया, कोई पागल हो गया तो कोई पुत्रसुख से वंचित् हो गया और न जाने कितने अशान्ति की आग में जलते रहे । वे आज न जाने किस नरक में होंगे ? लेकिन सार्इं टेऊँराम के पावन यश की सौरभ आज भी चतुर्दिक प्रसारित होकर अनेक दिलों को पावन कर रही है । ऐसे ही संत श्री आशारामजी बापू का यश आनेवाले समय में ऐसा फैलेगा की पूर्व के सभी संतों-महापुरुषों-अवतारों के यश को पीछे छोड़ देगा | पूज्य संत श्री आशारामजी बापू के भक्तों-साधकों-शिष्यों को जो दिव्य अनुभूतियाँ हुई है उनसे अभी दुनिया बेखबर है, जब वो समाचार मीडिया के द्वारा लोगो के सामने आयेगा, तब लोग दांतों तले उंगलिया दबा देंगे और उनका सिर पूज्य बापूजी के चरणों में आदर से नत-मस्तक हो जायेगा | हरी ॐ

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Saint and People

काशी सुमेरु पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य श्री स्वामी नरेन्द्रानंद सरस्वतीजी महाराज


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षड्यंत्रों के तहत हिन्दू समाज पर अन्याय, अत्याचार बंद किया जाना चाहिए । संतों के सम्मान, स्वाभिमान की रक्षा होनी चाहिए ।

अगर संतों को जेल में डालकर बदनाम करने का षड्यंत्र होता रहा तो भारत की अस्मिता, भारत की संस्कृति सुरक्षित नहीं रह पायेगी । इसे सुरक्षित रखने के लिए सबको एकजुट हो के प्रयास करना होगा । और वह दिन दूर नहीं कि आशारामजी बापू आप सब लोगों के बीच में आयेंगे, आरोपों से बरी होंगे और राष्ट्रहित, समाजहित होगा ।

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asaram bapuji

Thanks To All By Asaramji Bapu


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Thank you paidmedia for keeping Sant Asharamji Bapu in news with your nonsense 24/7 coverage, debates & witch hunts.
Paid media sees every positive news in negative way and we see every negative news in positive way. This is called Bapuji’s way. Due to your negative campaign,
Every 1000th of second, we remember our Beloved Bapuji.
Every second, God name is at our tongue. Ram, Ram, Ram, Ram, Ram…..
You made us united and awakened.
You inspired us to do more Good publicity.
With Vigor you tried to defame our National saints, with double force we will spread the glory of our saints not only in India but all over the world.
We finally got rid of your news channel which saved our pocket and restored our internal peace.
You showed us that how low you can go in selling news.
People came to know the credibility of your news channels.
………
List will go on.
How’s the magic has not been understood !
Keep doing your negative campaign and make Pujya Bapuji more popular. In your world controversy works. In spiritual world, great resolution works. We are giving you open challenge that do your work sincerely and keep us on our toes all the time. Battle already begun. Truth prevails. Om hrim Om. Jai Sant Asharamji Bapu.
Do you have any other positive points to add, please put them in comment box.

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Christian missionaries in the eyes of Mahatma Gandhi (महात्मा गाँधी की नजर में ईसाई मिशनरियाँ)


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 लेखक : डॉ. कमल किशोर गोयनका

ईसाई मिशनरियों का विचार था कि गाँधी को ईसाई बना लिया जाए तो भारत को ईसाई देश बनाना बहुत आसान हो जायेगा ।

दक्षिण अफ्रीका में कई बार ऐसे प्रयत्न हुए और भारत आने पर कई पादरियों, ईसाई मिशनरियों तथा ८० वर्ष के ए. डब्ल्यू. बेकर, ८६ वर्ष की एमिली किनेर्डके जैसे अनेक ईसाइयों ने उन्हें ईसाई बनाने के लिए प्रेरित किया और यहाँ तक कहा कि : ‘यदि आपने ईसा मसीह को स्वीकार नहीं किया तो आपका उद्धार नहीं होगा ।’

(‘हरिजन’ : ४ अगस्त, १९४०)

