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साजिश को सच का रूप देने की मनोवैज्ञानिक रणनीति


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संत श्री आशारामजी बापू के खिलाफ जो षड्यंत्र चल रहा है, उसका मनोवैज्ञानिक तरीके से किस तरह से सुनियोजन किया गया है, यह मैं एक मनोविज्ञानी होने के नाते आपको बताना चाहती हूँ । आठ मुख्य पहलू समझेंगे कि किस तरह इस साजिश को सच का मुखौटा पहनाया जा रहा है ।

(१) जनता के विशिष्ट वर्गों पर निशाना : समाज के शिक्षित, जागरूक, उच्च एवं मुख्यतः युवा वर्ग को निशाना बनाया गया क्योंकि इनको विश्वास दिलाने पर ये तुरंत प्रतिक्रिया करते हैं ।

(२) षड्यंत्र का मुद्दा : देश की ज्वलंत समस्या ‘महिलाओं पर अत्याचार’ को मुख्य मुद्दा बनाया है । इस भावनात्मक विषय पर हर कोई तुरंत प्रतिक्रिया दे के विरोध दर्शाता है ।

(३) रणनीति : चीज को यथार्थपूर्ण, विश्वसनीय, प्रभावशाली दिखाने जैसी मार्केटिंग रणनीति का उपयोग करके दर्शकों को पूरी तरह से प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है ।

दर्शक मनोविज्ञान का भी दुरुपयोग किया जा रहा है । कोई विज्ञापन हमें पहली बार पसंद नहीं आता है लेकिन जब हम बार-बार उसे देखते हैं तो हमें पता भी नहीं चलता है कि कब हम उस विज्ञापन को गुनगुनाने लग गये । बिल्कुल ऐसे ही बापूजी के खिलाफ इस बोगस मामले को बार-बार दिखाने से दर्शकों को असत्य भी सत्य जैसा लगने लगता है ।

(४) प्रस्तुतिकरण का तरीका : पेड मीडिया चैनलों के एंकर आपके ऊपर हावी होकर बात करना चाहते हैं । वे सिर्फ खबर को बताना नहीं चाहते बल्कि सेकंडभर की फालतू बात को भी ‘ब्रेकिंग न्यूज’ बताकर दिनभर दोहराते हैं और आपको हिप्नोटाइज करने की कोशिश करते हैं ।

(५) भाषा : खबर को बहुत चटपटे शब्दों के द्वारा असामान्य तरीके से बताते हैं । ‘बात गम्भीर है, झड़प, मामूली’ आदि शब्दों की जगह ‘संगीन, वारदात, गिरोह, बड़ा खुलासा, स्टिंग ऑपरेशन’ ऐसे शब्दों के सहारे मामूली मुद्दे को भी भयानक रूप दे देते हैं ।

(६) आधारहीन कहानियाँ बनाना, सुटिंग ऑपरेशन्स और संबंधित बिन्दु : ‘आश्रम में अफीम की खेती, स्टिंग ऑपरेशन’ आदि आधारहीन कहानियाँ बनाकर मामले को रुचिकर बना के उलझाने की कोशिश करते हैं ।

(७) मुख्य हथियार : बहुत सारे विडियो जो दिखाये जाते हैं वे तोड़-मरोड़ के बनाये जाते हैं । ऐसे ऑडियो टेप भी प्रसारित किये जाते हैं । यह टेक्नोलॉजी का दुरुपयोग है ।

इसके अलावा कमजोर, नकारात्मक मानसिकतावालों को डरा के या प्रलोभन देकर उनसे बुलवाते हैं । आश्रम से निकाले गये २-५ बगावतखोर लोगों को मोहरा बनाते हैं ताकि झूठी विश्वसनीयता ब‹ढायी जा सके ।

(८) मनोवैज्ञानिक वातावरण तैयार करना : बापूजी की जमानत की सुनवाई से एक दिन पहले धमकियों की खबरें उछाली जाती हैं, कभी पुलिस को, कभी माता-पिता और लड़की को तो कभी न्यायाधीश को । ये खबरें कभी भी कुछ सत्य साबित नहीं हुर्इं ।

अब आप खुद से प्रश्न पूछिये और खुद ही जवाब ढूँढिये कि क्या यह आरोप सच है या एक सोची-समझी साजिश ?

