Pranayam

संस्कृति-रक्षक प्राणायाम


दूरद्रष्टा पूज्य बापूजी द्वारा ९ वर्ष पहले ‘संस्कृति-रक्षार्थ’ बताया गया सरल प्रयोग,

जो साथ में देता है शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक प्रसन्नता भी

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संत सताये तीनों जायें, तेज बल और वंश ।

ऐसे ऐसे कई गये, रावण कौरव और कंस ।।

भारत के सभी हितैषियों को एकजुट होना पड़ेगा । भले आपसी कोई मतभेद हो किन्तु संस्कृति की रक्षा में हम सब एक हो जायें । कुछ लोग किसीको भी मोहरा बना के दबाव डालकर हिन्दू संतों और हिन्दू संस्कृति को उखाड़ना चाहें तो हिन्दू अपनी संस्कृति को उखड़ने नहीं देगा । वे लोग मेरे दैवी कार्य में विघ्न डालने के लिए कई बार क्या-क्या षड्यंत्र कर लेते हैं । लेकिन मैं इन सबको सहता हुआ भी संस्कृति के लिए काम किये जा रहा हूँ । स्वामी विवेकानंदजी ने कहा : “धरती पर से हिन्दू धर्म गया तो सत्य गया, शांति गयी, उदारता गयी, सहानुभूति गयी, सज्जनता गयी ।’’

गहरा श्वास लेकर ॐकार का जप करें, आखिर में ‘म’ को घंटनाद की नार्इं गूँजने दें । ऐसे ११ प्राणायाम फेफड़ो की शक्ति तो बढ़ायेंगे, रोगप्रतिकारक शक्ति तो बढ़ायेंगे साथ ही वातावरण में भी भारतीय संस्कृति की रक्षा में सफल होने की शक्तिअर्जित करने का आपके द्वारा महायज्ञ होगा ।

मुझे आपके रुपये-पैसे नहीं चाहिए, बल्कि भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए आप रोज ११ प्राणायाम करके अपना संकल्प वातावरण में फेंको । इसमें विश्वमानव का मंगल है । ॐ… ॐ… ॐ… हो सके तो सुबह ४ से ५ बजे के बीच करें । यह स्वास्थ्य के लिए और सभी प्रकार से बलप्रद होगा । यदि इस समय न कर पायें तो किसी भी समय करें पर करें अवश्य । कम-से-कम ११ प्राणायाम करें, ज्यादा कितने भी कर सकते हैं । अधिकस्य अधिकं फलम् ।

हम चाहते हैं सबका मंगल हो । हम तो यह भी चाहते हैं कि दुर्जनों को भगवान जल्दी सद्बुद्धि दे, नहीं तो समाज सद्बुद्धि दे । जो जिस पार्टी में है… पद का महत्त्व न समझो, अपनी संस्कृति का महत्त्व समझो । पद आज है, कल नहीं है लेकिन संस्कृति तो सदियों से तुम्हारी सेवा करती आ रही है । ॐ का गुंजन करो, गुलामी के संस्कार काटो !

दुर्बल जो करता है वह निष्फल चला जाता है और लानत पाता है । सबल जो कहता है वह हो जाता है और उसका जयघोष होता है । आप सबल बनो !

नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः ।

(मुण्डकोपनिषद् : ३.२.४)

विधि : सुबह उठकर थोड़ी देर शांत हो जाओ, भगवान के ध्यान में बैठो । ॐ शांति… ॐ आनंद… करते-करते आनंद और शांति में शांत हो जायें । सुबह की शांति प्रसाद की जननी है, सद्बुद्धि की जननी है । फिर स्नान आदि करके खूब श्वास भरो, त्रिबंध करो – पेट को अंदर खींचो, गुदाद्वार को अंदर सिकोड़ लो, ठुड्डी को छाती से लगा लो । मन में संस्कृति-रक्षा का संकल्प दोहराकर भगवान का नाम जपते हुए सवा से डेढ़ मिनट श्वास रोके रखो । फिर श्वास छोड़ो । श्वास लेते और छोड़ते समय ॐकार का मानसिक जप करते रहें । फिर ५० सेकंड से सवा मिनट तक श्वास बाहर रोक सकते हैं । मन में ॐकार या भगवन्नाम का जप चालू रखो । शरीर में जो भी आम (कच्चा, अपचित रस) होगा, वायुदोष होगा, वह खिंच के जठर में स्वाहा हो जायेगा । वर्तमान की अथवा आनेवाली बीमारियों की जड़े स्वाहा होती जायेंगी । आपकी सुबह मंगलमय होगी और आपके द्वारा मंगलकारी परमात्मा मंगलमय कार्य करवायेगा । आपका शरीर और मन निरोग तथा बलवान बन के रहेगा ।

