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निर्दोष, निष्कलंक बापू


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किसीने ठीक ही लिखा है कि हिन्दू तो वह बूढ़े काका का खेत है, जिसे जो चाहे जब जोत जाय । उदार, सहिष्णु और क्षमाशील इस वर्ग के साथ वर्षों से बूढ़े काका के खेत की तरह बर्ताव हो रहा है । हिन्दू समाज का नेतृत्व करनेवाले ब्रह्मज्ञानी संतों, महात्माओं, समाज-सुधारकों, क्रांतिकारी प्रखर वक्ताओं पर जिसके मन में जो आता है, वह कुछ भी आरोप मढ़ देता है । अब तो दुष्प्रचार की हद हो गयी, जब ७३ वर्षीय पूज्य संत श्री आशारामजी बापू पर साजिशकर्ताओं की कठपुतली, मानसिक असंतुलन वाली कन्या द्वारा ऐसा घटिया आरोप लगवाया गया, जिसका कोई सिर-पैर नहीं, जिसे सुनने में भी शर्म आती है । इससे देश-विदेश में फैले बापूजी के करोड़ो भक्तों व हिन्दू समाज में आक्रोश का ज्वालामुखी सुलग रहा है ।

कुदरत के डंडे से कैसे बचेंगे ?

आरोप लगानेवाली ल‹डकी की मेडिकल जाँच रिपोर्ट में चिकित्सकों ने आरोप को साफ तौर पर नकार दिया है । इससे स्पष्ट होता है कि यह सिर्फ बापूजी को बदनाम करने की सोची-समझी साजिश है लेकिन प्रश्न यह है कि करोड़ो भक्तों के आस्था के केन्द्र बापूजी के बारे में अपमानजनक एवं अशोभनीय आरोप लगाकर भक्तों की श्रद्धा, आस्था व भक्ति को ठेस पहुँचानेवाले कुदरत के डंडे से कैसे बच पायेंगे ? शास्त्रों में स्पष्ट लिखा है कि ‘भगवान स्वयं का अपमान सहन कर सकते हैं मगर अपने प्यारे तत्त्वस्वरूप संतों का नहीं ।’

व्यावसायिक हितों की चिंता

इन झूठे, शर्मनाक आरोपों के मूल में वे शक्तियाँ काम कर रही हैं, जो यह कतई नहीं चाहती हैं कि बापूजी की प्रेरणा से संचालित गुरुकुलों के असाधारण प्रतिभासम्पन्न विद्यार्थी आगे चलकर देश, संस्कृति व गुरुकुल का नाम रोशन करें । दुनिया जानती है कि भारतीय वैदिक गुरुकुल परम्परा पर आधारित शिक्षण एवं सर्वांगीण व्यक्तित्व निर्माण के क्षेत्र में बापूजी के मार्गदर्शन में देशभर में चल रहे गुरुकुल आज कॉन्वेंट शिक्षण पद्धति के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुके हैं । एक तरफ कई व्यावसायिक संस्थाओं की लूट इस पहाड़ के नीचे आ रही है तो दूसरी तरफ इंटरनेट और अश्लील साहित्य सामग्री के जरिये देश के भविष्य को चौपट करने की सुनियोजित साजिश पर पानी फिर रहा है । ओजस्वी-तेजस्वी भारत निर्माण के बापूजी के संकल्प को हजम कर पाना उन साजिशकर्ताओं के लिए अब काँटोंभरी राह साबित हो रहा है । ऐसे में गुरुकुलों की बढ़ती लोकप्रियता, विश्वसनीयता की छवि और मेधावी बच्चों की प्रतिभा को कुचलने के लिए अब कुछ इस तरह से कीचड़ उछाला जा रहा है कि माता-पिता अपने बच्चों को गुरुकुल में भेजें ही नहीं ।

पहले गुरुकुल के बच्चों पर तांत्रिक विद्या का मनग‹ढंत आरोप लगाया गया परंतु जब सर्वोच्च न्यायालय में इन आरोपों की हवा निकल गयी तो अब सीधे बापूजी के चरित्र पर ही कीच‹ड उछालने लगे हैं । मगर सूर्य पर थूँकने का दुस्साहस करनेवाले खुद ही गंदे हो जाते हैं । जो समाज को मान-अपमान, qनदा-प्रशंसा और राग-द्वेष से ऊपर उठाकर समत्व में प्रतिष्ठित करते हुए समत्वयोग की यात्रा करवाते हैं, भला ऐसे संत के दुष्प्रचार की थोथी आँधी उनका क्या बिगा‹ड पायेगी ? टीआरपी के पीछे दौ‹डनेवाले चैनल बापू को क्या बदनाम कर पायेंगे ? बापू के भक्तों की हिमालय-सी दृ‹ढ श्रद्धा के आगे आरोप की बिसात एक तिनके के समान है ।

चाहे धरती फट जाय तो भी सम्भव नहीं

वैसे आज किसी पर भी कीच‹ड उछालना बहुत आसान है । पहले बापूजी के आश्रम के लिए जमीन ह‹डपने, अवैध कब्जे, गैर-कानूनी निर्माण के थोकबंद आरोप लगाये गये मगर सत्य की तराजू पर सभी झूठे, बेबुनियाद साबित हुए । जब इनसे काम नहीं बना तो बापूजी और उनके द्वारा संचालित आश्रम, समितियों और साधकों पर अत्याचार किये गये लेकिन भक्तों ने इनका डटकर मुकाबला किया । साजिश करनेवालों ने हर बार मुँह की खायी । कितने तो आज भी लोहे के चने चबा रहे हैं तो कितने कुदरत के न्याय के आगे खामोश हैं परंतु बावजूद इसके आज भी बापूजी के ऊपर अनाप-शनाप आरोप लगवानेवालों को अक्ल नहीं आयी । साजिशकर्ताओं के इशारे पर बकनेवाली एक ल‹डकी ने बापूजी पर जैसा आरोप लगाया है, दुनिया इधर-की-उधर हो जाय, धरती फट जाय तो भी ऐसा सम्भव नहीं हो सकता है । यह घिनौना आरोप भक्तों की श्रद्धा, साधकों की आस्था को डिगा नहीं सकता है ।

पूरा जीवन खुली किताब

बापूजी का पूरा जीवन खुली किताब की तरह है । उसका हर पन्ना और उस पर लिखी हर पंक्ति समाज का युग-युगांतर तक पथ-प्रदर्शन करती रहेगी । बापूजी कोई साधारण संत नहीं, वे असाधारण आत्मसाक्षात्कारी महापुरुष हैं ।