और एक बात कि केवल पेड मीडिया चैनल ही नहीं बल्कि इसीके समान प्रिंट मीडिया भी खतरनाक तरीके से जनमानस को प्रभावित कर रहा है । इन दोनों से सावधान रहना चाहिए ।

– शिल्पा अग्रवाल,

प्रसिद्ध मनोविज्ञानी

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गौ सेवा - गाय की रक्षा - देश की रक्षा

बापू जी के श्री चित्र को १०८ परिक्रमा करती निवाई गौशाला की गौमाता

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गौ सेवा – गाय की रक्षा – देश की रक्षा

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निर्दोष, निष्कलंक बापू


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किसीने ठीक ही लिखा है कि हिन्दू तो वह बूढ़े काका का खेत है, जिसे जो चाहे जब जोत जाय । उदार, सहिष्णु और क्षमाशील इस वर्ग के साथ वर्षों से बूढ़े काका के खेत की तरह बर्ताव हो रहा है । हिन्दू समाज का नेतृत्व करनेवाले ब्रह्मज्ञानी संतों, महात्माओं, समाज-सुधारकों, क्रांतिकारी प्रखर वक्ताओं पर जिसके मन में जो आता है, वह कुछ भी आरोप मढ़ देता है । अब तो दुष्प्रचार की हद हो गयी, जब ७३ वर्षीय पूज्य संत श्री आशारामजी बापू पर साजिशकर्ताओं की कठपुतली, मानसिक असंतुलन वाली कन्या द्वारा ऐसा घटिया आरोप लगवाया गया, जिसका कोई सिर-पैर नहीं, जिसे सुनने में भी शर्म आती है । इससे देश-विदेश में फैले बापूजी के करोड़ो भक्तों व हिन्दू समाज में आक्रोश का ज्वालामुखी सुलग रहा है ।

कुदरत के डंडे से कैसे बचेंगे ?

आरोप लगानेवाली ल‹डकी की मेडिकल जाँच रिपोर्ट में चिकित्सकों ने आरोप को साफ तौर पर नकार दिया है । इससे स्पष्ट होता है कि यह सिर्फ बापूजी को बदनाम करने की सोची-समझी साजिश है लेकिन प्रश्न यह है कि करोड़ो भक्तों के आस्था के केन्द्र बापूजी के बारे में अपमानजनक एवं अशोभनीय आरोप लगाकर भक्तों की श्रद्धा, आस्था व भक्ति को ठेस पहुँचानेवाले कुदरत के डंडे से कैसे बच पायेंगे ? शास्त्रों में स्पष्ट लिखा है कि ‘भगवान स्वयं का अपमान सहन कर सकते हैं मगर अपने प्यारे तत्त्वस्वरूप संतों का नहीं ।’

व्यावसायिक हितों की चिंता

इन झूठे, शर्मनाक आरोपों के मूल में वे शक्तियाँ काम कर रही हैं, जो यह कतई नहीं चाहती हैं कि बापूजी की प्रेरणा से संचालित गुरुकुलों के असाधारण प्रतिभासम्पन्न विद्यार्थी आगे चलकर देश, संस्कृति व गुरुकुल का नाम रोशन करें । दुनिया जानती है कि भारतीय वैदिक गुरुकुल परम्परा पर आधारित शिक्षण एवं सर्वांगीण व्यक्तित्व निर्माण के क्षेत्र में बापूजी के मार्गदर्शन में देशभर में चल रहे गुरुकुल आज कॉन्वेंट शिक्षण पद्धति के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुके हैं । एक तरफ कई व्यावसायिक संस्थाओं की लूट इस पहाड़ के नीचे आ रही है तो दूसरी तरफ इंटरनेट और अश्लील साहित्य सामग्री के जरिये देश के भविष्य को चौपट करने की सुनियोजित साजिश पर पानी फिर रहा है । ओजस्वी-तेजस्वी भारत निर्माण के बापूजी के संकल्प को हजम कर पाना उन साजिशकर्ताओं के लिए अब काँटोंभरी राह साबित हो रहा है । ऐसे में गुरुकुलों की बढ़ती लोकप्रियता, विश्वसनीयता की छवि और मेधावी बच्चों की प्रतिभा को कुचलने के लिए अब कुछ इस तरह से कीचड़ उछाला जा रहा है कि माता-पिता अपने बच्चों को गुरुकुल में भेजें ही नहीं ।

