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साजिश को सच का रूप देने की मनोवैज्ञानिक रणनीति


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संत श्री आशारामजी बापू के खिलाफ जो षड्यंत्र चल रहा है, उसका मनोवैज्ञानिक तरीके से किस तरह से सुनियोजन किया गया है, यह मैं एक मनोविज्ञानी होने के नाते आपको बताना चाहती हूँ । आठ मुख्य पहलू समझेंगे कि किस तरह इस साजिश को सच का मुखौटा पहनाया जा रहा है ।

(१) जनता के विशिष्ट वर्गों पर निशाना : समाज के शिक्षित, जागरूक, उच्च एवं मुख्यतः युवा वर्ग को निशाना बनाया गया क्योंकि इनको विश्वास दिलाने पर ये तुरंत प्रतिक्रिया करते हैं ।

(२) षड्यंत्र का मुद्दा : देश की ज्वलंत समस्या ‘महिलाओं पर अत्याचार’ को मुख्य मुद्दा बनाया है । इस भावनात्मक विषय पर हर कोई तुरंत प्रतिक्रिया दे के विरोध दर्शाता है ।

(३) रणनीति : चीज को यथार्थपूर्ण, विश्वसनीय, प्रभावशाली दिखाने जैसी मार्केटिंग रणनीति का उपयोग करके दर्शकों को पूरी तरह से प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है ।

दर्शक मनोविज्ञान का भी दुरुपयोग किया जा रहा है । कोई विज्ञापन हमें पहली बार पसंद नहीं आता है लेकिन जब हम बार-बार उसे देखते हैं तो हमें पता भी नहीं चलता है कि कब हम उस विज्ञापन को गुनगुनाने लग गये । बिल्कुल ऐसे ही बापूजी के खिलाफ इस बोगस मामले को बार-बार दिखाने से दर्शकों को असत्य भी सत्य जैसा लगने लगता है ।

(४) प्रस्तुतिकरण का तरीका : पेड मीडिया चैनलों के एंकर आपके ऊपर हावी होकर बात करना चाहते हैं । वे सिर्फ खबर को बताना नहीं चाहते बल्कि सेकंडभर की फालतू बात को भी ‘ब्रेकिंग न्यूज’ बताकर दिनभर दोहराते हैं और आपको हिप्नोटाइज करने की कोशिश करते हैं ।

(५) भाषा : खबर को बहुत चटपटे शब्दों के द्वारा असामान्य तरीके से बताते हैं । ‘बात गम्भीर है, झड़प, मामूली’ आदि शब्दों की जगह ‘संगीन, वारदात, गिरोह, बड़ा खुलासा, स्टिंग ऑपरेशन’ ऐसे शब्दों के सहारे मामूली मुद्दे को भी भयानक रूप दे देते हैं ।

(६) आधारहीन कहानियाँ बनाना, सुटिंग ऑपरेशन्स और संबंधित बिन्दु : ‘आश्रम में अफीम की खेती, स्टिंग ऑपरेशन’ आदि आधारहीन कहानियाँ बनाकर मामले को रुचिकर बना के उलझाने की कोशिश करते हैं ।

(७) मुख्य हथियार : बहुत सारे विडियो जो दिखाये जाते हैं वे तोड़-मरोड़ के बनाये जाते हैं । ऐसे ऑडियो टेप भी प्रसारित किये जाते हैं । यह टेक्नोलॉजी का दुरुपयोग है ।

इसके अलावा कमजोर, नकारात्मक मानसिकतावालों को डरा के या प्रलोभन देकर उनसे बुलवाते हैं । आश्रम से निकाले गये २-५ बगावतखोर लोगों को मोहरा बनाते हैं ताकि झूठी विश्वसनीयता ब‹ढायी जा सके ।

(८) मनोवैज्ञानिक वातावरण तैयार करना : बापूजी की जमानत की सुनवाई से एक दिन पहले धमकियों की खबरें उछाली जाती हैं, कभी पुलिस को, कभी माता-पिता और लड़की को तो कभी न्यायाधीश को । ये खबरें कभी भी कुछ सत्य साबित नहीं हुर्इं ।

अब आप खुद से प्रश्न पूछिये और खुद ही जवाब ढूँढिये कि क्या यह आरोप सच है या एक सोची-समझी साजिश ?