दरअसल सबसे ब‹डी समस्या यह है कि सारे आरोप हिन्दू संतों पर ही लगाये जाते हैं क्योंकि हिन्दू चुपचाप सब सह लेता है । दुनिया के और किसी धर्म में ऐसा होने पर क्या होता है यह किसीसे छुपा नहीं है । हमारी उदारता और सहिष्णुता का दुरुपयोग किया जाता है । तभी तो महापुरुषों को बदनाम करने का षड्यंत्र चलता ही रहा है, फिर चाहे कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य स्वामी श्री जयेन्द्र सरस्वतीजी हों या फिर सत्य साँर्इं बाबा हों । आरोप लगानेवालों ने तो माता सीताजी व भगवान श्रीकृष्ण पर भी लांछन लगाया था । ऐसे में यह कल्पना कैसे की जा सकती है कि समाज को संगठित कर दिव्य भारतीय संस्कृति की विश्व-क्षितिज पर पताका लहरानेवाले विश्ववंदनीय संत पर आरोप न लगाये जायें ? संत तो स्वभाव से ही क्षमाशील होते हैं लेकिन उनके भक्त अपमान बर्दाश्त करनेवाले नहीं हैं । झूठ के खिलाफ सत्य की यह धधकती मशाल अन्याय और अत्याचार के अँधेरे को कुचलकर ही रहेगी ।

– श्री निलेश सोनी (वरिष्ठ पत्रकार)

प्रधान सम्पादक, ‘ओजस्वी है भारत !’

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Saint: The Life-breath of A Nation

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Tomaraja was the king of Kaivarta state. Once it so happened that a visitor from a neighboring state was insulted in Kaivarta. That person went back and said, “The citizens of our kingdom are blatantly insulted in the kingdom of Tomaraja.”

In due course the message made its way to Vishwajita, the king of that state. He said, “I cannot tolerate the insult of even a sweeper of my kingdom. I am proud of my citizens. It is the citizens; who make the king great. Of what use is the king who cannot protect his subjects from insults? O Commander, you lay a siege to the kingdom of Kaivarta, and have a firm determination to defeat that state in war. I too shall join you there if need be.”

The Commander said, “No Your Majesty! We shall manage it ourselves.”

King Vishwajita thought they would conquer King Tomaraja easily.

The king of Kaivarta no doubt was a small king, but he was the devotee and disciple of a saint who was in communion with God, the greatest of the great. This was the reason why it was found to be extremely difficult for Vishwajita to attain victory in the war. As the war continued for four days, with no significant success coming their way, the king said, “These enemies couldn’t have stood against us for even an hour, and yet just see how they are stretching it for days together with massive losses on our side! What after all is the matter? Do anything you must; for it is only by pulverizing them that we can avenge the insult of our citizen.”

The soldiers could do nothing on the war front, but one day they managed to arrest a citizen of Kaivarta, Saint Sri Devalashwaji on charges of spying; while he was passing through the area where Vishwajita’s army were camping. The saint was blissfully ignorant about the danger of passing through the enemy camps.  He wasn’t a spy, but Vishwajita thought, ‘We are not going to win the war; so why not hang this citizen of the enemy kingdom and douse the fire of venom raging in our hearts!’ He roared, “He will be sentenced to death. He will be hanged.”

Though named ‘Vishwajita’, i.e. ‘the conqueror of the world’, he was defeated by inner enemies such as anger, jealousy and egotism. One who hears satsang and conquers all passions is the true ‘Vishwajita’ otherwise so many were named ‘Vishwajita’ when they were born but they died without becoming ‘Vishwajita’ in true sense.

When the people of Kaivarta state came to know that their beloved Saint Sri Dewalashwaji had not only been arrested; but was also sentenced to death by hanging in near future; they all stopped taking food and water. They held a mass prayer. They said, ‘O God, no such an injustice should not be done to your beloved innocent saint at any cost.’ The king too was informed about this matter. He became calm for a while and began to think over the strategy ahead. When faced with some big trouble that can’t be surmounted by individual effort, one should seek support from a powerful man. Kings are generally rajasic in nature (characterized by anger, action, passion, envy etc.), yet this king thought, ‘One of their citizens was insulted and they attacked us to avenge the same; here they have captured our revered saint, who is absolutely innocent. It is altogether another issue that they have arrested him on the false charges of spying. Oh God, what should I do now? …’

One fine morning a stranger came to the royal court of Vishwajita, and said, “I have brought the message of Tomaraja, the king of the neighbouring Kaivarta.”

“I see, that’s a very small state, and still continuing the battle. So, has he now accepted defeat?”

“No, he hasn’t accepted defeat nor is he going to accept it ever; but you have arrested a saint of our state. So, king Tomaraja has sent the message that he is ready to pay 2 crores gold coins for the release of the saint.”

“2 crores! You mean 2 crores gold coins for releasing just one person!”

“He is not a mere person; he is the Soul of the universe having experienced oneness with the Supreme Consciousness. People get peace of mind listening to his pious words. People become virtuous souls on having His darshan. He is a saint.”

“Is Dewalashwaji a saint? But he has been arrested on charges of spying; and how can we release an enemy spy, even if he be a saint?”

“The king of Kaivarta has sent a request, ‘Whatever additional conditions may be put forward by you; they are all acceptable to us. If 2 crores gold coins fall short of your expectations, we won’t mind giving away our entire kingdom; but we can’t tolerate the assassination of a saint of our state.”

Vishwajita was left shocked, “What after all is so special about that saint?”

“He is a saint. He is free from ignorance. ‘I am the body and I am subject to birth and death,’ is the common notion of a worldly man. Whereas, his realization is ‘I am the Soul, I am unborn and deathless.’ The whole society earns huge religious merits just by having darshan of such a man of Knowledge; and due only to his pious presence we, a small kingdom, are able to wage war for a long time with none other than a great emperor like you. The supreme value and importance of the blessings, guidance and grace of a saint is known to the king of Kaivarta.”

“So, will Tomaraja really pay 2 crores gold coins to me?”

“Yes, certainly.”

“But, you are completely unknown to me; how can I trust you? I need some concrete evidence.”

That unknown man then extended his right hand towards the king. There was an inscription on his brilliantly dazzling ring – ‘Kaivarta-king, Tomaraja’. On seeing that, Vishwajita quickly jumped down from his throne and embraced him affectionately, saying – “O King, it’s you! You have come early in the morning to beg for the release of the saint all alone and weapon-less, without even caring for your own life! You have enlightened me to a great truth. Now, there is no question of continuing this war; please accept me as your friend. Even befriending one; who is protected by a saint is sure to bring me good.” The massacre of soldiers was stopped, the bloodshed came to an end; and there was a blessed flow of love all around.

I would like to congratulate the Kaivarta-king, Tomaraja a thousand times. Who can ever harm the kingdom; which is protected by a saint; and whose ruler is a great Guru-Bhakta like King Tomaraja. Since then the two neighboring states became allies.