गाँधीजी  ईसा  मसीह  और  उनके  जीवन  तथा ‘बाइबिल’ एवं ईसाई सिद्धान्तों की परम्परागत ईसाई व्याख्या को अस्वीकार करते हुए अपनी व्याख्या प्रस्तुत करते थे । उन्होंने १६ जून, १९२७ को डब्ल्यू. बी. स्टोवर को पत्र में लिखा भी था कि : ‘‘मैं ‘बाइबिल’ या ‘ईसा’ के जीवन की परम्परागत व्याख्या को स्वीकार नहीं करता हूँ ।’’

गाँधीजी  ने  प्रमुख  रूप  से  ईसा  के  ‘देवत्व’  तथा ‘अवतार’ स्वरूप का खंडन किया ।

उन्होंने आर. ए. ह्यूम को १३ फरवरी, १९२६ को पत्र में लिखा : ‘‘मैं ईसा मसीह को ईश्वर का एकमात्र पुत्र या ईश्वर का अवतार नहीं मानता, लेकिन मानव जाति के एक शिक्षक के रूप में उनके प्रति मेरी बड़ी श्रद्धा है ।’’

गाँधीजी ने अनेक बार कहा और लिखा कि वे ईसा को अन्य महात्माओं और शिक्षकों की तरह ‘मानव प्राणी’ ही मानते हैं । ऐसे शिक्षक के रूप में वे ‘महान’  थे परन्तु ‘महानतम’ नहीं थे ।   (गाँधी वाङ्मय : खंड ३४, पृ. ११)

गाँधीजी ने ईसा को ‘ईश्वर का एकमात्र पुत्र’ होने की ईसाई धारणा का भी खंडन किया और ४ अगस्त १९४० को ‘हरिजन’ में लिखा : ‘‘वे ईश्वर के एक पुत्र भर थे, चाहे हम सबसे कितने ही पवित्र क्यों न रहे हों । परन्तु हममें से हर एक ईश्वर का पुत्र है और हर कोई वही काम करने की क्षमता रखता है जो ईसा मसीह ने कर दिखाया था, बशर्तेकि हम अपने भीतर विद्यमान दिव्यत्व को व्यक्त करने की कोशिश करें।’’ इसके साथ गाँधीजी ने ईसा के चमत्कारों का सतर्क भाषा में खंडन किया ।

महात्मा गाँधी ने ईसाई अन्धविश्वासों का अनेक रूपों में खंडन किया । ‘ईसा मुक्ति के लिए आवश्यक हैं…’ उनकी इस मान्यता का उन्होंने अस्वीकार किया ।

(११ दिसम्बर, १९२७ का पत्र)

उन्होंने ईसा द्वारा सारे पापों को धो डालने की बात का भी सतर्क खंडन किया ।  (‘यंग इंडिया’ : २२ दिसम्बर, १९२७)

गाँधीजी ने यह भी अस्वीकार किया कि ‘धर्मांतरण ईश्वरीय कार्य है ।’ उन्होंने ए. ए. पॉल को उत्तर देते हुए ‘हरिजन’ के २८ दिसम्बर, १९३५ के अंक में लिखा कि ईसाई धर्म-प्रचारकों का यह कहना कि : ‘वे लोगों को ईश्वर के पक्ष में खींच रहे हैं और ईश्वरीय कार्य कर रहे हैं…’ तो मनुष्य ने यह कार्य उसके हाथों से क्यों ले लिया है ? ईश्वर से कोई कार्य छीननेवाला मनुष्य कौन होता है तथा क्या सर्वशक्तिमान् ईश्वर इतना असहाय है कि वह मनुष्यों को अपनी ओर नहीं खींच सकता ?

(गाँधी वाङ्मय : खंड ६१, पृ. ८७ तथा ४९४)

गाँधीजी ने लंदन में ८ अक्टूबर, १९३१ को ग्रेट ब्रिटेन और आयरलैंड की मिशनरी संस्थाओं के सम्मेलन में ईसाइयों के सम्मुख कहा कि ‘गॉड के रूप में ईश्वर की, जो सबका पिता है, पूजा करना मेरे लिए उचित नहीं होगा । यह नाम मुझ पर कोई प्रभाव नहीं डालता, पर जब मैं ईश्वर को ‘राम’ के रूप में सोचता हूँ तो वह मुझे पुलकित कर देता है । ईश्वर को ‘गॉड’ के रूप में सोचने से मुझमें वह भावावेश नहीं आता जो ‘राम’ के नाम से आता है । उसमें कितनी कविता है ! मैं जानता हूँ कि मेरे पूर्वजों ने उसे ‘राम’ के रूप में ही जाना है । वे राम के द्वारा ही ऊपर उठे हैं और मैं जब राम का नाम लेता हूँ तो उसी शक्ति से ऊपर उठता हूँ । मेरे लिए ‘गॉड’ नाम का प्रयोग, जैसा कि वह ‘बाइबिल’ में प्रयुक्त हुआ है, सम्भव नहीं होगा । उसके द्वारा सत्य की ओर मेरा उठना मुझे सम्भव नहीं लगता । इसलिए  मेरी  समूची  आत्मा  आपकी  इस  शिक्षा  को अस्वीकार करती है कि ‘राम’ मेरा ईश्वर नहीं है ।’

