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साजिश को सच का रूप देने की मनोवैज्ञानिक रणनीति


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संत श्री आशारामजी बापू के खिलाफ जो षड्यंत्र चल रहा है, उसका मनोवैज्ञानिक तरीके से किस तरह से सुनियोजन किया गया है, यह मैं एक मनोविज्ञानी होने के नाते आपको बताना चाहती हूँ । आठ मुख्य पहलू समझेंगे कि किस तरह इस साजिश को सच का मुखौटा पहनाया जा रहा है ।

(१) जनता के विशिष्ट वर्गों पर निशाना : समाज के शिक्षित, जागरूक, उच्च एवं मुख्यतः युवा वर्ग को निशाना बनाया गया क्योंकि इनको विश्वास दिलाने पर ये तुरंत प्रतिक्रिया करते हैं ।

(२) षड्यंत्र का मुद्दा : देश की ज्वलंत समस्या ‘महिलाओं पर अत्याचार’ को मुख्य मुद्दा बनाया है । इस भावनात्मक विषय पर हर कोई तुरंत प्रतिक्रिया दे के विरोध दर्शाता है ।

(३) रणनीति : चीज को यथार्थपूर्ण, विश्वसनीय, प्रभावशाली दिखाने जैसी मार्केटिंग रणनीति का उपयोग करके दर्शकों को पूरी तरह से प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है ।

दर्शक मनोविज्ञान का भी दुरुपयोग किया जा रहा है । कोई विज्ञापन हमें पहली बार पसंद नहीं आता है लेकिन जब हम बार-बार उसे देखते हैं तो हमें पता भी नहीं चलता है कि कब हम उस विज्ञापन को गुनगुनाने लग गये । बिल्कुल ऐसे ही बापूजी के खिलाफ इस बोगस मामले को बार-बार दिखाने से दर्शकों को असत्य भी सत्य जैसा लगने लगता है ।

(४) प्रस्तुतिकरण का तरीका : पेड मीडिया चैनलों के एंकर आपके ऊपर हावी होकर बात करना चाहते हैं । वे सिर्फ खबर को बताना नहीं चाहते बल्कि सेकंडभर की फालतू बात को भी ‘ब्रेकिंग न्यूज’ बताकर दिनभर दोहराते हैं और आपको हिप्नोटाइज करने की कोशिश करते हैं ।

(५) भाषा : खबर को बहुत चटपटे शब्दों के द्वारा असामान्य तरीके से बताते हैं । ‘बात गम्भीर है, झड़प, मामूली’ आदि शब्दों की जगह ‘संगीन, वारदात, गिरोह, बड़ा खुलासा, स्टिंग ऑपरेशन’ ऐसे शब्दों के सहारे मामूली मुद्दे को भी भयानक रूप दे देते हैं ।

(६) आधारहीन कहानियाँ बनाना, सुटिंग ऑपरेशन्स और संबंधित बिन्दु : ‘आश्रम में अफीम की खेती, स्टिंग ऑपरेशन’ आदि आधारहीन कहानियाँ बनाकर मामले को रुचिकर बना के उलझाने की कोशिश करते हैं ।

(७) मुख्य हथियार : बहुत सारे विडियो जो दिखाये जाते हैं वे तोड़-मरोड़ के बनाये जाते हैं । ऐसे ऑडियो टेप भी प्रसारित किये जाते हैं । यह टेक्नोलॉजी का दुरुपयोग है ।

इसके अलावा कमजोर, नकारात्मक मानसिकतावालों को डरा के या प्रलोभन देकर उनसे बुलवाते हैं । आश्रम से निकाले गये २-५ बगावतखोर लोगों को मोहरा बनाते हैं ताकि झूठी विश्वसनीयता ब‹ढायी जा सके ।

(८) मनोवैज्ञानिक वातावरण तैयार करना : बापूजी की जमानत की सुनवाई से एक दिन पहले धमकियों की खबरें उछाली जाती हैं, कभी पुलिस को, कभी माता-पिता और लड़की को तो कभी न्यायाधीश को । ये खबरें कभी भी कुछ सत्य साबित नहीं हुर्इं ।

अब आप खुद से प्रश्न पूछिये और खुद ही जवाब ढूँढिये कि क्या यह आरोप सच है या एक सोची-समझी साजिश ?

और एक बात कि केवल पेड मीडिया चैनल ही नहीं बल्कि इसीके समान प्रिंट मीडिया भी खतरनाक तरीके से जनमानस को प्रभावित कर रहा है । इन दोनों से सावधान रहना चाहिए ।

– शिल्पा अग्रवाल,

प्रसिद्ध मनोविज्ञानी

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गौ सेवा - गाय की रक्षा - देश की रक्षा

बापू जी के श्री चित्र को १०८ परिक्रमा करती निवाई गौशाला की गौमाता

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गौ सेवा – गाय की रक्षा – देश की रक्षा

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निर्दोष, निष्कलंक बापू


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किसीने ठीक ही लिखा है कि हिन्दू तो वह बूढ़े काका का खेत है, जिसे जो चाहे जब जोत जाय । उदार, सहिष्णु और क्षमाशील इस वर्ग के साथ वर्षों से बूढ़े काका के खेत की तरह बर्ताव हो रहा है । हिन्दू समाज का नेतृत्व करनेवाले ब्रह्मज्ञानी संतों, महात्माओं, समाज-सुधारकों, क्रांतिकारी प्रखर वक्ताओं पर जिसके मन में जो आता है, वह कुछ भी आरोप मढ़ देता है । अब तो दुष्प्रचार की हद हो गयी, जब ७३ वर्षीय पूज्य संत श्री आशारामजी बापू पर साजिशकर्ताओं की कठपुतली, मानसिक असंतुलन वाली कन्या द्वारा ऐसा घटिया आरोप लगवाया गया, जिसका कोई सिर-पैर नहीं, जिसे सुनने में भी शर्म आती है । इससे देश-विदेश में फैले बापूजी के करोड़ो भक्तों व हिन्दू समाज में आक्रोश का ज्वालामुखी सुलग रहा है ।

कुदरत के डंडे से कैसे बचेंगे ?