संत : राष्ट्र के प्राणाधार

कैवर्त राज्य का राजा था तोमराज । पडोसी राज्य से आये किसी व्यक्ति का कैवर्त में अपमान हो गया । वह अपने राज्य में जाकर बोला : “कैवर्त-सम्राट तोमराज के राज्य में हमारे राज्य के नागरिकों का अपमान हो रहा है ।”

राजा विश्वजित तक बात पहुँची । राजा ने कहा : “मेरे राज्य के झाडू लगानेवाले का भी कोई अपमान करेगा तो हम बर्दाश्त नहीं करेंगे । हमारे नागरिक हमारी शान हैं । नागरिक हैं तो राजा है । जब नागरिक का अपमान होता है तो राजा किस काम का ? जाओ सेनापति ! कैवर्त-सम्राट तोमराज के राज्य को घेरा डालो और उस राज्य को परास्त करने का दृढ़ निश्चय करो । जरूरत पडी तो मैं भी आ जाता हूँ ।”

सेनापति : “नहीं राजन् ! हम निपटा लेंगे ।”

राजा विश्वजित ने सोचा कि ‘तोमराज को यूँ जीत लेंगे…’ कैवर्त-सम्राट था तो छोटा राजा लेकिन बडे-में-बडे जो परमात्मा हैं, उससे मिले हुए संत का भक्त था, शिष्य था । इसलिए विश्वजित को युद्ध जीतना भारी पड रहा था, युद्ध में कोई सफलता नहीं मिल रही थी । १ दिन, २ दिन, ३ दिन, ४ दिन बीते… बोले : “ये तो १ घंटे के ग्राहक थे लेकिन ४-५ दिन हो गये और हमारी सेना मारी जा रही है ! आखिर क्या है ? कुछ भी करो, हमारे नागरिक के अपमान का बदला उस राज्य की मिट्टी पलीत करने से ही होगा ।”

सैनिक और तो कुछ कर नहीं पाये लेकिन एक दिन कैवर्त-सम्राट के नागरिक, संत देवलाश्वजी विश्वजित के सैनिक-खेमों के पास से गुजरे तो विश्वजित के सैनिकों ने उनको जासूसी के गुनाह में पकड लिया । अब उन संत को तो पता भी नहीं था कि यहाँ से गुजरना है कि नहीं ! जासूस तो थे नहीं लेकिन विश्वजित ने सोचा, ‘शत्रु राज्य का नागरिक है न, और उसको हम जीत नहीं सकते हैं तो चलो, उनके एक आदमी को ही फाँसी देकर अपनी जलन निकालें ।’ वह गुस्से में बोला : “इनको फाँसी की सजा दी जायेगी !”

नाम तो था विश्वजित लेकिन भीतर से क्रोध के आगे, द्वेष और अहंकार के आगे हारा हुआ था । विश्वजित तो वह है जो सत्संग के द्वारा विकारों को हरा दे, बाकी तो कई विश्वजित पैदा हो के मर गये ।

कैवर्त राज्य के लोगों ने सुना कि उनके संत देवलाश्वजी बंदी बनाये गये हैं और उनको फाँसी की सजा सुना दी गयी है । लोगों ने खाना-पीना छोड दिया । भगवान को पुकारने लगे : ‘हे भगवान ! कुछ भी हो, तुम्हारे प्यारे संत, निर्दोष संत के साथ ऐसा अन्याय न हो !’ सम्राट के कान बात गयी । कैवर्त-सम्राट शांत हो गया और सोचने लगा कि ‘अब क्या करें ?’

जब कोई ब‹डी मुसीबत आये और अपने बलबूते से वह हटायी नहीं जा सके तो किसी-न-किसी बलवान की शरण लेनी चाहिए । सम्राट तो रजोगुणी होते हैं किन्तु यह सम्राट सोचने लगा, ‘उनके देश के किसी नागरिक का अपमान हुआ तो वे हमारे देश पर चढाई करते हैं और अब तो हमारे देश के संत को ही उन्होंने पकड लिया है । मेरे देश के संत निर्दोष हैं, वे लोग भले दोष मान लें जासूसी का । अब हम क्या करें प्रभु ?…’

एक सुबह एक अनजान व्यक्ति पहुँचा विश्वजित के राजदरबार में और बोला : “मैं पडोसी देश का संदेशा लाया हूँ, कैवर्त-सम्राट तोमराज का ।”

“अच्छा ! वह तो छोटा-सा राज्य है, अभी तक लोहा ले रहा है । अब क्या उसने हार मान ली ?”

“नहीं, उन्होंने हार तो नहीं मानी और वे हारेंगे भी नहीं किन्तु हमारे राज्य के संत को आपने बंदी बनाया है । सम्राट तोमराज ने कहा है कि २ करोड़  स्वर्णमुद्राएँ ले लो और हमारे संत को रिहा कर दो ।”

“२ करोड़  ! एक व्यक्ति के लिए २ करोड़  स्वर्णमुद्राएँ !”

“वे व्यक्ति नहीं हैं, विश्वात्मा हैं । परमात्मा से उनका मन जुड़ा हुआ है । उनकी वाणी से लोगों को शांति मिलती है । उनके दर्शन से लोग पुण्यात्मा हो जाते हैं । वे संत हैं ।”

“देवलाश्वजी संत हैं ? वे तो जासूसी के गुनाह में पकड़े गये हैं और शत्रु का जासूस चाहे संत हो, हम कैसे छोड सकते हैं ?”

“कैवर्त-सम्राट ने प्रार्थना भेजी है कि और जो भी कुछ आप शर्त रखें, हमें कबूल है । २ करोड़  स्वर्णमुद्राएँ अगर कम लगें तो मैं अपना राज्य देने से भी चूकूँगा नहीं । हमारे देश के संत की हत्या हम बर्दाश्त नहीं करेंगे ।”

विश्वजित की आँखें फटी रह गयीं : “आखिर तो उस संत में क्या है ?”

“वे संत हैं, उनके अज्ञान का अंत हो गया है । ‘मैं शरीर हूँ और जन्मता-मरता हूँ’- यह संसारी लोग मानते हैं । ‘मैं आत्मा हूँ, अजन्मा हूँ’- ऐसा ज्ञान उन्हें हुआ है । ऐसे पुरुष के दर्शन से समाज का पुण्य बढ़ता है और ऐसे पुरुष हैं तो हमारा छोटा-सा राज्य भी आपके इतने बडे चक्रवर्ती राज्य से लोहा लेने में सफल हो रहा है । संत का आशीर्वाद, मार्गदर्शन, कृपाप्रसाद… वह तो हमारे कैवर्त-सम्राट तोमराज जानते हैं ।”

“क्या २ करोड़  स्वर्णमुद्राएँ दे देंगे तोमराज ?”  “हाँ ।”

“उसका प्रमाण क्या है ? तुम तो आगंतुक व्यक्ति हो, मैं कैसे विश्वास करूँ ?”