और एक बात कि केवल पेड मीडिया चैनल ही नहीं बल्कि इसीके समान प्रिंट मीडिया भी खतरनाक तरीके से जनमानस को प्रभावित कर रहा है । इन दोनों से सावधान रहना चाहिए ।

– शिल्पा अग्रवाल,

प्रसिद्ध मनोविज्ञानी

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गौ सेवा - गाय की रक्षा - देश की रक्षा

बापू जी के श्री चित्र को १०८ परिक्रमा करती निवाई गौशाला की गौमाता

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गौ सेवा – गाय की रक्षा – देश की रक्षा

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Saint and People

सार्इं टेऊँराम


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वृक्ष कबहुँ नहीं फल भखै, नदी न पीवे नीर ।

परमारथ के कारने, साधु धरा शरीर ।।

जैसे वृक्ष अपने फलों को स्वयं भी कभी नहीं खाता, सरिता अपने नीर का स्वयं पान कभी नहीं करती वैसे ही संतों का जीवन भी अपने लिए नहीं होता । हालांकि संतों की यश-कीर्ति से जलनेवाले लोग उनकी यश-कीर्ति को धूमिल करने के बहुतेरे प्रयास करते हैं । किन्तु इन सबकी परवाह न करते हुए वे संतजन अपने जीवन को परहित में ही व्यतीत कर देते हैं । उनका जीवन तो बस, मानवमात्र को दुःखों से छुटकारा दिलवाकर उनके भीतर शांति एवं आनंद भरने में ही खर्च होता है ।

सिंध प्रांत में ऐसे ही एक महान संत हो गये- सार्इं टेऊँराम । उनके सान्निध्य को पाकर लोग बहुत खुशहाल रहते थे । निगाहमात्र से ही लोगों में शांति एवं आनंद का संचार कर देने की शक्ति उनमें थी । उनके सत्संग में मात्र वृद्ध स्त्री-पुरुष ही नहीं, कई युवान-युवतियाँ भी आते थे । उनकी बढ़ती प्रसिद्धि एवं उनके प्रति लोगों के प्रेम को देखकर कई तथा-कथित समाजसुधारकों को तकलीफ होने लगी । समाजसुधारक भी दो प्रकार के लोग होते हैं एक तो सज्जन लोग होते हैं और दूसरे वे लोग होते हैं जो दूसरों के यश को देखकर जलते हैं । उनको होता है कि कैसे भी करके अपनी प्रसिद्धि हो जाये । ऐसे ही कुछ मलिन मुरादवालों ने सार्इं टेऊँराम का कुप्रचार शुरू कर दिया । कुप्रचार ने इतना जोर पकड़ा, इतना जोर पकड़ा कि कुछ भोलेभाले सज्जन लोगों ने सार्इं टेऊँराम के पास जाना बंद कर दिया । उस वक्त के सज्जनों की यह बड़ी भारी गलती रही । उन्होंने सोचा कि ‘अपना क्या ? जो करेगा सो भरेगा ।’

अरे ! कुप्रचार करनेवाले क्यों कुप्रचार करते ही रहें ? वे बिचारे करें और फिर भरें उससे पहले ही तुम उन्हें आँखें दिखा दो ताकि वे दुष्कर्म करें भी नहीं और भरें भी नहीं । समाज की बरबादी न हो, समाज गुमराह न हो । खैर… सार्इं टेऊँराम की निंदा एवं कुप्रचार ने आखिरकार इतना जोर पकड़ा कि नगर पालिका में एक प्रस्ताव पास किया गया कि सार्इं टेऊँराम के आश्रम में जो लड़के-लड़कियाँ जायेंगे उनके माता-पिता को पाँच रूपये जुर्माना भरना पड़ेगा । उस वक्त पाँच रूपये की कीमत बहुत थी । ७८ रूपये तोला सोने की कीमत थी तब की यह बात है । सौ रूपये दान करना तो अच्छी बात है लेकिन दंड भरना, यह तो बड़ी लज्जा की बात है । कुछ कमजोर मन के लोग थे उन्होंने तो अपने बेटे-बेटियों को सार्इं टेऊँराम के आश्रम में जाने से रोका । कुछ लड़के-लड़कियाँ तो रुक गये । लेकिन जिनको महापुरुष की कृपा का स्वाद ठीक से समझ में आ गया था वे नहीं रुके । उनकी अंतरात्मा तो मानो कहती हो कि :