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Mahapurush

“भगवान के अवतार” आसारामजी बापू


asaram bapu

Asaram Bapuji

हर कारक पुरुष का अवतार लेनेके पीछे एक हेतु होता है. भगवान कृष्ण सिर्फ ग्वाल गोपियों को मक्खन खिलाने और अधरामृत का पान कराने ही नहीं आये थे. असुरों के त्रास से समाज की रक्षा करना भी उनका एक मिशन था जिस के लिए वे वृन्दावन छोड़कर मथुरा गये.

 गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अध्याय ४ के ७ वे श्लोक में कहा है, “जब जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है तब तब ही मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात साकार रूप से लोगों  के सामने प्रगट होता हूँ.”

इसमें संदेह होता है कि भगवान के अवतार तो कोई १० बताते है कोई २४ बताते है. तो क्या एक चतुर्युगी याने ४३२०००० वर्ष में सिर्फ १० या २४ बार ही धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है? और भगवान ने यह नहीं कहा कि कितनी हानि होनेपर वे प्रकट होते है. तो अन्य समय में धर्म की रक्षा के लिए भगवान क्यों नहीं आते?

इसका समाधान भी गीता से मिलता है. ७वे अध्याय के १७ वे श्लोक में भगवान कहते है, “ये सभी उदार है परन्तु ज्ञानी तो साक्षात् मेरा स्वरूप ही है– ऐसा मेरा मत है. उपरोक्त दोनों श्लोकों को मिलाने पर यह स्पष्ट होता है कि अन्य समय में जब जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है तब तब भगवान ही ज्ञानी महापुरुषों के रूप में प्रकट होकर धर्म की रक्षा करते है. ब्रह्मज्ञानी गुरु के तथाकथित शिष्य अपने गुरु को अवतारी महापुरुष मानकर गर्व तो अनुभव करते है पर जब वे अवतार के अनुरूप दैवी कार्य करते है, धर्म की रक्षा के लिए कष्ट सहते है तो वे शिष्य दुखी हो जाते है. लेकिन जो सच्चे शिष्य होते है वे गुरु के प्रत्येक कार्य को ईश्वर का कार्य समझते है और उसमे अपना सर्वस्व न्योच्छावर करने को तैयार रहते है. वे गुरु के दैवी कार्य में अपना सहयोग देते है, कष्टों को सहते है और अपना कर्तव्य निभाते है.

किसी अवतार ने किसी युग में असुरों का संहार कर दिया तो वे नष्ट नहीं हुए. उनका पुनर्जन्म होता है और वे लोगों का खून चूसने का कार्य करते ही रहते है. उनका सामर्थ्य बढ़ता जाता है और उनके रूप बदल जाते है. कलियुग में खून चूसने का काम भ्रष्टाचारी शासकों और मल्टीनेशनल कंपनियों के द्वारा ज्यादा होता है. धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि का काम विधर्मी असुर करते है. उन से धर्म की रक्षा करने का दैवी कार्य करनेवाले भगवान के नित्य अवतार सदगुरु होते है. क्या आपको मालूम है कि कलियुग के कितने असुरों से वे धर्म की रक्षा कर रहे है?