उस आगंतुक ने अपना दायाँ हाथ सम्राट विश्वजित के नजदीक कर दिया । चमचमाती अँगूठी में लिखा था : ‘कैवर्त-सम्राट तोमराज’ ! विश्वजित कूदकर नीचे उतरा और गले लगाया : “सम्राट तुम ! संत को रिहा कराने की भीख माँगने अपने प्राणों की बाजी लगाकर सुबह-सुबह अकेले, निहत्थे आये हो ! तुमने मेरी आँखें खोल दी हैं । अब युद्ध तो क्या चलेगा, तुम मुझे अपना मित्र बना लो । जिसके रक्षक संत हैं, उसका मित्र बनने से भी हमारा कल्याण होगा ।”

हजारों सैनिकों की मृत्यु का अंत हुआ, खून की धाराओं का अंत हुआ और प्रेम का प्रसाद बहने लगा ।

मैं कैवर्त-सम्राट तोमराज को हजार-हजार बार धन्यवाद दूँगा । जिस कैवर्त राज्य के रखवाले संत हैं और जिस राजसत्ता को सँभालनेवाले तोमराज जैसे गुरुभक्त हैं, उस राज्य का बाल बाँका कौन कर सकता है ! उस दिन से दोनों पडोसी राज्य दूध-शक्कर की नार्इं रहे ।

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संत श्री आशारामजी बापू ने चाय – बीडी – पान – मसाला – तम्बाकू – सिगरेट – गुटखा – शराब लाखों लोगो के छुडवा दिये, इससे इसका उत्पादन करने वाली कम्पनीयों का करोडो रूपये का नुकशान होने लगा | और डॉक्टरों का घंधा चोपट हो गया | और कई मेडिकल स्टोर्स बंद हो गये | और दवा बनानेवाली कंपनियों का करोड़ों रुपयों का नुकशान होने लगा | इसके इलावा पूज्य बापूजी ने धर्मांतरण को रोका है | पूज्य बापूजी के भक्त – साधक परिवार फ़िल्म बहुत कम देखते है | और जीवन उपयोगी चीजे बापूजी के आश्रम की ज्यादा इस्तेमाल करते है, जों कि सस्ती और अच्छी होती है | इससे कई विदेशी कम्पनियों को करोड़ो रूपये का नुकशान होता है | इन कारणों से सभी कम्पनियों ने और धर्मांतरण वालोने मिलके पूज्य बापूजी के खिलाफ षड़यंत्र किया है |

Satsang

तमाचे की करामात


मुंबई के नजदीक गणेशपुरी है। गणेशपुरी, वज्रेश्वरी में नाना औलिया नाम के एक महापुरुष रहा करते थे। वे मुक्तानंदजी के आश्रम के नजदीक की सड़क पर मैले कुचैले कपड़े पहने पड़े रहते थे अपनी निजानंद की मस्ती में। वे दिखने में तो सादे-सूदे थे पर बड़ी ऊँची पहुँच के धनी थे।

sant, tamacha, mahima

उस समय घोड़ागाड़ी चलती थी, ऑटोरिक्शा गिने गिनाये होते थे। एक बार एक डिप्टी कलेक्टर (उपजिलाधीश) घोड़ागाड़ी पर कहीं जा रहा था। रास्ते में बीच सड़क पर नाना औलिया टाँग पर टाँग चढ़ाये बैठे थे।

कलेक्टर ने गाड़ीवान को कहाः “हॉर्न बजा, इस भिखारी को हटा दे।”

गाड़ीवान बोलाः “नहीं, ये तो नाना बाबा हैं ! मैं इनको नहीं हटाऊँगा।”

कलेक्टरः “अरे ! क्यों नहीं हटायेगा, सड़क क्या इसके बाप की है ?” वह गाड़ी से उतरा और नाना बाबा की डाँटने लगाः “तुम सड़क के बीच बैठे हो, तुमको अच्छा लगता है ? शर्म नहीं आती ?” बाबा दिखने में दुबले पतले थे लेकिन उनमें ऐसा जोश आया कि उठकर खड़े हुए और उस कलेक्टर का कान पकड़कर धड़ाक से एक ने तमाचा जड़ दिया। आस पास के सभी लोग देख रहे थे कि नाना बाबा ने कलेक्टर को तमाचा मार दिया। अब तो पुलिस नाना बाबा का बहुत बुरा हाल करेगी।

लेकिन ऐसा सुहावना हाल हुआ कि ‘साधूनां दर्शनं लोके सर्वसिद्धकरं परम्।’ की तरह ‘साधूनां थप्पड़ं सर्वसिद्धिकरं परं… महापातकनाशनं… परं विवेकं जागृतम्।’ पंजा मार दिया तो उसके पाँचों विकारों का प्रभाव कम हो गया। कलेक्टर ने सिर नीचे करके दबी आवाज में गाड़ीवान को कहाः “गाड़ी वापस लो।” जहाँ ऑडिट करने जा रहा था वहाँ न जाकर वापस गया अपने दफ्तर में और त्यागपत्र लिखा। सोचा, “अब यह बंदों की गुलामी नहीं करनी है। संसार की चीजों को इकट्ठा कर-करके छोड़कर नहीं मरना है, अपनि अमर आत्मा की जागृति करनी है। मैं आज से सरकारी नौकरी को सदा के लिए ठुकराता हूँ और अब असली खजाना पाने के लिए जीवन जीऊँगा।’ बन गये फकीर एक थप्पड़ से।

कहाँ तो एक भोगी डिप्टी कलेक्टर और नाना साहब औलिया का तमाचा लगा तो ईश्वर के रास्ते चलकर बन गया सिद्धपुरुष !

तुम में से भी कोई चल पड़े ईश्वर के रास्ते, हो जाय सिद्धपुरुष ! नानासाहब ने एक ही थप्पड़ मारा और कलेक्टर ने अपना काम बना लिया। अब मैं क्या करूँ ? थप्पड़ से तुम्हारा काम होता हो तो मैं उसके लिए भी तैयार हूँ और कहानी-कथा, सत्संग सुनाने से तुम्हारा काम होता हो तो भी मैं तैयार हूँ लेकिन तुम अपना काम बनाने का इरादा कर लो। लग जाय तो एक वचन भी लग जाता है।

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“इन मल-मूत्र से भरे स्थानों के लिए मैं काम से अंधा हो रहा हूँ ! इन गंदे अंगों के पीछे मैं अपनी जिंदगी तबाह किये जा रहा हूँ !”