पहले गुरुकुल के बच्चों पर तांत्रिक विद्या का मनग‹ढंत आरोप लगाया गया परंतु जब सर्वोच्च न्यायालय में इन आरोपों की हवा निकल गयी तो अब सीधे बापूजी के चरित्र पर ही कीच‹ड उछालने लगे हैं । मगर सूर्य पर थूँकने का दुस्साहस करनेवाले खुद ही गंदे हो जाते हैं । जो समाज को मान-अपमान, qनदा-प्रशंसा और राग-द्वेष से ऊपर उठाकर समत्व में प्रतिष्ठित करते हुए समत्वयोग की यात्रा करवाते हैं, भला ऐसे संत के दुष्प्रचार की थोथी आँधी उनका क्या बिगा‹ड पायेगी ? टीआरपी के पीछे दौ‹डनेवाले चैनल बापू को क्या बदनाम कर पायेंगे ? बापू के भक्तों की हिमालय-सी दृ‹ढ श्रद्धा के आगे आरोप की बिसात एक तिनके के समान है ।

चाहे धरती फट जाय तो भी सम्भव नहीं

वैसे आज किसी पर भी कीच‹ड उछालना बहुत आसान है । पहले बापूजी के आश्रम के लिए जमीन ह‹डपने, अवैध कब्जे, गैर-कानूनी निर्माण के थोकबंद आरोप लगाये गये मगर सत्य की तराजू पर सभी झूठे, बेबुनियाद साबित हुए । जब इनसे काम नहीं बना तो बापूजी और उनके द्वारा संचालित आश्रम, समितियों और साधकों पर अत्याचार किये गये लेकिन भक्तों ने इनका डटकर मुकाबला किया । साजिश करनेवालों ने हर बार मुँह की खायी । कितने तो आज भी लोहे के चने चबा रहे हैं तो कितने कुदरत के न्याय के आगे खामोश हैं परंतु बावजूद इसके आज भी बापूजी के ऊपर अनाप-शनाप आरोप लगवानेवालों को अक्ल नहीं आयी । साजिशकर्ताओं के इशारे पर बकनेवाली एक ल‹डकी ने बापूजी पर जैसा आरोप लगाया है, दुनिया इधर-की-उधर हो जाय, धरती फट जाय तो भी ऐसा सम्भव नहीं हो सकता है । यह घिनौना आरोप भक्तों की श्रद्धा, साधकों की आस्था को डिगा नहीं सकता है ।

पूरा जीवन खुली किताब

बापूजी का पूरा जीवन खुली किताब की तरह है । उसका हर पन्ना और उस पर लिखी हर पंक्ति समाज का युग-युगांतर तक पथ-प्रदर्शन करती रहेगी । बापूजी कोई साधारण संत नहीं, वे असाधारण आत्मसाक्षात्कारी महापुरुष हैं ।

दरअसल सबसे ब‹डी समस्या यह है कि सारे आरोप हिन्दू संतों पर ही लगाये जाते हैं क्योंकि हिन्दू चुपचाप सब सह लेता है । दुनिया के और किसी धर्म में ऐसा होने पर क्या होता है यह किसीसे छुपा नहीं है । हमारी उदारता और सहिष्णुता का दुरुपयोग किया जाता है । तभी तो महापुरुषों को बदनाम करने का षड्यंत्र चलता ही रहा है, फिर चाहे कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य स्वामी श्री जयेन्द्र सरस्वतीजी हों या फिर सत्य साँर्इं बाबा हों । आरोप लगानेवालों ने तो माता सीताजी व भगवान श्रीकृष्ण पर भी लांछन लगाया था । ऐसे में यह कल्पना कैसे की जा सकती है कि समाज को संगठित कर दिव्य भारतीय संस्कृति की विश्व-क्षितिज पर पताका लहरानेवाले विश्ववंदनीय संत पर आरोप न लगाये जायें ? संत तो स्वभाव से ही क्षमाशील होते हैं लेकिन उनके भक्त अपमान बर्दाश्त करनेवाले नहीं हैं । झूठ के खिलाफ सत्य की यह धधकती मशाल अन्याय और अत्याचार के अँधेरे को कुचलकर ही रहेगी ।

– श्री निलेश सोनी (वरिष्ठ पत्रकार)

प्रधान सम्पादक, ‘ओजस्वी है भारत !’