सनातन धर्म को नष्ट करनेवाले कम्युनिस्ट, मुस्लिम, ईसाई मिशनरियां और बहु राष्ट्रीय कंपनियों के रूप में इस युग में विद्यमान असुर जितने बलवान है, अजर अमर है, वैसे असुर किसी युग में नहीं थे. सूना है कि रावण का पुत्र इन्द्रजीत मायावी था. आकाश में छुपकर शत्रु पर वार करता था. लेकिन आकाश में सामने तो रहता था. कम्युनिस्ट तो सामने आये बिना,अपने देश में बैठे बैठे हमारी संस्कृति की आधारशिला को तोड़ चुके है. हमारे ही लोगों के द्वारा हमारा स्वाभिमान और मनोबल नष्ट करके हिंदुओं को हिंदुत्व से विहीन बना रहे है जिसका किसी हिंदू को अनुमान भी नहीं हो सकता. उनके हीKGB के agent Yuri Bezmenov ने भारत में रहकर यह काम किया था. जब उसका हृदय परिवर्तन हुआ तब उसने यह रहस्य खोले तब हमें पता चला. उनकी video file “Breaking India” में यह देख सकते हो. राक्षस रावण बड़ा बलवान था. उसके १० सर थे. एक कट जाता तो फिर से नया सिर आ जाता. लेकिन विश्व के कई देशों से भी ज्यादा धनवान कई बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ है जो अपने मुनाफे के लिए किसी भी देश का शोषण कर सकते है. यदि पैसे से वे किसी राजा या सरकार को खरीद न कर सके तो उन नेताओं की ह्त्या करके अपने अनुकूल नेताओं को सत्ता में बिठाकर, और उस में भी सफलता न मिले तो मिलिटरी उस देशमे उतारकर भी उस राजा को कैद करके अपना काम कर रहे है. किसी कंपनी की ५० देशो में शाखा है तो मानो उस असुर के ५० सिर है. अगर किसी देश से उसको हटा दिया जाय जैसे कि कोकाकोला जैसे हानिकारक उत्पाद बेचने के कारण तो उसका सिर किसी भी पक्ष की सरकार को खरीदकर फिर से ज़िंदा हो जाता है और उनका शोषक व्यापार चालू हो जाता है. किसी देश के उनके मेनेजर को मार डालने से भी उस कंपनी के शोषण से देश को मुक्ति नहीं मिलती क्योंकि दुसरे ही दिन नया मेनेजर आ जाएगा. इनको कोई नष्ट नहीं कर सकता क्योंकि उनकी शाखाएं अनेक देशों में फैली हुई है. उनके सामान को बेचने के लिए संयमी प्रजा को भोगवादी बनाने के लिए वे संस्कृति के मूल्यों को तोड़ने में तनिक भी हिचकिचाते नहीं. इसके दृष्टांत के लिए एक documentary जिसका नाम Zeitgeist addendum है वह देखो. विधर्मी असुरों के नए अवतार ईसाई मिशनरियों के पास कितना धन है यह उनको भी पता नहीं है. सन १९८९ में सिर्फ एक वर्ष में चर्चों ने विश्व में धर्मांतरण के लिए १४५,००००००००० डॉलर खर्च किये. उनके फुल टाइम नौकर ४०,००००० है, १३००० पुस्तकालय है, २२००० मासिक प्रकाशन निकलते है जैसे हमारे आश्रम के सिर्फ २ है, वीडियो प्रचार के लिए.

४००००००००० ट्रेक्ट चलाते है, १८९० रेडियो और टीवी स्टेशन उनके अपने है. २५०००० विदेशी धर्म प्रचारक पादरी है और उनको तालीम देने के लिए ४०० संस्थाएं है. ऐसे ही इस्लाम के प्रचारक भी विपुल मात्रा में धन खर्च करके धर्मांतरण में लगे है. इतने भयानक असुरों के सामने भी गुरुदेव ने अकेले दशकों तक युद्ध किया और  सनातन धर्म की रक्षा की एवं धराशायी मूल्यों की तथा स्वाभिमान की पुनर्स्थापना की यह मुख्य कारण है इस राजनैतिक षड्यंत्र का.