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Rishi Vemna

आंध्र प्रदेश में एक धनाढय सेठ का छोटा पुत्र वेमना माता-पिता की मृत्यु के बाद अपने भैया और भाभी की छत्रछाया में पला-बढ़ा। उसकी भाभी लक्ष्मी उसे माँ से भी ज्यादा स्नेह करती थी। वह जितने रूपये माँगता उतने उसे भाभी से मिल जाया करते। बड़ा भाई तो व्यापार में व्यस्त रहने लगा और छोटा भाई वेमना खुशामदखोरों के साथ घूमने लगा। उनके साथ भटकते-भटकते एक दिन वह वेश्या के द्वार तक पहुँच गया। वेश्या ने भी देखा कि ग्राहक मालदार है। उसने वेमना को अपने मोहपाश में फँसा लिया और कुकर्म के रास्ते चल पड़ा।

अभी वेमना की उम्र केवल 16-17 साल की ही थी। वेश्या जो-जो माँगें उसके आगे रखती, भाभी से पैसे लेकर वह उन्हें पूरी कर देता। एक बार उस वेश्या ने हीरे-मोतियों से जड़ा हार, चूड़ियाँ और अँगूठी माँगी।

वेमना उस वेश्या के मोहपाश में पूरी तरह बँध चुका था। उसने रात को भाभी के गहने उतार लिये। भाभी ने देख के अनदेखा कर दिया। कुछ दिनों बाद वेमना ने भाभी का मँगलसूत्र उतारने की कोशिश की, तब भाभी ने पूछाः “सच बता, तू क्या करता है ? पहले के गहने कहाँ गये ?” सच्चाई जानकर भाभी रो पड़ी। सोचने लगी कि ‘इतनी सी उम्र में ही यह अपना तेज बल सब नष्ट कर रहा है।’

किंतु भाभी कोई साधारण महिला नहीं थी, सत्संगी थी। उसने देवर को गलत रास्ते जाने से रोकने के लिए डाँट-फटकार की जगह विचार का सहारा लिया और देवर के जीवन में भी सदविचार आ जाय – ऐसा प्रयत्न किया। उसने एक शर्त रखकर वेमना को जेवर दियेः

“बेटा ! वह तो वेश्या ठहरी। तू जैसा कहेगा, वैसा ही करेगी। उसे कहना कि ‘तू नग्न होकर सिर नीचे करक और अपने घुटनों के बीच से हाथ निकालकर पीछे से ले, तब मैं तुझे गहने दूँगा।’ जब वह इस तरह तेरे से गहने लेने लगे तब तू काली माता का स्मरण करके उनसे प्रार्थना करना कि हे माँ ! मुझे विचार दो, भक्ति दो। मुझे कामविकार से बचाओ।”

दूसरे दिन वेमना की शर्त के अनुसार जब वेश्या गहने लेने लगी, तब वेमना ने माँ काली से सदबुद्धि के लिए प्रार्थना की। भाभी की शुभ भावना और माँ काली की कृपा से वेमना का विवेक जाग उठा कि ‘इन मल-मूत्र से भरे स्थानों के लिए मैं काम से अंधा हो रहा हूँ। इन गंदे अंगों पीछे मैं अपनी जिंदगी तबाह किये जा रहा हूँ….’ यह विचार आते ही वेमना तुरन्त गहने लेकर भाभी के पास आया और भाभी के चरणों में गिर पड़ा। भाभी ने वेमना का और भी मार्गदर्शन किया।

वेमना मध्यरात्रि में ही माँ काली के मंदिर में चला गया और सच्चे हृदय से प्रार्थना की। उसकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर माँ काली ने उसे योग की दीक्षा दे दी और माँ के बताये निर्देश के अनुसार वह लग गया योग-साधना में। उसकी सुषुप्त शक्तियाँ जागृत होने लगीं और कुछ सिद्धियाँ भी आ गयीं। अब वेमना वेमना न रहा, योगिराज वेमना होकर प्रसिद्ध हो गया। उनके सत्संग से ‘वेमना योगदर्शनम्’ और ‘वेमना तत्त्वज्ञानम्’ – ये दो पुस्तकें संकलित हुई। आज भी आंध्र प्रदेश के भक्त लोग इन पुस्तकों को पढ़कर योग और ज्ञान के रास्ते पर चलने की प्रेरणा पाते हैं।

कहाँ तो वेश्या के मोह में फँसने वाला वेमना और कहाँ करूणामयी भाभी ने सही रास्ते पर लाने का प्रयास किया, माँ काली से दीक्षा मिली, चला योग व ज्ञान के रास्ते पर और भगवदीय शक्तियाँ पा लीं, भगवत्साक्षात्कार कर लिया एवं कइयों को भगवान के रास्ते पर लगाया। कई व्यसनी-दुराचारियों के जीवन को तार दिया। जिससे वे संत वेमना होकर आज भी पूजे जा रहे

Satsang

भोगों से वैराग्य

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Festival

Deepawali – The King of Festivals


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What a marvellous system Indian culture has set up! Through the regimen of festivals, Rishis have laid down the path of realization of the Ultimate Truth and have taught us how we can joyfully proceed towards the Eternal with the help of the transient body, fugitive resources, fleeting time and short-lived relationships. In other religions, there are six or seven festivals but in Indian culture, there are about forty festivals and the crowning festival is the festival of Deepawali. Deepawali is a bouquet of five festivals – Dhan-Teras (the thirteenth day of the dark half of Kartik), Kali (dark) Chaudas (the fourteenth day of the dark half of Kartik), Deepawali proper, Indian New Year day and bhai dooj (a festival when sisters apply tilak on the forehead of their brothers).

Dhan-Teras is the day when we worship Mother Lakshmi and pray for wealth – not only material wealth but also spiritual wealth – that of inner peace, inner love.

That wealth alone is real wealth, which is useful for God-realization, whether the wealth is in the form of money, cows, elephants, intellectual wealth or the wealth of public support. On the Dhan-Teras day, think of the spiritual wealth and spend some part of your wealth for good causes so as to attain Self-Bliss. The wealth, which is unjustly earned, inevitably ruins one’s family and one’s children. Therefore, guard against filthy lucre; take care not to earn wealth by corrupt means. Wealth has sixty four vices as against sixteen virtues. To purge the wealth of vices, Mother Lakshmi, the goddess of wealth, is worshipped on the Dhan-Teras day as the consort of Lord Vishnu and resolution is made to use the wealth for noble purposes.

Wealth brings in its wake, desire, anger, greed, luxuriousness and egotism. One indulges in things one should not. But there are virtues as well in wealth. If one has wealth, he can make offerings to manes; he can serve his parents and his religion; one can also use one’s wealth in furthering Guru’s divine works and in propagating spiritual knowledge and study of scriptures. Thus one should steer clear of vices and should cultivate virtues. This way by guarding against the vices of wealth and revealing it’s positives, the wealth will become such as to bring happiness and joy. This is what is meant by worshipping Mother Mahalakshmi, the Divine wealth.