आरोप लगानेवाली ल‹डकी की मेडिकल जाँच रिपोर्ट में चिकित्सकों ने आरोप को साफ तौर पर नकार दिया है । इससे स्पष्ट होता है कि यह सिर्फ बापूजी को बदनाम करने की सोची-समझी साजिश है लेकिन प्रश्न यह है कि करोड़ो भक्तों के आस्था के केन्द्र बापूजी के बारे में अपमानजनक एवं अशोभनीय आरोप लगाकर भक्तों की श्रद्धा, आस्था व भक्ति को ठेस पहुँचानेवाले कुदरत के डंडे से कैसे बच पायेंगे ? शास्त्रों में स्पष्ट लिखा है कि ‘भगवान स्वयं का अपमान सहन कर सकते हैं मगर अपने प्यारे तत्त्वस्वरूप संतों का नहीं ।’

व्यावसायिक हितों की चिंता

इन झूठे, शर्मनाक आरोपों के मूल में वे शक्तियाँ काम कर रही हैं, जो यह कतई नहीं चाहती हैं कि बापूजी की प्रेरणा से संचालित गुरुकुलों के असाधारण प्रतिभासम्पन्न विद्यार्थी आगे चलकर देश, संस्कृति व गुरुकुल का नाम रोशन करें । दुनिया जानती है कि भारतीय वैदिक गुरुकुल परम्परा पर आधारित शिक्षण एवं सर्वांगीण व्यक्तित्व निर्माण के क्षेत्र में बापूजी के मार्गदर्शन में देशभर में चल रहे गुरुकुल आज कॉन्वेंट शिक्षण पद्धति के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुके हैं । एक तरफ कई व्यावसायिक संस्थाओं की लूट इस पहाड़ के नीचे आ रही है तो दूसरी तरफ इंटरनेट और अश्लील साहित्य सामग्री के जरिये देश के भविष्य को चौपट करने की सुनियोजित साजिश पर पानी फिर रहा है । ओजस्वी-तेजस्वी भारत निर्माण के बापूजी के संकल्प को हजम कर पाना उन साजिशकर्ताओं के लिए अब काँटोंभरी राह साबित हो रहा है । ऐसे में गुरुकुलों की बढ़ती लोकप्रियता, विश्वसनीयता की छवि और मेधावी बच्चों की प्रतिभा को कुचलने के लिए अब कुछ इस तरह से कीचड़ उछाला जा रहा है कि माता-पिता अपने बच्चों को गुरुकुल में भेजें ही नहीं ।

पहले गुरुकुल के बच्चों पर तांत्रिक विद्या का मनग‹ढंत आरोप लगाया गया परंतु जब सर्वोच्च न्यायालय में इन आरोपों की हवा निकल गयी तो अब सीधे बापूजी के चरित्र पर ही कीच‹ड उछालने लगे हैं । मगर सूर्य पर थूँकने का दुस्साहस करनेवाले खुद ही गंदे हो जाते हैं । जो समाज को मान-अपमान, qनदा-प्रशंसा और राग-द्वेष से ऊपर उठाकर समत्व में प्रतिष्ठित करते हुए समत्वयोग की यात्रा करवाते हैं, भला ऐसे संत के दुष्प्रचार की थोथी आँधी उनका क्या बिगा‹ड पायेगी ? टीआरपी के पीछे दौ‹डनेवाले चैनल बापू को क्या बदनाम कर पायेंगे ? बापू के भक्तों की हिमालय-सी दृ‹ढ श्रद्धा के आगे आरोप की बिसात एक तिनके के समान है ।

चाहे धरती फट जाय तो भी सम्भव नहीं

वैसे आज किसी पर भी कीच‹ड उछालना बहुत आसान है । पहले बापूजी के आश्रम के लिए जमीन ह‹डपने, अवैध कब्जे, गैर-कानूनी निर्माण के थोकबंद आरोप लगाये गये मगर सत्य की तराजू पर सभी झूठे, बेबुनियाद साबित हुए । जब इनसे काम नहीं बना तो बापूजी और उनके द्वारा संचालित आश्रम, समितियों और साधकों पर अत्याचार किये गये लेकिन भक्तों ने इनका डटकर मुकाबला किया । साजिश करनेवालों ने हर बार मुँह की खायी । कितने तो आज भी लोहे के चने चबा रहे हैं तो कितने कुदरत के न्याय के आगे खामोश हैं परंतु बावजूद इसके आज भी बापूजी के ऊपर अनाप-शनाप आरोप लगवानेवालों को अक्ल नहीं आयी । साजिशकर्ताओं के इशारे पर बकनेवाली एक ल‹डकी ने बापूजी पर जैसा आरोप लगाया है, दुनिया इधर-की-उधर हो जाय, धरती फट जाय तो भी ऐसा सम्भव नहीं हो सकता है । यह घिनौना आरोप भक्तों की श्रद्धा, साधकों की आस्था को डिगा नहीं सकता है ।