हमें रोक सके ये जमाने में दम नहीं । हमसे जमाना है जमाने से हम नहीं ।।

बीड़ी-सिगरेटवाला बीड़ी-सिगरेट नहीं छोड़ता, शराबी शराब नहीं छोड़ता, जुआरी जुआ खेलना नहीं छोड़ता, तो वे समझदार, सत्संगी युवक-युवतियाँ गुरु के द्वार पर जाना कैसे छोड़ देते ? पास करनेवालों ने तो पाँच रूपये का जुर्माना पास कर दिया किन्तु सच्चे भक्तों ने सार्इं टेऊँराम के आश्रम में जाना नहीं छोड़ा । हमारी जिनके प्रति श्रद्धा होती है, उनके लिए हमारे चित्त में सुख की भावना होती है चाहे फिर रामभक्त शबरी हो या कृष्णभक्त मीरा । उनके हृदय में अपने आराध्य के लिए सुख देने की ही भावना थी । सार्इं टेऊँराम के शिष्य भी अपने गुरु की प्रसन्नता के लिए प्रयत्नशील रहते थे । अपने गुरु के प्रति अपने अहोभाव को प्रदर्शित करने के लिए अपनी-अपनी सामथ्र्य के अनुसार पत्र-पुष्पादि अर्पित करते थे । इसे देखकर दुष्टजनों के हृदय में बड़ी ईष्र्या उत्पन्न होती थी । अतः उन्होंने कुप्रचार करने के साथ-साथ पाँच रूपये दंड का प्रस्ताव भी पास करवा लिया । कुछ ढीले-ढाले लोग नहीं आते थे, बाकी के सार्इं टेऊँराम के प्यारों ने तो आश्रम जाना जारी ही रखा । ईश्वर के पथ के पथिक इसी प्रकार वीर होते हैं । उनके जीवन में चाहे हजार विघ्न-बाधाएँ आ जायें किन्तु वे अपने लक्ष्य से च्युत नहीं होते । अनेक अफवाहें एवं निंदाजनक बातें सुनकर भी उनका हृदय गुरुभक्ति से विचलित नहीं होता क्योंकि वे गुरुकृपा के महत्त्व को ठीक से समझते हैं, गुरु के महत्त्व को जानते हैं । अपने सद्गुरु श्री तोतापुरी महाराज में श्री रामकृष्ण परमहंस की अडिग श्रद्धा थी । एक बार किसीने आकर उनसे कहा : ‘‘तोतापुरी महाराज फलानी महिला के घर बैठकर खा रहे हैं । उन्हें आपने गुरु बनाया ?’’

रामकृष्ण : ‘‘अरे ! बकवास मत कर । मेरे गुरुदेव के प्रति एक भी अपशब्द कहा तो ठीक न होगा ।’’ ‘‘किन्तु हम तो आपका भला चाहते हैं । आप तो माँ काली के साथ बात करते थे… इतने महान होकर भी तोतापुरी को गुरु माना ! थोड़ा तो विचार करें । वे तो ऐसे ही हैं । रामकृष्ण बोल पड़े : ‘‘मेरे गुरु कलाल खाने जायें तो भी मेरे गुरु मेरे लिए तो साक्षात् नन्दराय ही हैं ।’’

यह है श्रद्धा । ऐसे लोग तर जाते हैं । बाकी के लोग आधे में ही मर जाते हैं । …तो वे सार्इं टेऊँराम के प्यारे कैसे भी करके पहुँच जाते थे अपने गुरु के द्वार पर । माता-पिता को कहीं बाहर जाना होता तब लड़का-लड़की कहीं भागकर आश्रम न चले जायें यह सोचकर माता-पिता अपने बेटों को खटिया के पाये से बाँध देते और उन्हें बरामदे में रखकर बाहर से ताला लगाकर चले जाते । फिर सत्संग के प्रेमी लड़के क्या करते… खटिया को हिला-डिलाकर तोड़ देते एवं जिस पाये से उनका हाथ बँधा होता उस बँधे पाये के साथ ही सार्इं टेऊँराम के आश्रम पहुँच जाते और सार्इं टेऊँराम से खुलवा लेते । सार्इं टेऊँराम एवं अन्य साधक उनके बंधनों को खोल देते । जब लोगों ने देखा कि ये लोग तो खटिया के पाये समेत आश्रम पहुँच जाते हैं । अब क्या करें ?