गुरुदेव निर्दोष साबित होकर जल्दी बाहर आये ऐसी आपकी इच्छा है पर क्या गुरुदेव की भी ऐसी इच्छा है? आप अपनी इच्छा को उनकी इच्छा में मिला दो तो उनके शिष्य हो. अन्यथा आप अपनी अच्छा के अनुकूल उनको चलाकर उनके गुरु बनना चाहते हो. वृन्दावन के ग्वाल गोपियों को छोड़कर श्रीकृष्ण जब अपने दैवी कार्य के लिए चले गये तब उन्हों ने उनकी इच्छा में अपनी इच्छा को मिला दिया. कोई फ़रियाद नहीं की कि हमें कृष्ण की जरूरत है इसलिए वे फिर वृन्दावन आ जाए. इसे समर्पण कहते है. कृष्ण के विरह को भी उन्हों ने भक्ति में बदल दिया और साधना में सफल हो गई. कृष्ण के सान्निध्य में प्रेमा भक्ति के द्वारा और बाद में विरह भक्ति के द्वार उन्हों ने अपना जीवन साधनामय बना दिया.

१.      गुरूजी का स्वरुप इतना व्यापक है कि अनंत ब्रह्माण्ड में भी वह समा नहीं सकता. उनके दैवी कार्य के निमित्त उनका शरीर जिसे वे “मैं” नहीं मानते, जेल में गया है. उनको अपना दैवी कार्य जेल में रहकर सम्पन्न करना या बाहर आकर सम्पन्न करना यह उनकी मौज है. हमारा कर्तव्य यही है कि हम उनके दैवी कार्य में अपना जीवन समर्पित कर दे. गुरु हरगोबिन्द और गुरु गोविन्दसिंह के शिष्यों ने अपने गुरु के दैवी कार्य में अपना जीवन समर्पित कर दिया. सारा जीवन मुग़लों से लड़ने में बिता दिया. उन्हों ने अपना जीवन गुरु के आदेश के अनुसार उनके दैवी कार्य के यज्ञ में समर्पित कर दिया. उन गुरुओं ने भी सनातन धर्म की रक्षा के दैवी कार्य के लिए अपना सर्वस्व, शिष्य समुदाय, बेटे, और संपत्ति को न्योच्छावर कर दिया. औरंगजेब को हराने में वे सफल न भी हुए हो लेकिन धर्म की रक्षा के दैवी कार्य में वे पूर्ण सफल रहे. औरंगजेब के बाद भारत से मुग़ल शासन का अंत हो गया. मुग़ल राजाओं ने उनसे अन्याय किया पर उन्हों ने अपने आप से अन्याय नहीं किया. यदि उन्हों ने यह दैवी कार्य नहीं किया होता तो आज भारत में एक भी हिंदू या सीख नहीं होता, सब मुसलमान होते. रामजी के लिए रावण से युद्ध करनेवाले बंदरों ने और अन्य पशुओं ने भी अपने इष्ट के दैवी कार्य में अपना जीवन समर्पित कर दिया. उन्हों ने अपना कर्तव्य निभाया. बुद्ध के शिष्यों ने भी अपने इष्ट के दैवी कार्य में समाज का विरोध सहकर अनेक विघ्न बाधाओं का सामना करते हुए धर्म का प्रचार देश विदेश में किया. हम भी ऐसे एक महान अवतारी महापुरुष के शिष्य है. हमें भी अपना कर्तव्य निभाते हुए उनके दैवी कार्य को करना है.

 युग परिवर्तन के इस संधि काल में गुरुदेवने एकांत में जाकर सूक्ष्म जगत में दैवी शक्तियों के द्वारा धर्म की रक्षा के लिए भी यह लीला की हो यह संभव है. और उनके परिणाम देखने को मिलते है कि आसुरी विधर्मी शक्तियों से भारत का शासन छीनकर हिंदुत्व वादी लोगों के हाथ में आ गया. अभी आनेवाले ३-४ साल में देवासुर संग्राम होगा जिसमे बड़े प्राकृतिक संकट भूकंप, युद्ध आदि के द्वारा विश्व में महाविनाश होगा जिसमे आसुरी तत्त्वों की पराजय होगी और बाद में दैवी साम्राज्य की स्थापना होगी. हमें अपनी अध्यात्मिक साधना के द्वारा इस में सुरक्षा और सेवा का मौक़ा मिलेगा. इसलिए अपनी साधना और सेवा को हमें बढ़ाना चाहिए |