(गाँधी वाङ्मय : खंड ४८, पृ. १४१)

महात्मा गाँधी ने २ मई, १९३३ को पं. जवाहरलाल नेहरू को पत्र में लिखा : ‘‘हिन्दुत्व के द्वारा मैं ईसाई, इस्लाम और कई दूसरे धर्मों से प्रेम करता हूँ । यह छीन लिया जाये तो मेरे पास रह ही क्या जाता है ?’’ …और इसीलिए वे हिन्दू धर्म की रक्षा करना चाहते हैं । वे स्पष्ट कहते हैं कि : ‘‘हिन्दू धर्म की सेवा और हिन्दू धर्म की रक्षा को छोड़कर मेरी कोई दूसरी प्रवृत्ति ही नहीं है ।’’

(गाँधी वाङ्मय : खंड ३७, पृ. १००)

गाँधीजी एक और तर्क देते हैं । वे कहते हैं कि : ‘‘धर्म ऐसी वस्तु नहीं जो वस्त्र की तरह अपनी सुविधा के लिए बदला जा सके । धर्म के लिए तो मनुष्य विवाह, घर-संसार तथा देश तक को छोड़ देता है ।’’

(मणिलाल गाँधी को लिखे पत्र से, ३ अप्रैल, १९२६)

ईसाई मिशनरियों का यह तर्क था कि वे भारत को शिक्षित, संस्कारी तथा धार्मिक बनाना चाहते हैं, तो गाँधीजी ने इन मिशनरियों से कहा कि : ‘‘जो भारतवर्ष का धर्मपरिवर्तन करना चाहते हैं, उनसे यही कहा जा सकता है कि : हकीमजी पहले अपना इलाज कीजिए न ?’’

(‘यंग इंडिया’ : २३ अप्रैल, १९३१)

गाँधीजी आगे कहते हैं कि : ‘‘भारत को कुछ सिखाने से पहले यहाँ से कुछ सीखना, कुछ ग्रहण करना होगा ।’’       (‘यंग इंडिया’ : ११ अगस्त, १९२७)

‘क्या मनुष्य का धर्मान्तरण हो सकता है ?’ महात्मा गाँधी ने अनेक बार इस प्रश्न का भी उत्तर दिया था । उनका मत था कि यह सम्भव नहीं है, क्योंकि कोई भी पादरी  या  धर्म-प्रचारक  नये  अनुयायी  को  यह  कैसे बतलायेगा कि ‘बाइबिल’ का वह अर्थ ले जो वह स्वयं लेता है ? कोई भी पादरी या मिशनरी ‘बाइबिल’ से जो प्रकाश स्वयं लेता है, उसे किसी भी दूसरे मनुष्य के हृदय में शब्दों के द्वारा उतारना सम्भव नहीं है ।’’

(‘हरिजन’ : १२ दिसम्बर, १९३६)

गाँधीजी कई बार नये बने ईसाइयों की दुश्चरित्रता तथा मिशनरियों के कुकृत्यों का उल्लेख करते हैं । वे अपनी युवावस्था की एक घटना की चर्चा करते हुए कहते हैं :

‘‘मुझे याद है, जब मैं नौजवान था उस समय एक हिन्दू ईसाई बन गया था । शहर भर जानता था कि नवीन धर्म में दीक्षित होने के बाद वह संस्कारी हिन्दू ईसा के नाम पर शराब पीने लगा, गोमांस खाने लगा और उसने अपना भारतीय लिबास छोड़ दिया । आगे चलकर मुझे मालूम हुआ, मेरे अनेक मिशनरी मित्र तो यही कहते हैं कि अपने धर्म को छोड़नेवाला ऐसा व्यक्ति बन्धन से छूटकर मुक्ति और दारिद्र्य से छूटकर समृद्धि प्राप्त करता है ।’’