पूरा जीवन खुली किताब

बापूजी का पूरा जीवन खुली किताब की तरह है । उसका हर पन्ना और उस पर लिखी हर पंक्ति समाज का युग-युगांतर तक पथ-प्रदर्शन करती रहेगी । बापूजी कोई साधारण संत नहीं, वे असाधारण आत्मसाक्षात्कारी महापुरुष हैं ।

दरअसल सबसे ब‹डी समस्या यह है कि सारे आरोप हिन्दू संतों पर ही लगाये जाते हैं क्योंकि हिन्दू चुपचाप सब सह लेता है । दुनिया के और किसी धर्म में ऐसा होने पर क्या होता है यह किसीसे छुपा नहीं है । हमारी उदारता और सहिष्णुता का दुरुपयोग किया जाता है । तभी तो महापुरुषों को बदनाम करने का षड्यंत्र चलता ही रहा है, फिर चाहे कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य स्वामी श्री जयेन्द्र सरस्वतीजी हों या फिर सत्य साँर्इं बाबा हों । आरोप लगानेवालों ने तो माता सीताजी व भगवान श्रीकृष्ण पर भी लांछन लगाया था । ऐसे में यह कल्पना कैसे की जा सकती है कि समाज को संगठित कर दिव्य भारतीय संस्कृति की विश्व-क्षितिज पर पताका लहरानेवाले विश्ववंदनीय संत पर आरोप न लगाये जायें ? संत तो स्वभाव से ही क्षमाशील होते हैं लेकिन उनके भक्त अपमान बर्दाश्त करनेवाले नहीं हैं । झूठ के खिलाफ सत्य की यह धधकती मशाल अन्याय और अत्याचार के अँधेरे को कुचलकर ही रहेगी ।

– श्री निलेश सोनी (वरिष्ठ पत्रकार)

प्रधान सम्पादक, ‘ओजस्वी है भारत !’

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Saint and People

काशी सुमेरु पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य श्री स्वामी नरेन्द्रानंद सरस्वतीजी महाराज


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षड्यंत्रों के तहत हिन्दू समाज पर अन्याय, अत्याचार बंद किया जाना चाहिए । संतों के सम्मान, स्वाभिमान की रक्षा होनी चाहिए ।

अगर संतों को जेल में डालकर बदनाम करने का षड्यंत्र होता रहा तो भारत की अस्मिता, भारत की संस्कृति सुरक्षित नहीं रह पायेगी । इसे सुरक्षित रखने के लिए सबको एकजुट हो के प्रयास करना होगा । और वह दिन दूर नहीं कि आशारामजी बापू आप सब लोगों के बीच में आयेंगे, आरोपों से बरी होंगे और राष्ट्रहित, समाजहित होगा ।

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Dirty politics (घिनौनी राजनीति)


Dirty politics (घिनौनी राजनीति)

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कितना घिनौना दुष्प्रचार ! कितनी घिनौनी राजनीति !

छिदवाड़ा गुरुकुल की सहेलियों को जाते-जाते आरोप लगानेवाली लड़की कहती गयी कि ‘‘अब देखना गुरुकुल का क्या होता है ! मैं अपना नाम करूँगी । गुरुकुल की जड़ उखाड़ के रख दूँगी । न होगा गुरुकुल, न मुझे आना प‹डेगा ।”

यह बात आरोप करनेवाली लड़की की सहेली ने अपने पिता को बतायी और अन्य लोगों तक पहुँची, हम तक भी पहुँची । छिदवाड़ा से शाहजहाँपुर १००० कि.मी. से अधिक व शाहजहाँपुर से जोधपुर १००० कि.मी. से अधिक, कुल २००० कि.मी. से अधिक अंतर हो जाता है । अब सोचो, इतने दूर से माँ-बाप के साथ लड़की को बुलाकर, माँ बाहर बरामदे में बैठी है, बाप भी वहीं है उस समय उसका मुँह दबाकर हाथ घुमाते रहे… क्या ऐसा सम्भव है ? ‘मैं चिल्लाती रही और माँ-बाप को भी नहीं सुनायी दिया ! पास में स्थित किसान के घर में रहनेवालों को भी सुनायी नहीं दिया !’ कैसी कपोलकल्पित कहानी है !

दुष्कर्म नहीं हुआ और यह बात लड़की स्वयं बोलती है, उसकी मेडिकल रिपोर्ट भी बोलती है । मुँह दबाया हो ऐसी कहीं कोई खरोंच भी लैबोरेटरी रिपोर्ट में नहीं पायी गयी । फिर भी ‘दुष्कर्म है, दुष्कर्म है…’ – ऐसा मीडिया का दुष्प्रचार कितना घिनौना है ! राजनीति कितनी घिनौनी है ! साजिशकर्ताओं की, धर्मांतरणवालों की साजिश कितनी घिनौनी है ! कोई भी समझ सकता है आसानी से कि साजिश है, राजकारण है, मनग‹ढंत कहानी है । और पाँच दिन बाद न जोधपुर में न शाहजहाँपुर में, एफआईआर दर्ज की जाती है दिल्ली में रात को २-४५ बजे ! यह तथ्य तो साजिश की पोल ही खोल देता है । पुलिस पर ऊपर से दबाव ऐसा था कि उनको तो मानसिक दबाव देकर बापूजी से हस्ताक्षर ही कराने थे, वे उन्होंने करवा लिये । दो-दो, तीन-तीन दिन का जागरण और मानसिक दबाव… पुलिस के मनमाफिक लिखे हुए कागजों पर व कोरे कागजों पर हस्ताक्षर करवा के लाखों-करो‹डों लोगों को सताने व उनकी भावनाओं को ठेस पहुँचाने का काम किया गया । इस घिनौनी साजिश से तो हृदय भी काँपता है, कलम भी काँपती है । आश्चर्य है ! आश्चर्य है !! आश्चर्य है !!!