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Tips

8 आदतों से सुधारें अपना तन-मन और घर |


आदत सुधारें

आदत सुधारें

व्यक्ति अपने जीवन में सुख – दुःख सब कुछ प्राप्त करता है, परन्तु क्या कभी इस बात पर विचार करता है कि उसकी आदतें भी कई बार उसके सुख दुःख में सहभागी बनती हैं | इसके लिए आपको मालूम हो कि वो ऐसी कौन सी बातें हैं जिनका आपको ख्याल रखना चाहिए, हम यहाँ आपकी सहूलियत के लिए वर्णन कर रहे हैं |

१) 👉::
अगर आपको कहीं पर भी थूकने की आदत है तो यह निश्चित है कि आपको यश, सम्मान अगर मुश्किल से मिल भी जाता है, तो कभी टिकेगा ही नहीं  | वोश बेसिन में ही यह काम कर आया करें तो उचित रहेगा !
२) 👉::
जिन लोगों को अपनी जूठी थाली या बर्तन वहीं उसी जगह पर छोड़ने की आदत होती है उनको सफलता कभी भी स्थायी रूप से नहीं मिलती !
बहुत मेहनत करनी पड़ती है और ऐसे लोग अच्छा नाम नहीं कमा पाते ! अगर आप अपने जूठे बर्तनों को उठाकर उनकी सही जगह पर रख आते हैं तो चन्द्रमा और शनि का आप सम्मान करते हैं !
३) 👉::
जब भी हमारे घर पर कोई भी बाहर से आये, चाहे मेहमान हो या कोई काम करने वाला, उसे स्वच्छ पानी जरुर पिलाएं ! ऐसा करने से हम राहू का सम्मान करते हैं ! जो लोग बाहर से आने वाले लोगों को स्वच्छ पानी हमेशा पिलाते हैं उनके घर में कभी भी राहू का दुष्प्रभाव नहीं पड़ता !
४) 👉::
घर के पौधे आपके अपने परिवार के सदस्यों जैसे ही होते हैं, उन्हें भी प्यार और थोड़ी देखभाल की जरुरत होती है ! जिस घर में सुबह-शाम पौधों को पानी दिया जाता है तो हम बुध, सूर्य और चन्द्रमा का सम्मान करते हुए परेशानियों से डटकर लड़ पाते हैं.! जो लोग नियमित रूप से पौधों को पानी देते हैं, उन लोगों को depression, anxiety जैसी परेशानियाँ जल्दी से नहीं पकड़ पातीं.!
५) 👉::
जो लोग बाहर से आकर अपने चप्पल, जूते, मोज़े इधर-उधर फैंक देते, उन्हें उनके शत्रु बड़ा परेशान करते हैं.! इससे बचने के लिए अपने चप्पल-जूते करीने से लगाकर रखें,आपकी प्रतिष्ठा बनी रहेगी |
६) 👉::
उन लोगों का राहू और शनि खराब होगा, जो लोग जब भी अपना बिस्तर छोड़ेंगे तो उनका बिस्तर हमेशा फैला हुआ होगा, सिलवटें ज्यादा होंगी, चादर कहीं, तकिया कहीं, कम्बल कहीं ? उसपर ऐसे लोग अपने पुराने पहने हुए कपडे तक फैला कर रखते ! ऐसे लोगों की पूरी दिनचर्या कभी भी व्यवस्थित नहीं रहती, जिसकी वजह से वे खुद भी परेशान रहते हैं और दूसरों को भी परेशान करते हैं.! इससे बचने के लिए उठते ही स्वयं अपना बिस्तर समेट दें.!
७)👉::
पैरों की सफाई पर हम लोगों को हर वक्त ख़ास ध्यान देना चाहिए, जो कि हम में से बहुत सारे लोग भूल जाते हैं ! नहाते समय अपने पैरों को अच्छी तरह से धोयें, कभी भी बाहर से आयें तो पांच मिनट रुक कर मुँह और पैर धोयें.! आप खुद यह पाएंगे कि आपका चिड़चिड़ापन कम होगा, दिमाग की शक्ति बढेगी और क्रोध धीरे-धीरे कम होने लगेगा.!
८) 👉::
रोज़ खाली हाथ घर लौटने पर धीरे-धीरे उस घर से लक्ष्मी चली जाती है और उस घर के सदस्यों में नकारात्मक या निराशा के भाव आने लगते हैं.!
इसके विपरित घर लौटते समय कुछ न कुछ वस्तु लेकर आएं तो उससे घर में बरकत बनी रहती है.! उस घर में लक्ष्मी का वास होता जाता है.!
हर रोज घर में कुछ न कुछ लेकर आना वृद्धि का सूचक माना गया है.! ऐसे घर में सुख, समृद्धि और धन हमेशा बढ़ता जाता है और घर में रहने वाले सदस्यों की भी तरक्की होती है.!