उन दुर्बुद्धियों ने फिर एक प्रस्ताव पास कर लिया कि नगर में मरनेवाले पशुओं को लाकर सार्इं टेऊँराम के आश्रम के आसपास डाल दिया जाये । नगरपालिका के लोग मरे हुए ढोरों को वहाँ फेंक जाते । कितना अत्याचार ।

किन्तु सहनशीलता के मूर्तिमंत रूप सार्इं टेऊँराम गह्ने खोदकर नमक डालकर उन पशुओं को गाड़ देते । इसमें उनके शिष्य उन्हें सहाय करते । सार्इं टेऊँराम अपने आश्रम में ही अनाज उगाते थे । जब कुप्रचारकों ने देखा कि हमारा यह दाँव भी विफल जा रहा है तो उन्होंने एक नया फरमान जारी करवा दिया कि कोई भी दुकानदार सार्इं टेऊँराम के आश्रम की कोई भी वस्तु न खरीदे अन्यथा उस पर जुर्माना किया जायेगा । जब इतने से भी सार्इं टेऊँराम की समता, सहनशीलता में कोई फर्क नहीं आया एवं उनके साधकों की श्रद्धा यथावत् देखी तो उन नराधमों ने, आश्रम जिस कुँए के जल का उपयोग करता था उसमें केरोसीन (मिट्टी का तेल) डाल दिया । क्या नीचता की पराकाष्ठा है । कितना घोर अत्याचार ! लेकिन सार्इं टेऊँराम भी पक्के थे । संत-महापुरुष कच्ची मिट्टी के थोड़े-ही होते हैं ? भगवान की छाती पर खेलने की उनकी ताकत होती है । कई बार भगवान अपने प्राण को त्यागकर भी भक्तों की, संतों की बात रख लेते हैं, जैसे, भीष्म पितामह के संकल्प को पूरा करने के लिए भगवान ने अपने हथियार न उठाने के प्रण को छोड़ दिया था ।

सार्इं टेऊँराम के कुप्रचार से एक ओर जहाँ कमजोर मनवालों की श्रद्धा डगमगाती वहीं उनके प्यारों का प्रेम उनके प्रति दिन-ब-दिन बढ़ता जाता । सार्इं टेऊँराम अपने आश्रम में एक चबूतरे पर बैठकर सत्संग करते थे । उनके पास अन्य साधु-संत भी आते थे । अतः वह चबूतरा छोटा पड़ता था । यह सोचकर उनके भक्तों ने उस चबूतरे को बड़ा बनवा दिया । बड़े चबूतरे को देखकर उनके विरोधी ईष्र्या से जल उठे एवं वहाँ के तहसीलदार को बुला लाये । उसने आकर कहा कि यह चबूतरा अनधिकृत रूप से बनाया गया है जिसके कारण सड़क छोटी हो गयी है एवं लोगों को आने-जाने में परेशानी होती है । अतः इस चबूतरे  को तोड़ देना चाहिए । यह कहकर उसने सार्इं टेऊँराम के विरुद्ध मामला दर्ज कर दिया एवं उन्हें अदालत में उपस्थित होने को कहा । किन्तु निश्चित समय पर सार्इं टेऊँराम अदालत में उपस्थित न हुए । दूसरे दिन जब वे स्नान करके तालाब से लौटे तो देखा कि चबूतरा टूटा हुआ है । संत तो सहन कर भी लेते हैं किन्तु प्रकृति से उनका विरोध सहा नहीं जाता । कुछ समय के पश्चात् उस तहसीलदार का स्थानांतरण दूसरी जगह हो गया । उसकी जगह दूसरा तहसीलदार आया वह बड़ा श्रद्धालु और भक्त था । अतः उसने पुनः  वह चबूतरा बनवा दिया । जिन्होंने सार्इं टेऊँराम को अपमानित करने की कोशिश की, लज्जित और बदनाम करने की कोशिश की, उनकी तो कोई दाल नहीं गली । जिन्होंने सार्इं टेऊँराम को निन्दित करने का प्रयास किया, उनका कुप्रचार करके उनकी कीर्ति को कलंकित करने का प्रयास किया । उनमें से किसीका बेटा मर गया तो किसीको लकवा हो गया, कोई पागल हो गया तो कोई पुत्रसुख से वंचित् हो गया और न जाने कितने अशान्ति की आग में जलते रहे । वे आज न जाने किस नरक में होंगे ? लेकिन सार्इं टेऊँराम के पावन यश की सौरभ आज भी चतुर्दिक प्रसारित होकर अनेक दिलों को पावन कर रही है । ऐसे ही संत श्री आशारामजी बापू का यश आनेवाले समय में ऐसा फैलेगा की पूर्व के सभी संतों-महापुरुषों-अवतारों के यश को पीछे छोड़ देगा | पूज्य संत श्री आशारामजी बापू के भक्तों-साधकों-शिष्यों को जो दिव्य अनुभूतियाँ हुई है उनसे अभी दुनिया बेखबर है, जब वो समाचार मीडिया के द्वारा लोगो के सामने आयेगा, तब लोग दांतों तले उंगलिया दबा देंगे और उनका सिर पूज्य बापूजी के चरणों में आदर से नत-मस्तक हो जायेगा | हरी ॐ