सत्यवक्ताओं, ‘ऋषि प्रसाद’ के पाठकों को,साधकों को, और ashram.org के Viewers को  भगवान दृढ़ता दे और सुंदर, सुहावनी सूझबूझ दे । भारतीय संस्कृति को मिटानेवालों की संतों को बदनाम करने की मलिन मुरादें नाकाम हों । सभी संतों, प्रवक्ताओं और पाठकों को ईश्वर विशेष-विशेष आत्मबल, ओज अवश्य-अवश्य प्रदान करते हैं । ॐ ॐ ॐ… उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति, पराक्रम – ये छः सद्गुण जहाँ, पद-पद पर प्रभु की प्रेरणा-सहायता वहाँ ! ॐ ॐ ॐ…

करोड़ो भक्तों को, जिन्होंने आँसू बहाये, जप किया, धरना दिया, धैर्य, शांति का परिचय दिया व कुप्रचार को सुप्रचार से काटने का यह भगीरथ कार्य किया और करते रहेंगे, उनको और उनके माता-पिता को धन्यवाद है ! धन्या माता पिता धन्यो…

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संस्कृति-रक्षक प्राणायाम


दूरद्रष्टा पूज्य बापूजी द्वारा ९ वर्ष पहले ‘संस्कृति-रक्षार्थ’ बताया गया सरल प्रयोग,

जो साथ में देता है शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक प्रसन्नता भी

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संत सताये तीनों जायें, तेज बल और वंश ।

ऐसे ऐसे कई गये, रावण कौरव और कंस ।।

भारत के सभी हितैषियों को एकजुट होना पड़ेगा । भले आपसी कोई मतभेद हो किन्तु संस्कृति की रक्षा में हम सब एक हो जायें । कुछ लोग किसीको भी मोहरा बना के दबाव डालकर हिन्दू संतों और हिन्दू संस्कृति को उखाड़ना चाहें तो हिन्दू अपनी संस्कृति को उखड़ने नहीं देगा । वे लोग मेरे दैवी कार्य में विघ्न डालने के लिए कई बार क्या-क्या षड्यंत्र कर लेते हैं । लेकिन मैं इन सबको सहता हुआ भी संस्कृति के लिए काम किये जा रहा हूँ । स्वामी विवेकानंदजी ने कहा : “धरती पर से हिन्दू धर्म गया तो सत्य गया, शांति गयी, उदारता गयी, सहानुभूति गयी, सज्जनता गयी ।’’

गहरा श्वास लेकर ॐकार का जप करें, आखिर में ‘म’ को घंटनाद की नार्इं गूँजने दें । ऐसे ११ प्राणायाम फेफड़ो की शक्ति तो बढ़ायेंगे, रोगप्रतिकारक शक्ति तो बढ़ायेंगे साथ ही वातावरण में भी भारतीय संस्कृति की रक्षा में सफल होने की शक्तिअर्जित करने का आपके द्वारा महायज्ञ होगा ।

मुझे आपके रुपये-पैसे नहीं चाहिए, बल्कि भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए आप रोज ११ प्राणायाम करके अपना संकल्प वातावरण में फेंको । इसमें विश्वमानव का मंगल है । ॐ… ॐ… ॐ… हो सके तो सुबह ४ से ५ बजे के बीच करें । यह स्वास्थ्य के लिए और सभी प्रकार से बलप्रद होगा । यदि इस समय न कर पायें तो किसी भी समय करें पर करें अवश्य । कम-से-कम ११ प्राणायाम करें, ज्यादा कितने भी कर सकते हैं । अधिकस्य अधिकं फलम् ।

हम चाहते हैं सबका मंगल हो । हम तो यह भी चाहते हैं कि दुर्जनों को भगवान जल्दी सद्बुद्धि दे, नहीं तो समाज सद्बुद्धि दे । जो जिस पार्टी में है… पद का महत्त्व न समझो, अपनी संस्कृति का महत्त्व समझो । पद आज है, कल नहीं है लेकिन संस्कृति तो सदियों से तुम्हारी सेवा करती आ रही है । ॐ का गुंजन करो, गुलामी के संस्कार काटो !

दुर्बल जो करता है वह निष्फल चला जाता है और लानत पाता है । सबल जो कहता है वह हो जाता है और उसका जयघोष होता है । आप सबल बनो !

नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः ।

(मुण्डकोपनिषद् : ३.२.४)

विधि : सुबह उठकर थोड़ी देर शांत हो जाओ, भगवान के ध्यान में बैठो । ॐ शांति… ॐ आनंद… करते-करते आनंद और शांति में शांत हो जायें । सुबह की शांति प्रसाद की जननी है, सद्बुद्धि की जननी है । फिर स्नान आदि करके खूब श्वास भरो, त्रिबंध करो – पेट को अंदर खींचो, गुदाद्वार को अंदर सिकोड़ लो, ठुड्डी को छाती से लगा लो । मन में संस्कृति-रक्षा का संकल्प दोहराकर भगवान का नाम जपते हुए सवा से डेढ़ मिनट श्वास रोके रखो । फिर श्वास छोड़ो । श्वास लेते और छोड़ते समय ॐकार का मानसिक जप करते रहें । फिर ५० सेकंड से सवा मिनट तक श्वास बाहर रोक सकते हैं । मन में ॐकार या भगवन्नाम का जप चालू रखो । शरीर में जो भी आम (कच्चा, अपचित रस) होगा, वायुदोष होगा, वह खिंच के जठर में स्वाहा हो जायेगा । वर्तमान की अथवा आनेवाली बीमारियों की जड़े स्वाहा होती जायेंगी । आपकी सुबह मंगलमय होगी और आपके द्वारा मंगलकारी परमात्मा मंगलमय कार्य करवायेगा । आपका शरीर और मन निरोग तथा बलवान बन के रहेगा ।