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Abhyas, Awesome, कथा अमृत, ध्यानामृत, बापू के बच्चे नही रहते कच्चे, यौगिक प्रयोग, विचार विमर्श, विवेक जागृति, Bapuji, The Fact

जीवन में संघर्ष का महत्व |


एक बार एक किसान परमात्मा से बड़ा नाराज हो गया ! कभी बाढ़ आ जाये, कभी सूखा पड़ जाए, कभी धूप बहुत तेज हो जाए तो कभी ओले पड़ जाये ! हर बार कुछ ना कुछ कारण से उसकी फसल थोड़ी ख़राब हो जाये !

एक दिन बड़ा तंग आ कर उसने परमात्मा से कहा, “देखिये प्रभु, आप परमात्मा हैं ,लेकिन लगता है आपको खेती बाड़ी की ज्यादा जानकारी नहीं है | एक प्रार्थना है कि एक साल मुझे मौका दीजिये , जैसा मैं चाहूँ वैसा मौसम हो, फिर आप देखना मैं कैसे अन्न के भण्डार भर दूंगा !”

परमात्मा मुस्कुराये और कहा, “ठीक है, जैसा तुम कहोगे वैसा ही मौसम दूंगा, मै दखल नहीं करूँगा !”

किसान ने गेहूं की फ़सल बोई ,जब धूप चाही, तब धूप मिली, जब पानी चाहा, तब पानी मिला ! तेज धूप, ओले, बाढ़, आंधी तो उसने आने ही नहीं दी; समय के साथ फसल बढ़ी और किसान की ख़ुशी भी क्योंकि ऐसी फसल तो आज तक नहीं हुई थी !

किसान ने मन ही मन सोचा अब पता चलेगा परमात्मा को कि फ़सल कैसे करते हैं, बेकार ही इतने बरस हम किसानों को परेशान करते रहे | फ़सल काटने का समय भी आया…..

किसान बड़े गर्व से फ़सल काटने गया | लेकिन जैसे ही फसल काटने लगा, एकदम से छाती पर हाथ रख कर बैठ गया | गेहूं की एक भी बाली के अन्दर गेहूं नहीं था, सारी बालियाँ अन्दर से खाली थी !

बड़ा दुखी होकर उसने परमात्मा से कहा, “प्रभु ये क्या हुआ ?”

तब परमात्मा बोले, “ये तो होना ही था | तुमने पौधों को संघर्ष का ज़रा सा भी मौका नहीं दिया | ना तेज धूप में उनको तपने दिया, ना आंधी ओलों से जूझने दिया, उनको किसी प्रकार की चुनौती का अहसास जरा भी नहीं होने दिया, इसीलिए सब पौधे खोखले रह गए……

जब आंधी आती है, तेज बारिश होती है, ओले गिरते हैं; तब पोधा अपने बल से ही खड़ा रहता है, वो अपना अस्तित्व बचाने का संघर्ष करता है और इस संघर्ष से जो बल पैदा होता है वो ही उसे शक्ति देता है, ऊर्जा देता है, उसकी जीवटता को उभारता है | सोने को भी कुंदन बनने के लिए आग में तपने, हथौड़ी से पिटने, गलने जैसी चुनौतियों से गुजरना पड़ता है; तभी उसकी स्वर्णिम आभा उभरती है, उसे अनमोल बनाती है !”