We worship Mother Lakshmi in the course of Deepawali festival so that our wealth is converted to divine wealth i.e. Lakshmi, and we get sanctified by the grace of the Indweller Lord Vishnu. The wealth used for great and noble purposes is termed Lakshmi and if wealth brings worry and maliciousness, it is just affluence. Affluence is accompanied by the fear of insecurity but Mother Lakshmi is accompanied by Lord Vishnu Himself. The wealth is the same but we adore it as Mahalakshmi by performing religious purificatory rites.

Next comes Narak (hell) Chaturdashi. It is also called Kali (dark) Chaudas or mini-Deepawali. Mini-Deepawali refers to petty joy. If one is energetic and free from carelessness, one will get some joy but absolute joy can come only when the lamp of Knowledge is lit.

Lord Krishna killed the demon, Narakasur on this day. We too should resolve to bring the Light in our lives and to weed out the hellish thoughts of pessimism, listlessness, malice, worry and escapism etc. and also the vices of laziness, carelessness, negligence and indulging in futile pursuits. Keeping vigil and doing Japa in the night of Narak Chaturdashi is immensely helpful in turning the Chit-Shakti i.e. energy lying dormant towards the Supreme Being. Rubbing oil on the body is otherwise prohibited in the month of Kartika but rubbing sesame-oil on the body and taking a bath thereafter on the Narak Chaturdashi day is highly beneficial.

Next comes Deepawali proper, the festival of lighting lamps and illuminating one’s life with knowledge. Light the lamp of Knowledge in your heart as well. If the house is lit with lamps but the heart is full of darkness of ignorance, one will always keep on complaining, ‘such and such thing has happened; I am miserable…’ Such thoughts actually make one miserable. On the other hand, one who thinks, ‘I am born to trample troubles and to know my Real Self’ and remains engaged in good deeds with equanimity, comes out with flying colours. So banish the darkness from your heart and live in the Light of Knowledge. Everything will pass away; there is no need to get fixated to any situation and make oneself miserable or worried nor is it advisable to take pride in anything. The river of the world is flowing; just keep swimming across it finally making your way to the Lord.

Merchants settle their old accounts on Deepawali. Similarly, we should settle our old disputes with the help of satsang that cures the body of diseases, eliminates the ignorance of the heart and eradicates the hatred from the mind. If somebody is able to do so, what better day can be there in his life!

People consume and distribute sweetmeats on Deepawali day. But the spiritual Deepawali is celebrated by having the sweetmeats of Self-bliss, by making one’s nature amicable and by purging one’s heart of all its bitterness.

You will take only some joy in lighting lamps on Deepawali day. But the moths will enjoy the lights much more, only to get burnt to death in a little while. Taking pleasure in sense-enjoyments is the way of moths; imbibing the joy of Self-bliss, of equanimity, lighting the lamp of Knowledge, bringing out the supreme Love and the supreme Bliss, is the spiritual Deepawali, the real Deepawali.

Do light earthern lamps in your house on this day, but if there is a poor neighbour, do care for him as well. Light a few earthern lamps in his house too. Distribute clothes and sweetmeats among poor children. Shun all pride and treat even the meanest of men with love and affection. One who thinks for the welfare of others and does good to others actually does good to himself. The Vedas pronounce, ‘One who aptly serves others becomes cheerful himself; he becomes exalted and distinguished too.’

Then comes the Hindu New Year day. Deepawali is the last day of the year and the next day, the first lunar day of Margshirsha, is the first day of the year (according to Gujarat Vikram Samvat). This is the day when you should turn over a new leaf in the diary of your life. On this day, Lord Vishnu in the Vamana (pigmy) incarnation took away all that the Demon King, Bali possessed. Bali too had the wise sense of giving away all to Him, Who is the Supreme Lord of the Universe and the proprietor of everything that exists therein, and thereby was successful in pleasing Him.

In the Mahabharata, Bhishma says to Yudhishthir, “Yudhishthir! One who remains cheerful on New Year day is going to be cheerful throughout the year and the one who is gloomy on this day will remain so all through the year.”

Next comes Yama (the god of death) Dwitiya (second lunar day) or Bhai Dooj. This is the festival meant to awaken divine feelings in the hearts of brother and sister, towards each other. On this day Yamuna had served a meal to her brother Yama, the God of death at her home. If a brother takes a meal prepared by his sister on this day, he is saved from punishment at the hands of Yama. No sister would like her brother to be mired in this phenomenal world, to be beset with desire, anger, greed, delusion, egotism and sin and to undergo the grind of the cycle of birth and death. Therefore, the sister applies tilak on her brother’s forehead with the wish that her brother’s third eye (of Knowledge) should be opened and he should live in the Light of Knowledge.

‘You light a series of lamps outside;

Light the lamp in your heart someday.

You have decorated your house with flowers;

How about cleaning the mind someday?

Even if he gets all the wealth of the world,

The greedy one will remain as poor as before.

Wealth earned honestly alone is prosperity

Spend it then in noble endeavours.’

Deepawali is called the queen of festivals. It is celebrated over a period of five days with great joy. From the point of view of disciples, if one gets the good fortune of lighting the lamp of Knowledge within, by virtue of Darshan of and association with Sadguru and through satsang, this great festival can be called without exaggeration the Emperor of festivals.

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Festival

HAPPY DHANTERAS


dhanteras

धन्वंतरि महाराज खारे-खारे सागर में से औषधियों के द्वारा शारीरिक स्वास्थ्य-संपदा से समृद्ध हो सके, ऐसी स्मृति देता हुआ जो पर्व है, वही है धनतेरस। यह पर्व धन्वंतरि द्वारा प्रणीत आरोग्यता के सिद्धान्तों को अपने जीवन में अपना कर सदैव स्वस्थ और प्रसन्न रहने का संकेत देता है।

धनतेरस के दिन यमराज को दो दीपक दान करना चाहिये | तुलसी के आगे एक दीपक रखना चाहिये, दरिद्रता मिटाने के नेक काम आता है |

मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन च मया सह |

त्रयोदश्यां दीपदानात् सुर्यज: प्रीयतामिति ||

धनतेरस के दिन इस मंत्र से घर के द्वार पर दीपदान करने से अपमृत्यु का भय नहीं होता |


दीपावली पर लक्ष्मीप्राप्ति की सचोट साधना-विधियाँ

धनतेरस से आरंभ करें

सामग्रीः दक्षिणावर्ती शंख, केसर, गंगाजल का पात्र, धूप अगरबत्ती, दीपक, लाल वस्त्र।

 