(‘यंग इंडिया’ : २० अगस्त, १९२५)

वे ‘हरिजन’, ११ मई, १९३५ में लिखते हैं :

‘‘अभी   कुछ   दिन   हुए,   एक   मिशनरी   एक दुर्भिक्षपीड़ित अंचल   में   पैसा   लेकर   पहुँच   गया । अकालपीड़ितों को उसने पैसा बाँटा, उन्हें ईसाई बनाया, फिर उनका मंदिर हथिया लिया और उसे तुड़वा डाला । यह अत्याचार नहीं तो क्या है ? जिन हिन्दुओं ने ईसाई धर्म ग्रहण कर लिया था, उनका अधिकार तो उस मंदिर पर रहा नहीं था और ईसाई मिशनरी का भी उस पर कोई हक नहीं था, पर वह मिशनरी वहाँ पहुँचता है और जो कुछ ही समय पहले यह मानते थे कि उस मंदिर में ईश्वर का वास है, उन्हीं के हाथ से उसे तुड़वा डालता है ।’’

(गाँधी वाङ्मय : खंड ६१, पृ. ४९)

गाँधीजी ईसाई धर्म के एक और ‘व्यंग्य चित्र’ की ओर मिशनरियों का ध्यान आकर्षित करते हैं कि यदि मिशनरियों की संख्या ब‹ढती है तो हरिजनों में आपस में ही ल‹डाई-झग‹डे और खून-खराबे की घटनाएँ बढ़ेंगी ।

गाँधीजी इसी कारण ईसाइयों के धर्मान्तरण को ‘अशोभन’,   ‘दूषित’,   ‘हानिकारक’,   ‘संदेह   एवं संघर्षपूर्ण’,   ‘अध्यात्मविहीन’,   ‘भ्रष्ट   करनेवाला’, ‘सामाजिक ढाँचे को तोड़नेवाला’ तथा ‘प्रलोभनों से पूर्ण’ कहते हैं । गाँधीजी का सम्पूर्ण वाङ्मय प‹ढ जायें, ऐसी ही कटु आलोचनाओं से भरा प‹डा है ।

गाँधीजी ने ईसाई मिशनरियों द्वारा चिकित्सा एवं शिक्षा के क्षेत्र में किये गये कार्यों की कई बार प्रशंसा भी की, किन्तु उन्होंने  इसके  मूल  में  विद्यमान  प्रलोभनों  तथा  उनके धर्मपरिवर्तन के उद्देश्य पर गहरी चोट करते हुए एक मिशनरी से कहा : ‘‘जब तक आप अपनी शिक्षा और चिकित्सा संस्थानों से धर्मपरिवर्तन के पहलू को हटा नहीं देते, तब तक उनका मूल्य ही क्या है ? मिशन स्कूलों और कॉलेजों में प‹ढनेवाले छात्रों को ‘बाइबिल’ की कक्षाओं में भाग लेने को बाध्य क्यों किया जाता है या उनसे इसकी अपेक्षा ही क्यों की जाती है ? यदि उनके लिए ईसा के संदेशों को समझना जरूरी है तो बुद्ध और मुहम्मद के संदेश को समझना जरूरी क्यों नहीं है ? धर्म की शिक्षा के लिए शिक्षा का प्रलोभन क्यों देना चाहिए ?’’ (‘हरिजन’ : १७ अप्रैल, १९३७)

चिकित्सा-क्षेत्र में गाँधीजी ने ईसाइयों द्वारा कोढ़ियों की सेवा करने की भी तारीफ की, लेकिन यह भी कहा कि : ‘‘ये ईसाई सारे रोगियों और सारे सहयोगियों से यह अपेक्षा करते हैं कि वे धर्मपरिवर्तन करके ईसाई बन जायें ।’’                               (‘हरिजन’ : २५ फरवरी, १९३९)

गाँधीजी इन प्रलोभनों की धर्मनीति से व्याकुल थे । वे  जानते  थे  कि  अमेरिका  तथा  इंग्लैण्ड  से  ईसाई मिशनरियों के पास खूब धन आता है और उसका उपयोग मूलतः धर्मपरिवर्तन के लिए ही होता है । अतः उन्होंने स्पष्ट कहा कि : ‘‘आप ‘ईश्वर’ और ‘अर्थ-पिशाच’ दोनों की सेवा एक साथ नहीं कर सकते ।’’