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Saint and People

काशी सुमेरु पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य श्री स्वामी नरेन्द्रानंद सरस्वतीजी महाराज


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षड्यंत्रों के तहत हिन्दू समाज पर अन्याय, अत्याचार बंद किया जाना चाहिए । संतों के सम्मान, स्वाभिमान की रक्षा होनी चाहिए ।

अगर संतों को जेल में डालकर बदनाम करने का षड्यंत्र होता रहा तो भारत की अस्मिता, भारत की संस्कृति सुरक्षित नहीं रह पायेगी । इसे सुरक्षित रखने के लिए सबको एकजुट हो के प्रयास करना होगा । और वह दिन दूर नहीं कि आशारामजी बापू आप सब लोगों के बीच में आयेंगे, आरोपों से बरी होंगे और राष्ट्रहित, समाजहित होगा ।

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Dirty politics (घिनौनी राजनीति)


Dirty politics (घिनौनी राजनीति)

Polytics

कितना घिनौना दुष्प्रचार ! कितनी घिनौनी राजनीति !

छिदवाड़ा गुरुकुल की सहेलियों को जाते-जाते आरोप लगानेवाली लड़की कहती गयी कि ‘‘अब देखना गुरुकुल का क्या होता है ! मैं अपना नाम करूँगी । गुरुकुल की जड़ उखाड़ के रख दूँगी । न होगा गुरुकुल, न मुझे आना प‹डेगा ।”

यह बात आरोप करनेवाली लड़की की सहेली ने अपने पिता को बतायी और अन्य लोगों तक पहुँची, हम तक भी पहुँची । छिदवाड़ा से शाहजहाँपुर १००० कि.मी. से अधिक व शाहजहाँपुर से जोधपुर १००० कि.मी. से अधिक, कुल २००० कि.मी. से अधिक अंतर हो जाता है । अब सोचो, इतने दूर से माँ-बाप के साथ लड़की को बुलाकर, माँ बाहर बरामदे में बैठी है, बाप भी वहीं है उस समय उसका मुँह दबाकर हाथ घुमाते रहे… क्या ऐसा सम्भव है ? ‘मैं चिल्लाती रही और माँ-बाप को भी नहीं सुनायी दिया ! पास में स्थित किसान के घर में रहनेवालों को भी सुनायी नहीं दिया !’ कैसी कपोलकल्पित कहानी है !

दुष्कर्म नहीं हुआ और यह बात लड़की स्वयं बोलती है, उसकी मेडिकल रिपोर्ट भी बोलती है । मुँह दबाया हो ऐसी कहीं कोई खरोंच भी लैबोरेटरी रिपोर्ट में नहीं पायी गयी । फिर भी ‘दुष्कर्म है, दुष्कर्म है…’ – ऐसा मीडिया का दुष्प्रचार कितना घिनौना है ! राजनीति कितनी घिनौनी है ! साजिशकर्ताओं की, धर्मांतरणवालों की साजिश कितनी घिनौनी है ! कोई भी समझ सकता है आसानी से कि साजिश है, राजकारण है, मनग‹ढंत कहानी है । और पाँच दिन बाद न जोधपुर में न शाहजहाँपुर में, एफआईआर दर्ज की जाती है दिल्ली में रात को २-४५ बजे ! यह तथ्य तो साजिश की पोल ही खोल देता है । पुलिस पर ऊपर से दबाव ऐसा था कि उनको तो मानसिक दबाव देकर बापूजी से हस्ताक्षर ही कराने थे, वे उन्होंने करवा लिये । दो-दो, तीन-तीन दिन का जागरण और मानसिक दबाव… पुलिस के मनमाफिक लिखे हुए कागजों पर व कोरे कागजों पर हस्ताक्षर करवा के लाखों-करो‹डों लोगों को सताने व उनकी भावनाओं को ठेस पहुँचाने का काम किया गया । इस घिनौनी साजिश से तो हृदय भी काँपता है, कलम भी काँपती है । आश्चर्य है ! आश्चर्य है !! आश्चर्य है !!!