विधिः साधक अपने सामने गुरुदेव व लक्ष्मी जी के फोटो रखे तथा उनके सामने लाल रंग का वस्त्र (रक्त कंद) बिछाकर उस पर दक्षिणावर्ती शंख रख दे। उस पर केसर से सतिया बना ले तथा कुमकुम से तिलक कर दे। बाद में स्फटिक की माला से मंत्र की 7 मालाएँ करे। तीन दिन तक ऐसा करना योग्य है। इतने से ही मंत्र-साधना सिद्ध हो जाती है। मंत्रजप पूरा होने के पश्चात् लाल वस्त्र में शंख को बाँधकर घर में रख दें। कहते हैं – जब तक वह शंख घर में रहेगा, तब तक घर में निरंतर उन्नति होती रहेगी।

 

मंत्रः ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं महालक्ष्मी धनदा लक्ष्मी कुबेराय मम गृह स्थिरो ह्रीं ॐ नमः।

 

अनुक्रम

दीपावली से आरंभ करें

दीपावली पर लक्ष्मी प्राप्ति के लिए विभिन्न प्रकार की साधनाएँ करते हैं। हम यहाँ अपने पाठकों को लक्ष्मीप्राप्ति की साधना का एक अत्यन्त सरल व मात्र त्रिदिवसीय उपाय बता रहे हैं।

दीपावली के दिन से तीन दिन तक अर्थात् भाईदूज तक एक स्वच्छ कमरे में धूप, दीप व अगरबत्ती जलाकर शरीर पर पीले वस्त्र धारण करके, ललाट पर केसर का तिलक कर, स्फटिक मोतियों से बनी माला नित्य प्रातःकाल निम्न मंत्र की दो-दो मालाएँ जपें।

 

ॐ नमः भाग्यलक्ष्मी च विद् महे।

अष्टलक्ष्मी च धीमहि।

तन्नोलक्ष्मी प्रचोदयात्।

दीपावली लक्ष्मीजी का जन्मदिवस है। समुद्र मन्थन के दौरान वे क्षीरसागर से प्रकट हुई थीं। अतः घर में लक्ष्मी जी के वास, दरिद्रता के विनाश और आजीविका के उचित निर्वाह हेतु यह साधना करने वाले पर लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं।


यदि हम इस बार की दिवाली को अपनी विशेष दिवाली मनाना चाहते हैं तो हमें प्रार्थना करनी होगीः

 

अज्ञानतिमिरान्धस्य विषयाक्रान्तचेतसः।

ज्ञानप्रभाप्रदानेन प्रसादं कुरु मे प्रभो।।

‘हे प्रभु ! अज्ञानरूपी अंधकार में अंध बने हुए और विषयों से आक्रान्त चित्तवाले मुझको ज्ञान का प्रकाश देकर कृपा करो।’

हमें भी श्रीराम की तरह अपने विषय-विकारों से युद्ध करना होगा और जिन सदगुणों को अपना कर श्रीराम ने रावण जैसे महाबलियों को धराशायी कर दिया, उन सदगुणों को अपना कर, उन्हें विकसित कर इन विकाररूपी राक्षसों को मारकर अपने आत्मा-परमात्मारूपी घर में वापस आना होगा। ईंट-पत्थर के घर में नहीं वरन् अपने असली घर में प्रवेश करना होगा। इसके लिए दृढ़ता से संकल्प करना होगा, ऐसी तड़प जगानी होगी कि ‘अब हम ज्यादा समय तक नहीं रह सकते अपने घर से बिछड़कर ! हमारी परमात्मारूपी करुणामयी माँ कौशल्या हमें बुला रही हैं।’

किंतु… विकारों पर विजय प्राप्त कराने की शक्ति दिलाने वाले कोई तो चाहिए – वशिष्ठजी जैसे, याज्ञवल्क्य जैसे, लीलाशाह बापू जैसे जिन्हें हमारे घर का पता मालूम हो। जिनसे हम पूछ सकें अपने घर का पता। जो अपने घर में प्रतिष्ठित हो चुके हों ऐसे महापुरुषों की शरण में हमें जाना होगा। ऐसे सदगुरु अगर हमें मिल जायें और उनकी नूरानी नजर हम पर पड़ जाय तो बेड़ा पार हो जायेगा। क्योंकि जन्मों-जन्मों के भटके जीवों के कल्याण के लिए अपने घर का पता पूछने के लिए गुरुदेव के अलावा और कोई परम कल्याणकारी देव नहीं है।

ऐसे सदगुरु ही हमारी भटकान को दूर कर हमें असली घर में प्रवेश करा सकते हैं। जिन्होंने गुरुकृपा को पचाया है, उन महापुरुषों ने अपने जीवन को सफल कर लिया है। जो अपने परम पद में स्थित हो गये हैं, उन महापुरुषों के जीवन में फिर सदा ही दिवाली रहती है।

जिनकी जीवन नैया प्यारे, सदगुरु ने सँभाली है।

उनके मन की बगिया की, महकी हर सूखी डाली है।।

निगुरों के हैं दिन अंधियारे, उनकी रात उजियारी है।

जो मिटे सदगुरु चरणों में, उनकी बात निराली है।।

जिसने गुरु के प्रेमामृत की, भर-भर के पी प्याली है।

मानव जनम सफल है उनका, उनकी रोज दिवाली है।।

 

हम भी आज संकल्प करें- “श्रीराम का तरह सदगुरु की शरण में जाकर विकाररूपी राक्षसों पर विजय प्राप्त करने की कला सीखेंगे तथा जन्मों और सदियों से चल रहे इस युद्ध और वनवास पर विजय प्राप्त कर हम अपने घर में आयेंगे व भूले हुओं को राह दिखाकर उनके जीवन में भी ज्ञान की ज्योति प्रज्जवलित कराने में सेतु का कार्य करेंगे।


दीपावली अर्थात् अमावस्या के गहन अंधकार में भी प्रकाश फैलाने का पर्व। यह महापर्व यही प्रेरणा देता है कि अज्ञानरूपी अंधकार में भटकने के बजाय अपने जीवन में ज्ञान का प्रकाश ले आओ…

पर्वों के पुंज इस दीपावली के पर्व पर घर में और घर के बाहर तो दीपमालाओं का प्रकाश अवश्य करो, साथ ही साथ अपने हृदय में भी ज्ञान का आलोक कर दो। अंधकारमय जीवन व्यतीत मत करो वरन् उजाले में जियो, प्रकाश में जियो। जो प्रकाशों का प्रकाश है, उस दिव्य प्रकाश का, परमात्म-प्रकाश का चिंतन करो।

सूर्य, चन्द्र, अग्नि, दीपक आदि सब प्रकाश है। इन प्रकाशों को देखने के लिए नेत्रज्योति की जरूरत है और नेत्रज्योति ठीक से देखती है कि नहीं, इसको देखने के लिए मनःज्योति की जरूरत है। मनःज्योति यानी मन ठीक है कि बेठीक, इसे देखने के लिए बुद्धि का प्रकाश चाहिए और बुद्धि के निर्णय सही हैं कि गलत, इसे देखने के लिए जरूरत है आत्मज्योति की।