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सत्संग, Bapuji, Guru-Bhakti

गुरु गुरु होते हैं…


 

asaram bapuji , ashram bapuji

गुरु गुरु होते है

गुरुओं  की  कृपा  एवं आत्मीयता  तभी  हमारे अंतःकरण को रंगेगी जब हम उनके साथ श्रद्धा-भक्ति से जुड़ जायेंगे, तदाकार हो जायेंगे । नहीं तो एक-एक विकार को मिटाने के लिए हमें बहुत मजदूरी करनी पड़ेगी ।

गुरु से यदि सच्ची प्रीति जुड़ गयी तो फिर दोष न जाने किस कोने में जाकर क्षीण हो जायेंगे अथवा पलायन कर जायेंगे इसका भी पता नहीं चलेगा । ‘ मुझमें दोष हैं ‘  यह याद करके उन्हें निकालना तो ठीक है लेकिन ऐसे निर्दोष गुरुओं का एवं आत्मा का चिंतन इतना गहरा हो कि दोष की याद ही न आये यह उससे भी अनंतगुना अधिक लाभकारक है ।

भगवान की मूर्ति में और तीर्थ में तो श्रद्धा हो जाती है लेकिन सद्गुरु में श्रद्धा होना कठिन है । सद्गुरु में श्रद्धा होना अर्थात् उनमें कभी कोई भी दोष न देखना। लेकिन… उनमें कभी-न-कभी, कोई-न-कोई दोष, कुछ-न-कुछ कमी दिख ही जायेगी और जैसा दोष अपने चित्त में होगा वैसा दिखेगा जरूर । रामकृष्ण परमहंस के प्रति विवेकानंद की दोष दृष्टि सात बार हुई थी । कभी विवेकानंद को रामकृष्ण परमहंस ने कृपा करके सँभाल लिया तो कभी विवेकानंद ने सच्चे हृदय से प्रायश्चित्त करते हुए माफी माँगते हुए निवेदन कर दिया कि : ‘ मुझे आपके लिए ऐसा-ऐसा भाव आता है । ‘

गुरु के बाह्य व्यवहार को न देखकर गुरु के संकेत को समझना चाहिए । अभी आपके पास गुरुतत्त्व का चश्मा ही नहीं है । अपनी जीवत्व की निगाहों से आप गुरु को कितना और कैसे देखोगे ? अगर गुरु को अपनी तुच्छ मति से मापने-तौलने की कोशिश की तो आपकी खोपड़ीरूपी तराजू टुकड़े-टुकड़े हो जायेगी । गुरु आपकी बुद्धि द्वारा तौलने का विषय नहीं हैं, वरन् गुरु तो गुरु हैं ।

गोरखनाथ के चित्त में भी एक बार कुछ ऐसा ही भाव आ गया था । एक बार उनके गुरु मछन्दरनाथ चल दिये स्त्रियों के देश में । वहाँ की रानी के साथ उनकी शादी भी हो गयी और दो बच्चे भी हो गये । तब लोग गोरखनाथ से कहने  लगे : “ बड़ा आया गुरु का  भक्त ! बड़ा आया मछन्दरनाथ की जय बुलवानेवाला! तेरे गुरु तो भ्रष्ट हो गये… “

गोरखनाथ से नहीं सहा गया । गोरखनाथ सोचने लगे कि : ‘ जहाँ मेरे गुरुदेव पहुँचे हैं उस स्त्रियों के देश में मैं कैसे जाऊँ ? क्योंकि वहाँ तो यति, योगी, त्यागी, साधुओं को प्रवेश की आज्ञा ही नहीं है । राज्य का सारा कार्यभार स्त्रियाँ ही सँभालती हैं । ऐसे देश में जाकर गुरुदेव से संपर्क  कैसे करूँ ? ‘

उस  त्रिया राज्य की रानी ने हनुमानजी को प्रसन्न करके मछन्दरनाथ को पाया था ।

गोरखनाथ ने उस राज्य में जाकर गुरुदेव से संपर्क करने का उपाय खोज लिया । उन्होंने वहाँ की नृत्य-गान करनेवाली नर्तकियों से संपर्क किया और कहा : “ मुझे अपने राजदरबार में ले चलो । “

तब नर्तकियों ने कहा : “ हम तुम्हें नहीं ले जा सकते क्योंकि तुम पुरुष हो । “

“ मुझे स्त्रियों के कपड़े पहनाकर ले चलो । मैं ढोलक तो बजाऊँगा लेकिन पैसा एक भी नहीं लूँगा। “

नर्तकियों में जो मुख्य नर्तकी थी उसने सोचा कि : ‘ ऐसा बिना पैसेवाला और इतना सुन्दर ढोलक बजानेवाला कहाँ मिलेगा ? चलो, इसे ले चलते हैं । ‘

गोरखनाथ को लेकर वे चल प‹डीं राजदरबार की ओर । राजदरबार में जाकर गोरखनाथ ने सारा मामला समझ लिया और नृत्य-गान के समय ढोलक में से आवाज निकाली :

चेत मछन्दर गोरख आया…

चेत मछन्दर गोरख आया…

अब शिष्य के सामने मछन्दरनाथ नृत्य-गान कैसे देख सकते थे ? अतः उन्होंने  सब  नाच-गान करनेवालों को रवाना कर दिया । सबके जाते ही गोरखनाथ ने अपना असली स्वरूप प्रगट कर दिया :