(‘यंग इंडिया’ : ८ दिसम्बर, १९२७)

इसके दस वर्ष के बाद गाँधीजी जॉन आर. मॉट से यही बात कहते हुए बोले कि : ‘‘मेरा निश्चित मत है कि अमेरिका  और  इंग्लैण्ड  मिशनरी  संस्थाओं  के  निमित्त जितना पैसा देता है, उससे लाभ की अपेक्षा हानि ही अधिक हुई है । ईश्वर और धनासुर (मेमन) को एक साथ नहीं साधा जा सकता । मुझे तो ऐसी आशंका है कि भारत की सेवा करने के लिए धनासुर को ही भेजा गया है, ईश्वर पीछे रह गया है । परिणामतः वह एक-न-एक दिन उसका प्रतिशोध अवश्य करेगा ।’’     (‘हरिजन’ : २६ दिसम्बर, १९३६)

महात्मा गाँधी राष्ट्रीय और मानवीय दोनों ही दृष्टियों से ईसाई मिशनरियों से अपनी रीति-नीति, आचरण-व्यवहार तथा सिद्धान्त-कल्पनाओं को बदलने तथा विवेकसम्मत बनाने का आह्वान करते हैं । वे स्पष्ट कहते हैं कि परोपकार का काम करो, धर्मान्तरण बन्द करो ।

(‘हिन्दू’ : २८ फरवरी, १९१६)

गाँधीजी १४ जुलाई १९२७ को ‘यंग इंडिया’ में लिखते हैं कि : ‘‘मिशनरियों को अपना रवैया बदलना होगा । आज वे लोगों से कहते हैं कि उनके लिए ‘बाइबिल’ और ईसाई धर्म को छोड़कर मुक्ति का और कोई मार्ग नहीं है । अन्य धर्मों को तुच्छ बताना तथा अपने धर्म को मोक्ष का एकमात्र मार्ग बताना उनकी आम रीति हो गयी है। इस दृष्टिकोण में आमूल परिवर्तन होना चाहिए ।’’

एक ईसाई मिशनरी से बातचीत में उन्होंने कहा :

‘‘अगर मेरे हाथ में सत्ता हो और मैं कानून बना सकूँ तो मैं धर्मान्तरण का यह सारा कारोबार ही बन्द करा दूँ । इससे वर्ग-वर्ग के बीच निश्चय ही निरर्थक कलह और मिशनरियों के बीच बेकार का द्वेष ब‹ढता है । यों किसी भी राष्ट्र के लोग सेवाभाव से आयें तो मैं स्वागत करूँगा । हिन्दू कुटुम्बों में मिशनरी के प्रवेश से वेशभूषा, रीति-रिवाज, भाषा और खान-पान तक में परिवर्तन हो गया है और इन सबका नतीजा यह हुआ है कि सुन्दर हरे-भरे कुटुम्ब छिन्न-भिन्न हो गये हैं ।’’  (‘हरिजन’ : ११ मई, १९३५)

महात्मा गाँधी जैसे सहिष्णु एवं विवेकी व्यक्ति भी स्वतंत्र भारत में कानून बनाकर ईसाई धर्मान्तरण पर प्रतिबन्ध का प्रस्ताव करते हैं और निस्संकोच अपना संकल्प ईसाइयों के सम्मुख रखते हैं ।

गाँधीजी के उत्तराधिकारियों जैसे पंडित जवाहरलाल नेहरू आदि ने उनके विचारों की उपेक्षा की और उसका दुःखद परिणाम आज सामने है । देश के कुछ प्रदेशों में ईसाईकरण ने सुरक्षा और एकता के लिए समस्याएँ उत्पन्न कर दी हैं और अब वे पंजाब, हिमाचल प्रदेश आदि नये स्थानों पर भी गिरजाघर बनाने जा रहे हैं। विदेशी धन का प्रवाह पहले से कई गुना ब‹ढ गया है और ईसाई मिशनरियाँ आक्रामक बनती जा रही हैं । गाँधीजी ने अपने विवेक, दूरदृष्टि तथा मानव-प्रेम के कारण ईसाइयों के उद्देश्यों को पहचाना था तथा उनके बीच जाकर उन्हें अधार्मिक तथा अमानवीय कार्य करने से रोकने का भी प्रयत्न किया था । उनके इस राष्ट्रीय कार्य को अब हमें क्रियान्वित करना है । ईसाई मिशनरियों को धर्मान्तरण से तत्काल रोकना होगा । हमारी सरकार को इसे गम्भीरता से लेना चाहिए, अन्यथा गाँधीजी के अनुसार संघर्ष और रक्तपात को रोकना असम्भव हो सकता है ।