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उसी तरह जिंदगी में भी अगर संघर्ष ना हो, चुनौती ना हो तो आदमी खोखला ही रह जाता है, उसके अन्दर कोई गुण नहीं आ पाता | ये चुनौतियाँ ही हैं जो आदमी रूपी तलवार को धार देती हैं, उसे सशक्त और प्रखर बनाती हैं | अगर प्रतिभाशाली बनना है तो चुनौतियाँ तो स्वीकार करनी ही पड़ेंगी, अन्यथा हम खोखले ही रह जायेंगे |

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अगर जिंदगी में प्रखर बनना है, प्रतिभाशाली बनना है, तो संघर्ष और चुनौतियों का सामना तो करना ही पड़ेगा |

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Daily Activities and bapuji divine satsang

Guru—The Incarnate Divinity


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Guru is the veritable God on earth and he is the true friend and reliable relative.Disciple should prostrate before his Guru, saying to him “O Lord! O Lord! Have mercy on me who has taken shelter in thee. Protect me from the ocean of birth and death.”He who worships the Feet of Guru who is divine, with disinterested devotion, directly attains His Grace.  The disciple cuts off, by means of meditation and the sword of knowledge obtained from the Preceptor and sharpened by service to him, this baseless Ahamkara, which is imbedded in the mind, speech, Pranas, body and wanders in this world, freed of all attachments. Contact with the objects should be avoided till attachment, which taints the mind, is completely cut off by the powerful weapon of intense devotion to Guru. He who practises Yoga, by taking refuge in Guru, is not overcome by various obstacles. The true disciple should, unhesitatingly and without shyness, prostrate on the ground ‘Sashtanga’ as a token of his complete surrender, at the Holy Feet of his Guru. Who so ever devotes himself to the worship and service of Guru without expectation of reward will never go wrong, nor will he ever lose the benefit of such worship and service.He is verily purified and attains salvation who daily studies the sacred Guru Gita, containing the light of wisdom. He who delights in the Glory of His Guru and in narrating his Guru’s glory to others, shall truly attain Guru’s Grace.In the ignorance-dispelling Presence of Guru, who verily is God, the Absolute,—in His Presence shall all thy doubt’s be dispelled, like snow before the rising Sun. “O Great and Most Revered Guru, I bow to Thee in reverence. Pray, instruct me how I may attain unfailing devotion to Thy Lotus-Feet and how my mind may always rest in devotion at thy Merciful Feet”—thus in all humility and self-surrender should the true disciple (prostrate) and plead before his Guru.Glory to the most exalted Guru who is God-visible! Glory to the Sacred Scriptures that have sung the praises of the Guru! Glory to the true disciple that has found his sole refuge in such a Guru.

 

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सुधर जाओ, सुधर ने की सीज़न है, वरना…


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मैं उपरवाला बोल रहा हूँ, जिसने ये पूरी दुनिया बनाई वो उपरवाला.

तंग आ चूका हूँ मैं तुम लोगों से,

घर का ध्यान तुम न रखो और चोरी हो जाये तो, “उपरवाले तूने क्या किया”.

गाड़ी तुम तेज़ चलाओ और धक्का लग जाये तो, “उपरवाले……..”.

पढाई तुम न करो और फेल हो जाओ तो, “उपरवाले………”.

ऐसा लगता है इस दुनिया में होने वाले हर गलत काम का जिम्मेदार मैं हूँ.

आजकल तुम लोगो ने एक नया फैशन बना लिया है, जो काम तुम लोग नहीं कर सकते, उसे करने में मुझे भी असमर्थ बता देते हो!

उपरवाला भी भ्रष्टाचार नहीं मिटा सकता,
उपरवाला भी महंगाई नहीं रोक सकता,
उपरवाला भी बलात्कार नहीं रोक सकता…….
ये सब क्या है?
भ्रष्टाचार किसने बनाया?
मैंने?
किससे रिश्वत लेते देखा है तुमने मुझे?

मैं तो हवा, पानी, धुप, आदि सबके लिए बराबर देता हूँ,

कभी देखा है कि ठण्ड के दिनों में अम्बानी के घर के ऊपर मैं तेज़ धुप दे रहा हूँ, या गर्मी में सिर्फ उसके घर बारिश हो रही है ?