“ अलख ! आदेश । “

गुरुदेव को प्रणाम किया और कहा : “ गुरुदेव ! आप इस चक्कर में कैसे ? “

गुरुदेव ने कहा : “ चलो, वापस चलते हैं किन्तु इन बच्चों को भी ले चलना होगा । “

गोरखनाथ : “ जो आज्ञा । “

गोरखनाथ की श्रद्धा थी गुरुचरणों में । अतः बच्चों को तो वे ले चले किन्तु मन में सोचा कि : ‘ यह कचरा? विरक्त योगी का कैसे ? ‘

मार्ग में बच्चों को हाजत हुई तब मछन्दरनाथ ने कहा : “ जाओ गोरख ! इन्हें ले जाओ और धो-धाकर ठीक कर दो । “

गोरखनाथ उन्हें ले गये तालाब के पास और तालाब में डुबा-डुबाकर, जैसे कपड़े को धोते हैं वैसे ही उन्हें भी धो डाला । शिला पर पटकने से दोनों के प्राणपखेरू उड़ गये । फिर गोरखनाथ उन्हें काँटों की बाड़ पर सुखाकर आ गये ।

मछन्दरनाथ : “ कहाँ गये दोनों ? “

गोरखनाथ : “ गुरुजी ! आपने ही तो कहा था कि दोनों को धो-धाकर ठीक करके आओ तो मैं उन्हें धोकर, ठीक करके, सुखाकर आया हूँ । “

मछन्दरनाथ : “ अच्छा अच्छा, कोई बात नहीं । चलो आगे । “

आगे चलकर मछन्दरनाथ को हाजत हुई अतः उन्होंने गोरखनाथ को झोला देते हुए कहा : “ गोरख! जरा ध्यान रखना । इसमें फिकर है । “

मछन्दरनाथ  तो  लोटा  लेकर  चलते  बने । गोरखनाथ को हुआ कि : ‘ इसमें कौन-सी फिकर   होगी ? ‘  देखा तो सोने की र्इंट ! गोरखनाथ ने र्इंट उठाकर कुएँ में फेंक दी ।

मछन्दरनाथ आये और पूछा : “ बेटा ! इसमें जो फिकर थी, वह कहाँ गयी ? “

गोरखनाथ : “ गुरुजी ! आपने ही तो साधनाकाल में बताया था कि फिकर फेंक कुएँ में तो मैंने गुरु की फिकर कुएँ में फेंक दी । “

यहाँ तक तो गोरखनाथ सत्शिष्य से दिख रहे हैं लेकिन अब… चलते-चलते कोई गाँव आया तब मछन्दरनाथ ने कहा : “ गोरख ! तू जा जरा आगे । मैं बाद में आता हूँ । “

गोरखनाथ आगे निकल पड़े । गाँव में जाकर देखते हैं कि खूब तैयारियाँ हो रही हैं । कहीं तोरण बाँधे जा रहे हैं तो कहीं रंगोली पूरी जा रही है । कहीं मंडप बाँधे जा रहे हैं तो कहीं ब्राह्मण उत्सव की तैयारी में लगे हैं । पूरे गाँव को उत्सव की तैयारी में लगा हुआ देखकर गोरखनाथ ने पूछा :

“ क्या बात है ? “

तब किसीने कहा : “ अरे ! तुम्हें पता नहीं ? गोरखिया के गुरु मछन्दरनाथ १२ साल से यहाँ गुफा में समाधि में बैठे हैं । समाधि से उठकर वे बाहर आ रहे हैं । “

“ क्या ? मछन्दरनाथ  तो  एक  ही  हैं और गोरखनाथ भी तो दूसरा नहीं है । “

“ हाँ हाँ, गोरखनाथ एक ही है । वही गोरख, वही सिद्ध, जिसे अपनी सिद्धाई का बड़ा गर्व है । उसीके गुरु यहाँ १२ साल से रहते हैं । “

“ तुमने कभी देखा भी है गुरुदेव को ? “

“ हाँ हाँ, क्यों नहीं ? हर अमावस, पूनम को हम वैदिक  मंत्रों  का  उच्चारण  करते  हैं और  गुरुदेव मछन्दरनाथ हमें दर्शन देते हैं । “

गोरखनाथ को हुआ कि ‘ ये कौन-से मछन्दरनाथ हैं ? देखना पड़ेगा । ‘  गोरखनाथ ने तो बराबर जासूसी की । गुफा वगैरह सब देखा और चक्कर मारा तो देखा कि गुफा में कहीं से भी घुसने की जगह नहीं थी । फिर वे भी किसी जगह से सारा नजारा देखने लगे ।

समय हुआ । शहनाइयाँ,  बिगुल, बाजे और तुरही आदि बजने लगे । धूप-दीप से वातावरण सुगंधित होने लगा । ब्राह्मणों ने वैदिक मंत्रों का उच्चारण करते-करते गुफा का ताला खोला । गुरुदेव मछन्दरनाथ बाहर पधारे ।

आश्चर्य ! गुरुदेव कल तक तो मेरे साथ थे और आज यहाँ !! यह कैसे संभव हुआ !!!