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निर्दोष, निष्कलंक बापू


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किसीने ठीक ही लिखा है कि हिन्दू तो वह बूढ़े काका का खेत है, जिसे जो चाहे जब जोत जाय । उदार, सहिष्णु और क्षमाशील इस वर्ग के साथ वर्षों से बूढ़े काका के खेत की तरह बर्ताव हो रहा है । हिन्दू समाज का नेतृत्व करनेवाले ब्रह्मज्ञानी संतों, महात्माओं, समाज-सुधारकों, क्रांतिकारी प्रखर वक्ताओं पर जिसके मन में जो आता है, वह कुछ भी आरोप मढ़ देता है । अब तो दुष्प्रचार की हद हो गयी, जब ७३ वर्षीय पूज्य संत श्री आशारामजी बापू पर साजिशकर्ताओं की कठपुतली, मानसिक असंतुलन वाली कन्या द्वारा ऐसा घटिया आरोप लगवाया गया, जिसका कोई सिर-पैर नहीं, जिसे सुनने में भी शर्म आती है । इससे देश-विदेश में फैले बापूजी के करोड़ो भक्तों व हिन्दू समाज में आक्रोश का ज्वालामुखी सुलग रहा है ।

कुदरत के डंडे से कैसे बचेंगे ?

आरोप लगानेवाली ल‹डकी की मेडिकल जाँच रिपोर्ट में चिकित्सकों ने आरोप को साफ तौर पर नकार दिया है । इससे स्पष्ट होता है कि यह सिर्फ बापूजी को बदनाम करने की सोची-समझी साजिश है लेकिन प्रश्न यह है कि करोड़ो भक्तों के आस्था के केन्द्र बापूजी के बारे में अपमानजनक एवं अशोभनीय आरोप लगाकर भक्तों की श्रद्धा, आस्था व भक्ति को ठेस पहुँचानेवाले कुदरत के डंडे से कैसे बच पायेंगे ? शास्त्रों में स्पष्ट लिखा है कि ‘भगवान स्वयं का अपमान सहन कर सकते हैं मगर अपने प्यारे तत्त्वस्वरूप संतों का नहीं ।’