गाँधीजी की कामना थी कि आदिवासियों (भील जाति) के मंदिर में राम की मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा हो, ईसा मसीह की नहीं, क्योंकि इससे ही इन जातियों में नये प्राणों का संचार होगा । (‘नवजीवन’ : १८ अप्रैल, १९३६)

राष्ट्र के मानवमंदिर में भी स्वदेशी ईश्वर की प्राण-प्रतिष्ठा से ही हमारा कल्याण हो सकता है और यह ‘हरा-भरा’ देश ‘छिन्न-भिन्न’ होने से बचाया जा सकता है ।

विशेष  सूचना : कोई भी  इस  लेख  के  परचे छपवाकर देश को तोड़नेवालों से भारत देश की रक्षा कर सकता है ।

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Festival

Deepawali – The King of Festivals


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What a marvellous system Indian culture has set up! Through the regimen of festivals, Rishis have laid down the path of realization of the Ultimate Truth and have taught us how we can joyfully proceed towards the Eternal with the help of the transient body, fugitive resources, fleeting time and short-lived relationships. In other religions, there are six or seven festivals but in Indian culture, there are about forty festivals and the crowning festival is the festival of Deepawali. Deepawali is a bouquet of five festivals – Dhan-Teras (the thirteenth day of the dark half of Kartik), Kali (dark) Chaudas (the fourteenth day of the dark half of Kartik), Deepawali proper, Indian New Year day and bhai dooj (a festival when sisters apply tilak on the forehead of their brothers).

Dhan-Teras is the day when we worship Mother Lakshmi and pray for wealth – not only material wealth but also spiritual wealth – that of inner peace, inner love.

That wealth alone is real wealth, which is useful for God-realization, whether the wealth is in the form of money, cows, elephants, intellectual wealth or the wealth of public support. On the Dhan-Teras day, think of the spiritual wealth and spend some part of your wealth for good causes so as to attain Self-Bliss. The wealth, which is unjustly earned, inevitably ruins one’s family and one’s children. Therefore, guard against filthy lucre; take care not to earn wealth by corrupt means. Wealth has sixty four vices as against sixteen virtues. To purge the wealth of vices, Mother Lakshmi, the goddess of wealth, is worshipped on the Dhan-Teras day as the consort of Lord Vishnu and resolution is made to use the wealth for noble purposes.

Wealth brings in its wake, desire, anger, greed, luxuriousness and egotism. One indulges in things one should not. But there are virtues as well in wealth. If one has wealth, he can make offerings to manes; he can serve his parents and his religion; one can also use one’s wealth in furthering Guru’s divine works and in propagating spiritual knowledge and study of scriptures. Thus one should steer clear of vices and should cultivate virtues. This way by guarding against the vices of wealth and revealing it’s positives, the wealth will become such as to bring happiness and joy. This is what is meant by worshipping Mother Mahalakshmi, the Divine wealth.

We worship Mother Lakshmi in the course of Deepawali festival so that our wealth is converted to divine wealth i.e. Lakshmi, and we get sanctified by the grace of the Indweller Lord Vishnu. The wealth used for great and noble purposes is termed Lakshmi and if wealth brings worry and maliciousness, it is just affluence. Affluence is accompanied by the fear of insecurity but Mother Lakshmi is accompanied by Lord Vishnu Himself. The wealth is the same but we adore it as Mahalakshmi by performing religious purificatory rites.

Next comes Narak (hell) Chaturdashi. It is also called Kali (dark) Chaudas or mini-Deepawali. Mini-Deepawali refers to petty joy. If one is energetic and free from carelessness, one will get some joy but absolute joy can come only when the lamp of Knowledge is lit.