मछन्दरनाथ बोले : “ क्या देखता है गोरख ? गुरु गुरु होते हैं । “

यह एक जीव में से अनेक जीववाद का सिद्धांत है कि एक ऐसी अवस्था भी आती है कि एक शरीर से योगी तप कर रहा हो, दूसरे शरीर से भोग भोग रहा हो और तीसरे शरीर से भजन कर-करवा रहा हो… ऐसा भी कई योगियों के जीवन में संभव होता है जैसे, श्रीकृष्ण ।

अन्तःकरण में यह सारा सामथ्र्य उस आत्मदेव से ही आता है । जैसे आपके अन्तःकरण में सपने की दुनिया बन जाती है वैसे ही आपके अंतःकरण में इतना प्रगा‹ढ सामथ्र्य भी आ सकता है कि आप एक में से अनेक रूप भी बना सकते हैं । फिर भी तत्त्वज्ञान के आगे यह बहुत छोटी बात है ।

तत्त्वज्ञान पाने के लिए ऐसे गुरु चाहिए कि जो आत्मा-परमात्मा के साक्षात्कार के आगे किसी ऋद्धि-सिद्धि को, किसी चमत्कार को ज्यादा महत्त्व न दें । ऐसे गुरुओं से अगर मुलाकात हो जाये तो बेड़ा पार हो जाय ।

मरे हुए को जिन्दा करने की विद्या भी होती है और जिनको आत्मज्ञान हो गया है उनके चित्त में सहज में संकल्प होने पर भी मृतक व्यक्ति जीवित हो सकता है । मृतक को जीवित करनेवाली संजीवनी विद्या जाननेवालों की अपनी स्थिति होती है लेकिन जब किन्हीं ब्रह्मवेत्ता के चित्त में सहज में स्फुरणा हो जाती है तब ब्रह्मवेत्ता नहीं करता है वरन् ब्रह्म स्वभाव में स्पंदन हो जाता है और मृतक जीवित हो जाता है ।

संजीवनी विद्या से जीवनदान अलग बात है और ब्रह्मवेत्ता महापुरुष के संकल्प से जीवनदान अलग बात है । कभी-कभी सिद्धियाँ आत्मवेत्ता महापुरुष में भी दिखती हैं तो कभी-कभी अज्ञानी जीवों में भी सिद्धियाँ होती हैं । अपने-अपने विषय की साधना करके अज्ञानी जीव भी कुछ-कुछ सिद्धियाँ पा लेते हैं । अष्ट सिद्धियाँ प्राप्त किया हुआ व्यक्ति भी ब्रह्मज्ञानी हो यह जरूरी नहीं है ।

रामकृष्ण परमहंस के पास तोतापुरी गुरु के मिलने से पूर्व ही सिद्धाई थी । माँ काली को पुकारने पर माँ का प्रगट होना यह सिद्धाई नहीं तो क्या है ? फिर भी तोतापुरी सद्गुरु की जब कृपा प्राप्त हुई तभी उन्हें आत्मज्ञान हुआ ।

ऐसी  आत्मज्ञानरूपी  परम  कृपा  बरसानेवाले सद्गुरु जब मिल जाते हैं और सत्शिष्य जब उन्हें समझ लेता है तब काम बन जाता है ।  फिर शिष्य के लिए किसी होम-हवन, यज्ञ-यागादि एवं देवी-देवता की उपासना करना शेष नहीं रहता, वरन् उसके लिए तो सद्गुरु ही उपास्य देव हो जाते हैं ।

सुपात्र मिले  तो  कुपात्र को  दान  दिया  न  दिया,

सत्शिष्य मिला तो कुशिष्य को ज्ञान दिया न दिया ।

सूर्य उदय  हुआ  तो  और  दीया  किया  न  किया,

कहे     कवि     गंग     सुन     शाह    अकबर !

पूर्ण गुरु मिले तो और को नमस्कार किया न किया ।।

ब्रह्मज्ञान पूर्ण ज्ञान है । यह आत्मा और ब्रह्म अभिन्न है ऐसा ज्ञान पूर्ण ज्ञान है । तू देह नहीं है और देह तथा जगत का संबंध मिथ्या है जबकि तेरा और ब्रह्म का संबंध शाश्वत है ऐसा अनुभव करानेवाले पूर्ण गुरु कभी-कभी, कहीं-कहीं, बड़ी मुश्किल से मिलते हैं और मिलते भी हैं तो साधारण जीवों की नार्इं खाने-पीने, पहनने-ओ‹ढनेवाले दिखते हैं । अतः उनमें श्रद्धा होना कठिन होता है ।

ईश्वरोगुरुरात्मेति  मूर्तिभेदे  विभागिनः ।

व्योमवत् व्याप्तदेहाय तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।

गुरु भले सामान्य मनुष्य की तरह दो हाथ-पैरवाले दिखें लेकिन अनंत-अनंत ब्रह्माण्डों में व्याप्त होते हैं । आकाश कितना व्यापक होता है किन्तु वह आकाश भी उनके भीतर होता है इतने वे व्यापक होते हैं । इसलिए शिष्य कभी यह न सोचे कि : ‘ गुरु ने जब मंत्रदीक्षा दी थी केवल उसी समय गुरु मेरे पास थे और अब मैं कहीं जाकर सीधा-टे‹ढा करूँगा तो गुरु को पता नहीं चलेगा । ‘  गुरु भले कहें-न-कहें लेकिन अंतरात्मभाव से गुरु वहाँ भी फटकारते हैं कि : ‘ ऐ ! क्या करता है ? ‘

अगर अच्छा काम करते हैं तो अंतर्यामी रूप से गुरु प्रेरणा भी देते हैं कि : ‘ ठीक है… शाबाश है, बेटा! ‘  प्रत्येक शिष्य को इस बात का अनुभव होगा ।