व्यावसायिक हितों की चिंता

इन झूठे, शर्मनाक आरोपों के मूल में वे शक्तियाँ काम कर रही हैं, जो यह कतई नहीं चाहती हैं कि बापूजी की प्रेरणा से संचालित गुरुकुलों के असाधारण प्रतिभासम्पन्न विद्यार्थी आगे चलकर देश, संस्कृति व गुरुकुल का नाम रोशन करें । दुनिया जानती है कि भारतीय वैदिक गुरुकुल परम्परा पर आधारित शिक्षण एवं सर्वांगीण व्यक्तित्व निर्माण के क्षेत्र में बापूजी के मार्गदर्शन में देशभर में चल रहे गुरुकुल आज कॉन्वेंट शिक्षण पद्धति के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुके हैं । एक तरफ कई व्यावसायिक संस्थाओं की लूट इस पहाड़ के नीचे आ रही है तो दूसरी तरफ इंटरनेट और अश्लील साहित्य सामग्री के जरिये देश के भविष्य को चौपट करने की सुनियोजित साजिश पर पानी फिर रहा है । ओजस्वी-तेजस्वी भारत निर्माण के बापूजी के संकल्प को हजम कर पाना उन साजिशकर्ताओं के लिए अब काँटोंभरी राह साबित हो रहा है । ऐसे में गुरुकुलों की बढ़ती लोकप्रियता, विश्वसनीयता की छवि और मेधावी बच्चों की प्रतिभा को कुचलने के लिए अब कुछ इस तरह से कीचड़ उछाला जा रहा है कि माता-पिता अपने बच्चों को गुरुकुल में भेजें ही नहीं ।

पहले गुरुकुल के बच्चों पर तांत्रिक विद्या का मनग‹ढंत आरोप लगाया गया परंतु जब सर्वोच्च न्यायालय में इन आरोपों की हवा निकल गयी तो अब सीधे बापूजी के चरित्र पर ही कीच‹ड उछालने लगे हैं । मगर सूर्य पर थूँकने का दुस्साहस करनेवाले खुद ही गंदे हो जाते हैं । जो समाज को मान-अपमान, qनदा-प्रशंसा और राग-द्वेष से ऊपर उठाकर समत्व में प्रतिष्ठित करते हुए समत्वयोग की यात्रा करवाते हैं, भला ऐसे संत के दुष्प्रचार की थोथी आँधी उनका क्या बिगा‹ड पायेगी ? टीआरपी के पीछे दौ‹डनेवाले चैनल बापू को क्या बदनाम कर पायेंगे ? बापू के भक्तों की हिमालय-सी दृ‹ढ श्रद्धा के आगे आरोप की बिसात एक तिनके के समान है ।

चाहे धरती फट जाय तो भी सम्भव नहीं

वैसे आज किसी पर भी कीच‹ड उछालना बहुत आसान है । पहले बापूजी के आश्रम के लिए जमीन ह‹डपने, अवैध कब्जे, गैर-कानूनी निर्माण के थोकबंद आरोप लगाये गये मगर सत्य की तराजू पर सभी झूठे, बेबुनियाद साबित हुए । जब इनसे काम नहीं बना तो बापूजी और उनके द्वारा संचालित आश्रम, समितियों और साधकों पर अत्याचार किये गये लेकिन भक्तों ने इनका डटकर मुकाबला किया । साजिश करनेवालों ने हर बार मुँह की खायी । कितने तो आज भी लोहे के चने चबा रहे हैं तो कितने कुदरत के न्याय के आगे खामोश हैं परंतु बावजूद इसके आज भी बापूजी के ऊपर अनाप-शनाप आरोप लगवानेवालों को अक्ल नहीं आयी । साजिशकर्ताओं के इशारे पर बकनेवाली एक ल‹डकी ने बापूजी पर जैसा आरोप लगाया है, दुनिया इधर-की-उधर हो जाय, धरती फट जाय तो भी ऐसा सम्भव नहीं हो सकता है । यह घिनौना आरोप भक्तों की श्रद्धा, साधकों की आस्था को डिगा नहीं सकता है ।

पूरा जीवन खुली किताब

बापूजी का पूरा जीवन खुली किताब की तरह है । उसका हर पन्ना और उस पर लिखी हर पंक्ति समाज का युग-युगांतर तक पथ-प्रदर्शन करती रहेगी । बापूजी कोई साधारण संत नहीं, वे असाधारण आत्मसाक्षात्कारी महापुरुष हैं ।