Lord Krishna killed the demon, Narakasur on this day. We too should resolve to bring the Light in our lives and to weed out the hellish thoughts of pessimism, listlessness, malice, worry and escapism etc. and also the vices of laziness, carelessness, negligence and indulging in futile pursuits. Keeping vigil and doing Japa in the night of Narak Chaturdashi is immensely helpful in turning the Chit-Shakti i.e. energy lying dormant towards the Supreme Being. Rubbing oil on the body is otherwise prohibited in the month of Kartika but rubbing sesame-oil on the body and taking a bath thereafter on the Narak Chaturdashi day is highly beneficial.

Next comes Deepawali proper, the festival of lighting lamps and illuminating one’s life with knowledge. Light the lamp of Knowledge in your heart as well. If the house is lit with lamps but the heart is full of darkness of ignorance, one will always keep on complaining, ‘such and such thing has happened; I am miserable…’ Such thoughts actually make one miserable. On the other hand, one who thinks, ‘I am born to trample troubles and to know my Real Self’ and remains engaged in good deeds with equanimity, comes out with flying colours. So banish the darkness from your heart and live in the Light of Knowledge. Everything will pass away; there is no need to get fixated to any situation and make oneself miserable or worried nor is it advisable to take pride in anything. The river of the world is flowing; just keep swimming across it finally making your way to the Lord.

Merchants settle their old accounts on Deepawali. Similarly, we should settle our old disputes with the help of satsang that cures the body of diseases, eliminates the ignorance of the heart and eradicates the hatred from the mind. If somebody is able to do so, what better day can be there in his life!

People consume and distribute sweetmeats on Deepawali day. But the spiritual Deepawali is celebrated by having the sweetmeats of Self-bliss, by making one’s nature amicable and by purging one’s heart of all its bitterness.

You will take only some joy in lighting lamps on Deepawali day. But the moths will enjoy the lights much more, only to get burnt to death in a little while. Taking pleasure in sense-enjoyments is the way of moths; imbibing the joy of Self-bliss, of equanimity, lighting the lamp of Knowledge, bringing out the supreme Love and the supreme Bliss, is the spiritual Deepawali, the real Deepawali.

Do light earthern lamps in your house on this day, but if there is a poor neighbour, do care for him as well. Light a few earthern lamps in his house too. Distribute clothes and sweetmeats among poor children. Shun all pride and treat even the meanest of men with love and affection. One who thinks for the welfare of others and does good to others actually does good to himself. The Vedas pronounce, ‘One who aptly serves others becomes cheerful himself; he becomes exalted and distinguished too.’

Then comes the Hindu New Year day. Deepawali is the last day of the year and the next day, the first lunar day of Margshirsha, is the first day of the year (according to Gujarat Vikram Samvat). This is the day when you should turn over a new leaf in the diary of your life. On this day, Lord Vishnu in the Vamana (pigmy) incarnation took away all that the Demon King, Bali possessed. Bali too had the wise sense of giving away all to Him, Who is the Supreme Lord of the Universe and the proprietor of everything that exists therein, and thereby was successful in pleasing Him.

In the Mahabharata, Bhishma says to Yudhishthir, “Yudhishthir! One who remains cheerful on New Year day is going to be cheerful throughout the year and the one who is gloomy on this day will remain so all through the year.”

Next comes Yama (the god of death) Dwitiya (second lunar day) or Bhai Dooj. This is the festival meant to awaken divine feelings in the hearts of brother and sister, towards each other. On this day Yamuna had served a meal to her brother Yama, the God of death at her home. If a brother takes a meal prepared by his sister on this day, he is saved from punishment at the hands of Yama. No sister would like her brother to be mired in this phenomenal world, to be beset with desire, anger, greed, delusion, egotism and sin and to undergo the grind of the cycle of birth and death. Therefore, the sister applies tilak on her brother’s forehead with the wish that her brother’s third eye (of Knowledge) should be opened and he should live in the Light of Knowledge.

‘You light a series of lamps outside;

Light the lamp in your heart someday.

You have decorated your house with flowers;

How about cleaning the mind someday?

Even if he gets all the wealth of the world,

The greedy one will remain as poor as before.

Wealth earned honestly alone is prosperity

Spend it then in noble endeavours.’

Deepawali is called the queen of festivals. It is celebrated over a period of five days with great joy. From the point of view of disciples, if one gets the good fortune of lighting the lamp of Knowledge within, by virtue of Darshan of and association with Sadguru and through satsang, this great festival can be called without exaggeration the Emperor of festivals.

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