इस आत्मज्योति से अन्य सब ज्योतियों को देखा जा सकता है, किंतु ये सब ज्योतियाँ मिलकर भी आत्मज्योति को नहीं देख पातीं। धनभागी हैं वे लोग, जो इस आत्मज्योति को पाये हुए संतों के द्वार पहुँचकर अपनी आत्मज्योति जगाते हैं।


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Satsang

छ: दुर्गुणों का निकास, लाए जीवन में सर्वागीण विकास


jivan me vikas
महात्मा विदुरजी राजा धृतराष्ट्र से कहते हैं :
षड दोषा: पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता |
निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता ||
‘ऐश्वर्य या उन्नति चाहनेवाले व्यक्तियों को नींद, तन्द्रा (ऊँघना). भय, क्रोध, आलस्य तथा दीर्घसूत्रता इन छ: दुर्गणों को त्याग देना चाहिए |’ (महाभारत, उद्योग पर्व:३७.७८)

अतिनिद्रा : असमय तथा अधिक शयन करने से आरोग्य व आयुष्य का ह्रास होता है | अधिक नींद करनेवालों में उत्साह तथा दक्षता की कमी पायी जाती है लेकिन ब्राम्हमुहूर्त में उठकर वायुसेवन करनेवालों की स्मरणशक्ति बढती है, दिनभर उत्साह बना रहता है | तामसी आहार (लहसुन,प्याज तथा बासी, तीखे-चरपरे व तले हुए पदार्थ आदि) का त्याग करने तथा आसन-प्राणायम करने से अतिनिद्रा का नाश होता है |

तन्द्रा : तन्द्रा अर्थात ऊँघना, झोंके खाना | तन्द्रा दो कारणों से होती है – एक तो रात्रि की नींद पूरी न हुई हो; दूसरा, तमस हो | नींद भलीप्रकार पूरी हो सके इसलिए रात्रि ९ से सुबह ३ – ४ बजे के बीच की आवश्यकतानुसार नींद पर्याप्त होती है | इस समय ली हुई नींद से शरीर की आधी तकलीफें तो बिना दवा के ही ठीक हो जाती हैं | अर्धरोगहरि निद्रा…. दिन में सोने से कई रोग बिन बुलाये आ जाते हैं | तमस को जीतने के लिए मिताहार व प्राणायाम करने चाहिए |

भय : भयभीत व्यक्ति की बनी हुई बात भी बिगड़ जाती हैं | सामर्थ्य होते हुए भी वह उसका उपयोग नहीं कर पाता | इसलिए निर्भय बनना चाहिए | प्रतिदिन पूज्य बापूजी के सत्संग का श्रवण, ॐकर का गुंजन व गर्जना तथा ‘निर्भय नाद’ व ‘जीवन रसायन’ पुस्तकों का पठन, मनन, अनुसरण करने से निर्भयता, निश्चिंतता आ जाती है | निर्भयता की अनोखी कुंजी देते हुए पूज्य बापूजी बताते हैं : “जब डर लगे तो अपने शुद्ध ‘मैं’ की ओर भाग जाओ | हो-होकर क्या होगा ? मैं निर्भीक हूँ | ॐ … ॐ … ॐ …. मैं अमर आत्मा हूँ | हरि ॐ … ॐ…. ॐ…. ‘ ऐसा चिंतन करों तो भय भाग जायेगा |”
वैसे तो डर पतन का कारण है लेकिन गुरु, भगवान, सत्शास्त्र की अवज्ञा का डर व सामाजिक नियमों के उल्लंघन का डर संसार से पार लगा देता है | रज्जबजी कहते हैं :
हरि डर गुरु डर जगत डर, डर करनी में सार |
रज्जब डरिया सो उबरिया, गाफिल खायी मार ||

क्रोध : एक महीने तक जप-तप करने से चित्त की जो योग्यता बनती है, प्रो.गेटे कहते हैं कि ‘यदि एक घंटे तक क्रोध करनेवाले व्यक्ति के श्वास के विषैले कण एकत्र करके इंजेक्शन बनाया जाय तो उससे २० आदमी मर सकते हैं |” इसलिए वेद भगवान की बात माननी चाहिए : मा क्रुध: | ‘क्रोध मत करो |’ (अथर्ववेद :११.२.२०)
लेकिन महर्षि दुर्वासा, विश्वामित्रजी, रमण महर्षि जैसे जीवन्मुक्त महापुरुषों की तरह भीतर से क्रोध के साक्षी बनकर, अनुशासन के लिए हितभरा क्रोध करने की शास्त्रों में मनाही नहीं है |
चबा-चबाकर भोजन करने से क्रोध नियंत्रित होता है | क्रोध आये तो अपनी उँगलियों के नाख़ून हाथ की गद्दी पर दबें इस प्रकार मुट्ठियाँ बंद करें |

आलस्य : उद्यमेन हि सिद्धयन्ति कार्याणि न मनोरथै: | उद्धम से ही कार्य सिद्ध होते हैं, कल्पना के किलों से नहीं | आलस्य से बढकर मानव का दूसरा कोई शत्रु नहीं हैं | आलस्य से ही लापरवाही का रोग लग जाता है | हिम्मती, दृढ़निश्चियी नेपोलियन बोनापार्ट को भी अपने सेनापति ग्राउची के आलस्य के कारण वाँटर्लू के युद्ध में मुँह की खानी पड़ी | शुक्र ग्रह के लिए भेजे गये रॉकेट के प्रोग्राम में केवल एक चिन्ह (__) लिखने में हुई लापरवाही से अमेरिका को करोड़ों डॉलर्स का नुकसान सहना पड़ा था |

दीर्घसूत्रता : किसी कार्य के लिए जरूरत से अधिक समय लगाने की आदत दीर्घसूत्रता खलती है | इसे दूर करने के लिए प्रात:काल उठकर निर्णय कर लें कि दिन में अमुक कार्य इतने समय में पूरा करेंगे | फिर उसी समयावधि में कार्य पूरा करने की कोशिश करें | एक कार्य को निर्धारित समय में पूरा करते हैं तो दुसरे कार्य को वैसे ही पूरा करते हैं तो दुसरे कार्य को वैसे ही पूरा करने का मनोबल प्राप्त होता है | इस प्रकार दैनंदिनी में कर्यनियोजन करके उन्हें पूरा करने का अभ्यास करने से दीर्घसूत्रता का दोष चला जायेगा |
उपरोक्त छ: दोष जिसके जीवन से चले गये, वह उन्नति के शिखर तक पहुँचकर ही रहता हैं |
– लोककल्याण सेतु – अप्रैल २०१४ से

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