दरअसल सबसे ब‹डी समस्या यह है कि सारे आरोप हिन्दू संतों पर ही लगाये जाते हैं क्योंकि हिन्दू चुपचाप सब सह लेता है । दुनिया के और किसी धर्म में ऐसा होने पर क्या होता है यह किसीसे छुपा नहीं है । हमारी उदारता और सहिष्णुता का दुरुपयोग किया जाता है । तभी तो महापुरुषों को बदनाम करने का षड्यंत्र चलता ही रहा है, फिर चाहे कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य स्वामी श्री जयेन्द्र सरस्वतीजी हों या फिर सत्य साँर्इं बाबा हों । आरोप लगानेवालों ने तो माता सीताजी व भगवान श्रीकृष्ण पर भी लांछन लगाया था । ऐसे में यह कल्पना कैसे की जा सकती है कि समाज को संगठित कर दिव्य भारतीय संस्कृति की विश्व-क्षितिज पर पताका लहरानेवाले विश्ववंदनीय संत पर आरोप न लगाये जायें ? संत तो स्वभाव से ही क्षमाशील होते हैं लेकिन उनके भक्त अपमान बर्दाश्त करनेवाले नहीं हैं । झूठ के खिलाफ सत्य की यह धधकती मशाल अन्याय और अत्याचार के अँधेरे को कुचलकर ही रहेगी ।

– श्री निलेश सोनी (वरिष्ठ पत्रकार)

प्रधान सम्पादक, ‘ओजस्वी है भारत !’

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Saint and People

काशी सुमेरु पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य श्री स्वामी नरेन्द्रानंद सरस्वतीजी महाराज


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षड्यंत्रों के तहत हिन्दू समाज पर अन्याय, अत्याचार बंद किया जाना चाहिए । संतों के सम्मान, स्वाभिमान की रक्षा होनी चाहिए ।

अगर संतों को जेल में डालकर बदनाम करने का षड्यंत्र होता रहा तो भारत की अस्मिता, भारत की संस्कृति सुरक्षित नहीं रह पायेगी । इसे सुरक्षित रखने के लिए सबको एकजुट हो के प्रयास करना होगा । और वह दिन दूर नहीं कि आशारामजी बापू आप सब लोगों के बीच में आयेंगे, आरोपों से बरी होंगे और राष्ट्रहित, समाजहित होगा ।

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Dirty politics (घिनौनी राजनीति)


Dirty politics (घिनौनी राजनीति)

Polytics

कितना घिनौना दुष्प्रचार ! कितनी घिनौनी राजनीति !

छिदवाड़ा गुरुकुल की सहेलियों को जाते-जाते आरोप लगानेवाली लड़की कहती गयी कि ‘‘अब देखना गुरुकुल का क्या होता है ! मैं अपना नाम करूँगी । गुरुकुल की जड़ उखाड़ के रख दूँगी । न होगा गुरुकुल, न मुझे आना प‹डेगा ।”

यह बात आरोप करनेवाली लड़की की सहेली ने अपने पिता को बतायी और अन्य लोगों तक पहुँची, हम तक भी पहुँची । छिदवाड़ा से शाहजहाँपुर १००० कि.मी. से अधिक व शाहजहाँपुर से जोधपुर १००० कि.मी. से अधिक, कुल २००० कि.मी. से अधिक अंतर हो जाता है । अब सोचो, इतने दूर से माँ-बाप के साथ लड़की को बुलाकर, माँ बाहर बरामदे में बैठी है, बाप भी वहीं है उस समय उसका मुँह दबाकर हाथ घुमाते रहे… क्या ऐसा सम्भव है ? ‘मैं चिल्लाती रही और माँ-बाप को भी नहीं सुनायी दिया ! पास में स्थित किसान के घर में रहनेवालों को भी सुनायी नहीं दिया !’ कैसी कपोलकल्पित कहानी है !