सत्यवक्ताओं, ‘ऋषि प्रसाद’ के पाठकों को,साधकों को, और ashram.org के Viewers को  भगवान दृढ़ता दे और सुंदर, सुहावनी सूझबूझ दे । भारतीय संस्कृति को मिटानेवालों की संतों को बदनाम करने की मलिन मुरादें नाकाम हों । सभी संतों, प्रवक्ताओं और पाठकों को ईश्वर विशेष-विशेष आत्मबल, ओज अवश्य-अवश्य प्रदान करते हैं । ॐ ॐ ॐ… उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति, पराक्रम – ये छः सद्गुण जहाँ, पद-पद पर प्रभु की प्रेरणा-सहायता वहाँ ! ॐ ॐ ॐ…

करोड़ो भक्तों को, जिन्होंने आँसू बहाये, जप किया, धरना दिया, धैर्य, शांति का परिचय दिया व कुप्रचार को सुप्रचार से काटने का यह भगीरथ कार्य किया और करते रहेंगे, उनको और उनके माता-पिता को धन्यवाद है ! धन्या माता पिता धन्यो…

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रामानुजाचार्य

साधक सिद्ध कैसे बने ?


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श्री रामानुजाचार्य

श्री रामानुजाचार्य ने कुछ उपाय बताये हैं, जिनका आश्रय लेने से साधक सिद्ध बन सकता है। वे उपाय हैं :

विवेक: आत्मा अविनाशी है, जगत विनाशी है। देह हाड़ मांस का पिंजर है, आत्मा अमर है । शरीर के साथ आत्मा का कतई सम्बन्ध नहीं है और वह आत्मा ही परमात्मा है । इस प्रकार का तीव्र विवेक रखें ।

विमुखता: जिन वस्तुओं, व्यसनों को ईश्वर प्राप्ति के लिए त्याग दिया, फिर उनकी ओर न देखें, उनसे विमुख हो जायें । घर का त्याग कर दिया तो फिर उस ओर मुड़-मुड़कर न देखें । व्यसन छोड़ दिये तो फिर दुबारा न करें । जैसे कोई वमन करता है तो फिर उसे चाटने नहीं जाता, ऐसे ही ईश्वर प्राप्ति में विघ्न डालनेवाले जो कर्म हैं उन्हें एक बार छोड़ दिया तो फिर दुबारा न करें |

अभ्यास: भगवान के नाम जप का, भगवान के ध्यान का, सत्संग में जो ज्ञान सुना है उसका नित्य, निरंतर अभ्यास करें ।

कल्याण: जो अपना कल्याण चाहता है वह औरों का कल्याण करे, निष्काम भाव से औरों की सेवा करे ।

भगवत्प्राप्तिजन्य क्रिया: जो कार्य तन से करें उनमें भी भगवत्प्राप्ति का भाव हो, जो विचार मन से करें उनमें भी भगवत्प्राप्ति का भाव हो और जो निश्चय बुद्धि से करें उन्हें भी भगवत्प्राप्ति के लिए करें ।

अनवसाद: कोई भी दु:खद घटना घट जाय तो उसे बार-बार याद करके दु:खी न हों ।

अनुहर्षात्: किसी भी सुखद घटना में हर्ष से फूलें नहीं । जो साधक इन सात उपायों को अपनाता है वह सिद्धि प्राप्त कर लेता है ।

 

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सत्संग, Saint and People

श्रद्धा (DEVOTION)


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श्रद्धावान, तत्पर और संयमी पुरुष ज्ञान प्राप्त कर लेता है और ज्ञान प्राप्त करके तत्काल ही परमशांति को प्राप्त हो जाता है ।

जिसके जीवन में श्रद्धा नहीं वह पशु और पक्षी जैसा है । जिसके जीवन में श्रद्धा नहीं उसका विकास भी नहीं है । जिसके अंतःकरण में श्रद्धा नहीं उसके जीवन में रस भी नहीं है । श्रद्धा ऐसा अनुपम सद्गुण है कि जिसके हृदय में वह रहता है उसका चित्त श्रद्धेय के सद्गुणों को पा लेता है ।