उल्टा तुम मेरे पास आते हो रिश्वत की पेशकश लेकर,
कभी लड्डू,
कभी पैडे,
कभी चादर.
और हा,
आइन्दा से मुझे लड्डू की पेशकश की तो तुम्हारी खैर नहीं,
मेरे नाम पे पूरा डब्बा खरीदते हो,
एक टुकड़ा मुझपर फेंक कर बाकि खुद ही खा जाते हो.

ये महंगाई किसने बनाई?
मैंने?
मैंने सिर्फ ज़मीन बनाई,
उसे “प्लाट” बनाकर बेचा किसने?

मैंने पानी बनाया,
उसे बोतलों में भरकर बेचा किसने?

मैंने जानवर बनाये,
उन्हें मवेशी कहकर बेचा किसने?

मैंने पेड़ बनाये,
उन्हें लकड़ी कहकर बेचा किसने?

मैंने आज तक तुम्हे कोई वस्तु बेचीं?
किसी वस्तु का पैसा लिया?

मैंने ब्रह्मज्ञानी संतो को भेजा धरती पर ,

उनको जेल में डाला किसने?

सब चीज़ों में कसूर मेरा निकालते हो।
अभी भी समय है
सुधर जाओ, सुधर ने की सीज़न है,
वरना
फिर मत कहना
है भारत के संतों के राम ! ये प्रलय क्यूँ आयी  !!!

 

 

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Bapuji, Bhajan

जोगी का ज्ञान करें है नित्य उजाला सतत सभी के हृदय में ….


सूर्य करें है दिन में उजाला, चाँद करें है रात में, जोगी का ज्ञान करें है नित्य उजाला सतत सभी के हृदय में ….

Hami se hai jamana 45

जोगी रे क्या जादू है तुम्हरे प्यार में…..
जोगी रे क्या जादू है तेरे प्यार में… जोगी रे क्या जादू है तुम्हरे ज्ञान में…
सौभाग्य से मिले ये जोगी, सबको धन्य किया है।
शांति, प्रेम और ज्ञान का, अमृत, हमने यहीं पिया है।।
जोगी रे क्या जादू है तुम्हरे जोग में…
दूर भगाकर सारी उदासी, सबको प्रसन्नता देते।
तन-मन पुलकित कर देते, बदले में कुछ नहीं लेते।।
जोगी रे क्या जादू है तुम्हरे प्यार में….
दुर्बलता कायरता मिटाकर, हमको वीर बनाते।
बल के भाव हैं भीतर भरते, हर विपदा को हटाते।।
जोगी रे क्या जादू है तुम्हरे ज्ञान में….
जोगी के दर पे हम आये, भाग्य हमारा जागे।
दर्शन करके इस जोगी के, शोक दुःख सब भागे।।
जोगी रे क्या जादू है तुम्हरे जोग में…..
जब-जब मेरा जोगी झूमे, लगे है सावन आया।
मुरझाये दिल खिल जाते हैं, वसंत जैसे छाया।।
जोगी रे क्या जादू है तुम्हरे प्यार में….
बड़ा सलोना जोगी मेरा, मनभावन और पावन।
जब भी आये लगे है जैसे, खुशियों का हो सावन।।
जोगी रे क्या जादू है तुम्हरे ज्ञान में….
चिंता शोक न तनिक रहे यहाँ, ऐसी आभा इनकी।
शरण जो आये दरस जो पाये, बदली दुनिया उनकी।।
जोगी रे क्या जादू है तुम्हरे जोग में….
जोगी की संगति में आकर, ऊँचा धन है पाया।
कोई इसको छुड़ा न पाये, शाश्वत रंग लगाया।।
जोगी रे क्या जादू है तुम्हरे प्यार में….
सूर्य करे है दिन में उजाला, चाँद करे रातों में।
जोगी ज्ञान का करे उजाला, सतत सभी के दिलों में।।
जोगी रे क्या जादू है तुम्हरे ज्ञान में….
जोगी रे क्या जादू है तुम्हरे प्यार में…..

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