दीक्षा के निमित्त से गुरु-शिष्य के बीच एक सूक्ष्म तार जुड़ जाता है । अगर आपके चार पैसे के यंत्र ‘ कोर्डलेस ‘  का बटन दबाने पर सेटेलाइट से अमेरिका में घंटी बज सकती है तो यह तो मंत्र है । मंत्र से मन सूक्ष्म, मन से मति सूक्ष्म, मति से जीव सूक्ष्म, जीव से प्रकृति सूक्ष्म और प्रकृति से भी परब्रह्म परमात्मा को पाये हुए महापुरुषों का तत्त्व सूक्ष्म होता है और आपका भी तत्त्व सूक्ष्म है तो गुरु को पता क्यों नहीं चलेगा ? चीज जितनी सूक्ष्म होती है उतनी व्यापक होती है । जितनी सूक्ष्म होती है उतनी ही प्रभावशाली होती है । पानी की एक बूँद को गर्म करो तो वाष्प बनने पर उसमें १३०० गुनी ताकत आ जाती है । ऐसे ही अपने मन को साधन-भजन और संयम से सूक्ष्म कर दो तो उसमें भी बड़ी शक्ति आ जाती है । मन को तो साधन-भजन से सूक्ष्म कर भी लिया लेकिन जिसकी सत्ता से साधन-भजन किया वह तो परम सूक्ष्म है । उसका ज्ञान पा लो तो फिर सूक्ष्म करने की भी जरूरत नहीं पड़ती ।

यह बड़ी सूक्ष्म बात है । इस तत्त्वज्ञान की बात को सुनने का मौका देवताओं को भी नहीं मिलता क्योंकि वे भोग-सुख में ही मस्त रहते हैं । उनके पास बुद्धि तो होती है किन्तु वह बुद्धि भोग-सुख में ही खर्च हो जाती है । आत्मज्ञान में रुचि पुण्यवानों को ही होती है । तुलसीदासजी ने भी कहा है :

बिनु पुन्य पुंज मिलही नहीं संता ।

पुण्य नहीं, पुण्यों का पुंज जब एकत्रित होता है तब संत मिलते हैं, संतों के पास जाने की रुचि होती है । किसीने कहा है कि :

“ अगर सात जन्मों के पुण्य हों तभी आत्म-साक्षात्कारी संत के द्वार पर जाने की इच्छा होती है किन्तु जा नहीं पाते, कोई-न-कोई काम आ जाता है । दूसरे सात जन्म के अर्थात् १४ जन्म के पुण्य जोर करते हैं तब उनके द्वार पर तो जा सकते हैं किन्तु वे आयें उसके पहले ही होगा कि ‘ फिर कभी आयेंगे ‘  या  कार्यक्रम पूरा होने पर ही पहुँच पाते हैं। जब तीसरे सात जन्म के अर्थात् २१ जन्म के पुण्य जोर करते हैं तभी उनके सान्निध्य में, उनके चरणों में पहुँच पाते हैं और उनके दैवी कार्यों एवं अनुभवों से जुड़ पाते हैं । “

वर्तमान समय में विदेशी ताकतों द्वारा भारतीय संस्कृति को नष्ट करने का बड़ा गहरा षड्यंत्र चल रहा है । इसके तहत संस्कृति के आधारस्तम्भ संतों-महापुरुषों को झूठे, कपोलकल्पित, घिनौने मामलों में फँसाकर लोगों की आस्था तथा निष्ठा तोड़ने का कार्य किया जा रहा है, जो कि देशद्रोह है । आज मीडिया द्वारा देश के सम्मानीय लोगों, समाजसेवी संस्थाओं के प्रमुखों यहाँ तक कि हमारे आस्था केन्द्र संत-महापुरुषों के कार्टून बनाकर मजाक उड़ाना इत्यादि असंवैधानिक व निम्न स्तर का कार्य हो रहा है । इससे समाज का नैतिक पतन हो रहा है तथा मानवीय मूल्यों का हनन हो रहा है ।

हाल ही में पूज्य संत श्री आशारामजी बापू को षड्यंत्र के तहत झूठे आरोप लगवाकर फँसाया गया और अब मीडिया द्वारा रोज कुछ-न-कुछ बिना किसी प्रमाण के झूठी व बेबुनियाद खबरें दिखाकर समाज व देश की जनता को गुमराह किया जा रहा है तथा इन खबरों के द्वारा न्याय-प्रणाली पर दबाव डालने की साजिश की जा रही है । देश के संत-समाज एवं साधकगण, विभिन्न धार्मिक एवं सामाजिक संगठनों ने निर्दोष पूज्य बापूजी के खिलाफ हो रही साजिश की निंदा की है एवं विभिन्न संत-सम्मेलनों एवं गोष्ठियों द्वारा बापूजी को अपना पूर्ण समर्थन व्यक्त किया है ।

हम लोग देश की जनता, कार्यपालिका, विधायिका – सबका इस ओर ध्यान आकर्षित कर संत श्री आशारामजी बापू पर लगाये गये झूठे, मनगढ़त आरोपों का पूरी तरह खंडन करते हैं और उनके साथ जो घोर अन्याय एवं अत्याचार हो रहा है, उसका प्रतिवाद करते हैं ।

क्या हा सच्चाई

क्या है सच्चाई – 1

क्या है सच्चाई -2

क्या है सच्चाई -2

षडयंत्र की पूरी वास्तविकता जानिए …

SHADYANTRA KI VASTAVIKTA

आप सभी संतो, साधकों, गुरु-भक्तों और देशवासियों की श्रद्धा सच्चे संतो मे टीकी रहे ऐसी सुभ-कामना के साथ आप सभी को हरी ॐ |

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