श्रद्धा सम्बल-सहारा भी है और बल भी है । निर्बल का बल और आश्रय श्रद्धा ही है । अति अहंकारी व्यक्ति श्रद्धा नहीं कर सकता । निर्बल मनवाला मान्यता और कल्पना के संस्कारों को पकड़ रखता है इसलिए उसकी कल्पना के संस्कारों को पकड़ रखता है इसलिए उसकी श्रद्धा टिकती नहीं है । वह घटती-बढ़ती रहती है । परमात्मा में, परमात्म-प्राप्त महापुरुषों में शास्त्रों में श्रद्धा होनी चााहिए । अपने आप पर भी उतनी श्रद्धा होनी चाहिए । जितनी श्रद्धा डगमग होती है उतना ही व्यक्ति का व्यवहार और परमार्थ दोनों में डगमग रहता है । जीवन में अडिग श्रद्धा की आवश्यकता है । जिसके जीवन में श्रद्धा नहीं वह तो कौए से भी बदतर है । कौए का किसी पर भी विश्वास नहीं होता ।

दो प्रकार के मनुष्य सद्गुरु पर श्रद्धा नहीं कर पाते । एक तो महामुर्ख । वे न सद्गुरु को खोज पाते हैं न उन पर श्रद्धा कर पाते हैं । दूसरे जो घमंडी, अहंकारी हैं वे भी शास्त्र, भगवान और सद्गुरु पर श्रद्धा नहीं कर पाते । वे न स्वर्ग पर श्रद्धा कर पाते हैं, न पुण्य में, न पाप में , न ईष्ट में ही श्रद्धा करते हैं । वसिष्ठजी कहते हैं : “ ऐसे पुरुष मर कर वृक्ष आदि योनियों को पाते हैं । “

अपने पिता पर भी श्रद्धा करनी पड़ती है । माता ने बताया कि  – यह पिता है, यह माता है, यह मासा है । इनको श्रद्धा करके ही मानना पड़ता है । बस के ड्राइवर पर भी श्रद्धा करनी पड़ता है । चाय बनानेवाले होटल के नौकर पर भी श्रद्धा करनी पड़ती है कि चाय में जूठा, बासी या छिपकली गिरा हुआ दूध नहीं डाला होगा । अरे ! दाढ़ी बनानेवाले पर श्री श्रद्धा करनी पड़ती है कि गाल पर ही उस्तरा चलायेगा, गले पर नहीं घुमायेगा । यह व्यवहारिक श्रद्धा है । परमतत्त्व परमात्मा को पाने के लिए पारमार्थिक श्रद्धा करनी पड़ती है । जो दुर्बल मनवाला और मान्यताओं का गुलाम है वह अपनी मान्यताओं के विपरीत देखेगा तो उसकी श्रद्धा टूट जायेगी । मजबूत मनवाला आदमी कभी भी, किसी भी अवस्था में रहे, उसकी श्रद्धा टूटती नहीं अपने उद्देश्य के प्रति दृढ़ श्रद्धा हो । अगर आप जप करना चाहते हैं, ध्यान करना चाहते हैं मगर  सोचते हैं कि अभी नहीं परसों करेंगे, दो महीनों के बाद  करेंगे ऐसा ख्याल रखेंगे तो आपको ध्यान और जप में श्रद्धा नहीं है । आपको जिसके प्रति श्रद्धा होती है उसका चिंतन सहज में होने लगता है ।

जीवन में अगर भगवत्प्राप्त महापुरुष, भगवान या शास्त्र के प्रति श्रद्धा नहीं है तो धन, पुत्र, पत्नी, सब सुविधा होते हुये भी अंतर का संगीत नहीं गूँजता, रस नहीं आता । जिसे अंदर से रस नहीं आता वह सिगरेट, दारू, मांस और अण्डे में श्रद्धा रखते हैं । इसलिए वे धनभागी हैं  भक्त जो हरिनाम में, सद्गुरु में एवं  शास्त्र में श्रद्धा करते हैं ।

शास्त्र, भगवान और सदगुरु में श्रद्धा रखनेवाले श्रद्धा के बल से तर जाते हैं । जबकि दूसरे जो भगवान पर श्रद्धा नहीं रख पाते वे क्लब में, डिस्को में अंधश्रद्धा करते हैं । उनकी श्रद्धा अनेक चीजों में होती है । ठोकरें खाते-खाते जीते हैं जैसे नदी में तिनका बहता है वैसे ही नास्तिक, अश्रद्धालु का मन अनेक चीजों में तर्क-वितर्क, कुतर्क में बहता-बहता संसार के कीचड़ में गिरता है । कभी घोड़ा बनता है, कभी गधा बनता है और न चाहते हुये भी समाज की चाकरी में बलात जुटता रहता है । श्रद्धालु अपने आप कर्म करता है इसलिए वह पावन होता है जबकि श्रद्धारहित व्यक्ति से प्रकृति काम लेती है । जो अपने आप कर्म, सेवा करते हैं उनका अंतःकरण शीघ्र स्वच्छ होकर परमात्मरस से पावन होता है । जो अपने आप ईश्वर, शास्त्र, सत्कर्म और समाज के हित में कर्म नहीं कर पाते उनसे प्रकृति बलात् कर्म लेती है । पशु, वृक्ष और नास्तिकों से बलात् काम लिया जाता है ।