दुष्कर्म नहीं हुआ और यह बात लड़की स्वयं बोलती है, उसकी मेडिकल रिपोर्ट भी बोलती है । मुँह दबाया हो ऐसी कहीं कोई खरोंच भी लैबोरेटरी रिपोर्ट में नहीं पायी गयी । फिर भी ‘दुष्कर्म है, दुष्कर्म है…’ – ऐसा मीडिया का दुष्प्रचार कितना घिनौना है ! राजनीति कितनी घिनौनी है ! साजिशकर्ताओं की, धर्मांतरणवालों की साजिश कितनी घिनौनी है ! कोई भी समझ सकता है आसानी से कि साजिश है, राजकारण है, मनग‹ढंत कहानी है । और पाँच दिन बाद न जोधपुर में न शाहजहाँपुर में, एफआईआर दर्ज की जाती है दिल्ली में रात को २-४५ बजे ! यह तथ्य तो साजिश की पोल ही खोल देता है । पुलिस पर ऊपर से दबाव ऐसा था कि उनको तो मानसिक दबाव देकर बापूजी से हस्ताक्षर ही कराने थे, वे उन्होंने करवा लिये । दो-दो, तीन-तीन दिन का जागरण और मानसिक दबाव… पुलिस के मनमाफिक लिखे हुए कागजों पर व कोरे कागजों पर हस्ताक्षर करवा के लाखों-करो‹डों लोगों को सताने व उनकी भावनाओं को ठेस पहुँचाने का काम किया गया । इस घिनौनी साजिश से तो हृदय भी काँपता है, कलम भी काँपती है । आश्चर्य है ! आश्चर्य है !! आश्चर्य है !!!

सत्यवक्ताओं, ‘ऋषि प्रसाद’ के पाठकों को,साधकों को, और ashram.org के Viewers को  भगवान दृढ़ता दे और सुंदर, सुहावनी सूझबूझ दे । भारतीय संस्कृति को मिटानेवालों की संतों को बदनाम करने की मलिन मुरादें नाकाम हों । सभी संतों, प्रवक्ताओं और पाठकों को ईश्वर विशेष-विशेष आत्मबल, ओज अवश्य-अवश्य प्रदान करते हैं । ॐ ॐ ॐ… उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति, पराक्रम – ये छः सद्गुण जहाँ, पद-पद पर प्रभु की प्रेरणा-सहायता वहाँ ! ॐ ॐ ॐ…

करोड़ो भक्तों को, जिन्होंने आँसू बहाये, जप किया, धरना दिया, धैर्य, शांति का परिचय दिया व कुप्रचार को सुप्रचार से काटने का यह भगीरथ कार्य किया और करते रहेंगे, उनको और उनके माता-पिता को धन्यवाद है ! धन्या माता पिता धन्यो…

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Lord Macaulay’s prophecy comes true


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“I have travelled across the length and breadth of India and I have not seen one person who is a beggar, who is a thief. Such wealth I have seen in this country, such high moral values, people of such high caliber , that I do not think that we would ever conquer this country, unless we break the very backbone of this nation, which is her spiritual and cultural heritage, and therefore, I propose that we replace her old and ancient education system , her culture, for if the Indians think that all that is foreign and English is good and greater than their own, they will lose their self esteem, their native culture, and they will become what we want them, a truly dominated nation”- Lord Macaulay’s Address to the British Parliament- 2.2.1835

The schools do not display Sanskrit shlokas as ‘Quote of the Day’ on blackboards, they don’t teach Rahim and Kabir dohas anymore, children are taught the meaningless ‘Twinkle, Twinkle Little Star’ rather than couplets from Gita and Ramayana, and teachers do not tell the child about the love and valor of Krishna, about the compassion and dilemma of Sri Rama, about the generosity of Bali, about the sacrifice of Rishi Dadhichi, about the science of Patanjali.

The funniest outcome has been names- Rosy, Bobby, Miky, Viky, Twinkle, Sweety have replaced Lakshmi, Radha, Saraswati, Savitri, Meena, Sunaina and so on. The poor insist on English medium due to jobs in Englsih language, beggars who get money after much cajoling want to taste cold drinks than milk. Children have not heard of Udaipur and Jodhpur but dream of Disney Land and Eiffel Tower.

Men have forgotten to tie dhoti and turban, women have dropped bindi and sindoor from dressing tables, youth frown at Onam, Radhashtami, Bhai Dooj, Ras Lila and prefer Valentine, the fifteen day Shraddha is ridiculed by the young who laugh at the pundit who performs for the ancestors asking him rudely whether the ancestor will enjoy eggs or meat up there, the vegetable seller sells America’s Red and yellow pepper, Canada’s green cucumber, shoe shops exhibit shoes made in America and China, steel utensil shops proclaim that they sell cheap steel from China.

Neem and haldi products were from traditional Ayurvedic centres now they come via Canada and China, aloevera comes through America but the wisest are those who can see through these plans and nevertheless come to India, adopt Eastern traditions and feel peaceful and happy for the first time in life.

—- By Seema Burman

 

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