श्रद्धा जिसके अंतःकरण में होती है उसे पावन, रसमय, एकाग्र बनाती है और श्रद्धेय का कृपा-प्रसाद करा देती है ।

ऋग्वेद के श्रद्धा सूक्त में आता है कि :

श्रद्धां प्रातर्हवामहे श्रद्धां माध्यन्दिनं परि ।

‘ हम प्रातःकाल में श्रद्धा का आवाहन करते हैं, हम मध्यान्ह में श्रद्धा का आवाहन करते हैं और हम संध्याकाल में भी श्रद्धा का आवाहन करते हैं । ‘

जैसे, हम भगवान की प्रार्थना करते हैं वैसे ही ऋग्वेद के श्रद्धा सूक्त में श्रद्धा की प्रार्थना करते हैं कि :

‘ हे श्रद्धादेवी ! तुम हममें स्थित हो । ‘

यजुर्वेद में भी आया है :

‘ श्रद्धया सत्यमाप्यते । ‘

श्रद्धा से सत्य को पाओ । सामवेद में आता है कि सत्य से सत्य पर, दान से लोभ पर, श्रद्धा से अश्रद्धा पर और अक्रोध से क्रोध पर हम विजय पायें । हमारी श्रद्धा ऐसी हो कि अश्रद्धा को हम कुचल डालें । जिसके जीवन में श्रद्धा एवं दृढ़ता है वह विपरीत परिस्थिति को भी अपने पैरों तले कुचलकर अपनी मंजिल तक पहुँच जायेगा ।

धन्ना जाट में वह श्रद्धा थी कि पत्थर में से भगवान प्रकट हो गये । शबरी में वह श्रद्धा थी कि जिनके दर्शन के लिए मुनि लालायित रहते थे वे भगवान श्रीराम उसके द्वार पर खुद आये ।

मदालसा में श्रद्धा थी कि मेरी कुख से जो जन्म ले वह अज्ञानी कैसे रहे ? और उसने अपने बच्चों को पालने में ही वेदांत का तत्त्वोपदेश देकर ज्ञानी बना दिया ।

अष्टावक्र ने जनक से कहा कि-

श्रद्धत्स्व तात श्रद्धत्स्व नात्र मोहं कुरुष्व भोः ।

ज्ञानस्वरूपो भगवानात्मा त्वं प्रकृतेः परः ।।

‘ हे सौम्य ! हे प्रिय ! श्रद्धा कर श्रद्धा कर । इसमें (संसार में) मोह मत कर । तू प्रकृति से परे ज्ञानस्वरूप ईश्वर, परमात्मा है । ‘

(अष्टावक्रगीता)

तुम श्रद्धा के बल से कुछ बना सकते हो, कुछ बिगाड़ सकते हो । श्रद्धा के बल से किसी के दिल की बात जान सकते हो । अपने साधन पर श्रद्धा रखकर, कहाँ पर क्या हो रहा है यह भी जान सकते हो । एक जगह बैठकर दूर-दूर तक जो चाहो आदेश दे सकते हो । श्रद्धा में ऐसी शक्ति है कि वह दुःख में सुख बना देती है और सुख में सुखानंद स्वरूप परमात्मा का साक्षात्कार करा देती है ।

काम करते समय पूरी सावधानी, तत्परता बरतो । लापरवाही या और कियी भी कारण से कार्य को बिगड़ने मत दो । कर्म को ही पूजा समझकर उसे सुचारू रूप से करो । ध्यान के द्वारा  योग्यता ब‹ढाओ ।

नर-नारी में बसे हुये उस परमात्मा का प्यारा नाम ‘ नारायण… नारायण… ‘ पूरे प्रेम से लेते चलो और कर्म को कर्मयोग बनाते चलो ।

श्रद्धा अचल कैसे हो ?(Shraddha Achal Kaise Ho ?)
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